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80 साल की मां और 45 साल के बेटे की कहानी पढ़कर आंख रो पड़ेगी

Sun, 14 May 2017 04:16 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Sun, 14 May 2017 04:16 PM IST
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mother and son story in barmer
बेटा दीपा खान और मां मिंयण - फोटो : amar ujala
बाड़मेर से करीब 150 किलोमीटर दूर एक गांव, जहां 80 साल की मां अपने 40 साल के बेटे के साथ खुले आसमान के नीचे रहती है। हालात ये हैं कि इनके शरीर को चीटियां और रेगिस्तानी जोंक खा रही है लेकिन उन्हें बचाने वाला कोई नहीं है।
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हम बात कर रहे हैं सेड़वा पंचायत समिति की ग्राम पंचायत भंवरिया के गांव भंडारिया की, जहां 80 साल की मां मिंयण अपने 45 साल के बेटे दीपा खान के साथ एक पेड़ की नीचे पिछले पांच—छह महीने से रह रही है। बेटा बोल तो सकता है पर उसके हाथ—पैर चल नहीं पाते हैं इसलिए एक जगह पड़ा रहता है और मां मानसिक रूप से बीमार और बहरी है। ऐसे हालात में कोई इन्हें पीने को पानी भी दे जाए तो ठीक, नहीं तो भूखे ही पड़े रहते हैं। कोई देखरेख करने वाला नहीं होने के कारण दोनों के शरीर पर चीटियों और रेगिस्तानी जोंक ने घर बना लिया है।
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जितना खून इनके शरीर में नहीं होगा उससे ज्यादा तो जोंक चूस लेती है। आसपास ज्यादा आबादी नहीं होने के कारण भी इनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। पास में ही बरोच की ढाणी में रहने वाले ढींगाना ने उन्हें यहां शरण दे रखी है लेकिन उसकी हालत भी ऐसी नहीं है वह दोनों का इलाज करा सके। कुछ दिन पहले जब गिड़ा का रहने वाला अकबर यहां ढींगाना के नाम से स्वीकृत प्रधानमंत्री आवास योजना की ट्रेकिंग के लिए आया तो उसने एडवोकेट शाकर खां को इनके बारे में बताया।
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शाकर ने बताया कि दीपा खान की बूढी मां को बलुच भाषा आती है, दूसरी भाषा वह समझती नहीं है। उसके पास राशन कार्ड, आधार कार्ड सहित कोई भी आईडी प्रुफ तक नहीं है।

यह है इनकी पूरी कहानी

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खुले आसमान के नीचे पड़े मां—बेटे - फोटो : amar ujala
भंडारिया गांव में अधिकांश मुस्लिम बरोच जाति के परिवार रहते हैं। इन्हीं परिवारों में दीपा खान भी है। दीपा खान के पिता का नाम जामीन था। जामीन ने करीब 60 साल पहले पाकिस्तान में शादी कर ली थी। अपने पिता की इकलौती संतार जामीन भारत में आ गया, यहां मजदूरी करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था। उसकी मौत के बाद पत्नी के सहारे अपने इकलौते बेटे दीपा को छोड़ गया। जवान होने पर दीपा अपनी मां के साथ गुजरात के बनासकांठा आ गया।

यहां दोनों मां—बेटे ने 20—25 साल तक मजदूरी की। गरीबी में मां को संभालते—संभालते शादी की उम्र भी निकल गई, लेकिन शादी नहीं हुई। पिता की जमीन भंडारिया गांव छोड़ने के बाद लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया। जुलाई 2016 में दीपा को चिकनगुनिया हो गया। समय पर सही इलाज नहीं होने से उसके हाथ—पैर सुन्न हो गए। तभी से उसने बिस्तर पकड़ लिया। बुजुर्ग मां और बीमार बेटे की सूचना बनासकांठा के ही किसी व्यक्ति के द्वारा उनके गांव  भंडारिया तक भिजवाई गई।

इसके बाद गांव के लोग उसे और दीपा को अस्पताल ले गए। जहां डॉक्टरों ने इलाज पर करीब चालीस हजार रुपए का खर्चा लगने की बात कही। पैसा नहीं होने पर रिश्तेदार ढींगाना ने बरोच की ढाणीं में दोनों मां—बेटे को शरण दिलाई। सही देखरेख नहीं होने और तानों से परेशान होकर 5 माह पहले दीपा व उसकी मां ने ढींगाना का घर छोड़ दिया। घिसटते हुए देखकर पड़ोसी ने वापस दोनों को ढींगाना के खेत में एक पुराने पेड़ की छांव में छोड़ दिया।

तभी से दोनों मां—बेटे इस पेड़ के नीचे 4-5 माह से बैठे हैं। यहां बैठे ये दोनों अपनी लाचारी पर आंसू बहाते रहते हैं लेकिन इनका दर्द जानने वाला कोई नहीं है।
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