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Rajasthan: वासुदेव देवनानी ने सुनाई विभाजन की पीड़ा, कहा-मेरे मां-बाबा की कहानी रौंगटे खड़े कर देती है

Sun, 14 Aug 2022 01:32 PM IST
रोमा रागिनी न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: रोमा रागिनी Updated Sun, 14 Aug 2022 01:32 PM IST
सार

वासुदेव देवनानी ने कहा कि विभाजन की अनकही कहानी लोगों के सामने आनी चाहिए। जिससे वे उस समय की भयावहता को जान सकें। हमारे परिवार को विभाजन का दंश आज भी टीस बनकर चुभता हैं ।

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MLA Vasudev Devnani shares memory his family during Partition
वासुदेव देवनानी - फोटो : Social Media

विस्तार

देश आजादी का 75वां वर्षगांठ मना रहा है। ये आजादी हमें असंख्य वीरों के साहस और त्याग से मिली है। देश के विभाजन के समय की कहानियां आज भी रौंगटे खड़े कर देती है। राजस्थान भाजपा के विधायक वासुदेव देवनानी ने भी विभाजन के दंश को याद किया। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद उनके परिवार के सदस्यों को सिंध छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने बताया कि तब उनके परिवार के सदस्यों ने कैसे दर्द और पीड़ा झेली थी।

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रविवार को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' पर वासुदेव देवनानी ने कहा कि उनके दादा भवन दास को उनके परिवार के सदस्यों के साथ, विभाजन के दौरान सिंध (अब पाकिस्तान के प्रांतों में से एक) में अपना घर, जमीन और अनाज का व्यवसाय सब छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। देवनानी ने बताया कि 1947 में भारत के विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। हत्याएं हुईं। ज्यादातर धार्मिक आधार पर लोगों का विस्थापन हुआ। विभाजन की अनकही कहानियां लोगों के सामने आनी चाहिए। जिससे वे उस समय की भयावहता को जान सकें।

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मेरे नाना ने चना बेचकर परिवार का पेट पाला
उन्होंने कहा कि देश की विभाजन की भयावहता आज भी उन्हें और परिवार के अन्य सदस्यों को भावनात्मक रूप से परेशान करता है। उनके नाना का परिवार भारत नहीं आ सका और इस कारण उनसे सभी संबंध विभाजन के साथ खत्म हो गए। उनके दादा के पास सिंध में एक घर, जमीन और एक अच्छा व्यवसाय था लेकिन जब वे भारत आए तो उनके पास कुछ नहीं था। उन्होंने अजमेर में कागज के लिफाफे और चना बेचकर अपने परिवार का पेट पालना शुरू किया।

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अजमेर उत्तर से विधायक देवनानी ने कहा कि मेरे बाबा स्वर्गीय भावन दास अपने परिवार के साथ सिंध के शहर में अपना घर, ज़मीन और अनाज का कारोबार छोड़ कर नंगे पाव पलायन के लिए मजबूर हुए। उन्होंने जोधपुर को केंद्र बनाकर सिंध से आए हिंदुओं के लिए पुनर्वास का काम किया। विस्थापन के बाद अजमेर आने पर उन्होंने पोस्ट ऑफिस में मेल पीयून का काम शुरू किया। फिर आगे चलकर उन्होंने पोस्ट मास्टर के रूप में अपनी सेवाएं दी। बाबा के भाई स्वर्गीय हीरानंद जोधपुर में विस्थापित पुनर्वास केन्द्र में रहने लगे थे।


विभाजन का दंश आज भी चुभता है
भाजपा विधायक ने बताया कि मेरी अम्मा का परिवार सिन्ध के जकोकाबाद में रहता था। विभाजन की त्रासदी में मेरे नाना और मामा वहीं रह गए। अपने घर और जड़ों के बीच रहकर भी उन्हें वर्षों तक अपमान सहने पड़ा। हमारे परिवार को विभाजन का दंश आज भी टीस बनकर चुभता है ।मैंने धार्मिक विभाजन का दंश झेलने वाले मेरे मां बाबा से बंटवारे का संघर्ष बचपन में सुना था। जिसको याद करने पर आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जातें है। देवनानी ने यह भी कहा कि संघ के कई स्वयंसेवकों ने विभाजन के दौरान विस्थापित शिविरों में आवास, भोजन और दवा उपलब्ध कराने में मदद की।

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