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यहां शीतला माता पूजने उमड़ेंगे लाखों लोग
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sun, 19 Mar 2017 02:27 PM IST
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शीतला माता का मेला
- फोटो : अमर उजाला
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राजस्थान में शीतला माता की पूजा का पर्व बास्योडा सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाएगी, तो वहीं उन्हें ठंडे पकवानों का भोग लगाकर सुख शांति की कामना की जाएगी। इसके साथ ही चाकसू के पास शील की डूंगरी पर शीतला माता का मेला भी लगेगा। मान्यता के अनुसार शीतला माता के पूजन से माता प्रसन्न होती है।
इससे पूर्व रविवार को रांधा पुआ और पूजन की सामग्री की खरीदारी के चलते सुबह से ही बाजारों में रौनक रही। बाजार में मटके, कलश एवं सराई की खूब बिक्री रही। शीतलाष्टमी पर शीतला माता के भोग के लिए पुए, पापड़ी, राबड़ी, लापसी और गुलगुले सहित विभिन्न पकवान तैयार किए गए।
बास्योडा के दिन जयपुर के निकट चाकसू में शील की डूंगरी पर शीतला माता का लक्खी मेला लगेगा। मेले में प्रदेश के विभिन्न इलाकों से लोग आकर ढ़ोक लगाएंगे। जयपुर, सांगानेर, वाटिका, शिवदासपुरा, निवाई, टोंक, देवली आदि आसपास के इलाकों से जीप, ट्र्रेक्टर ट्रॉली, उंट गाड़ी में बैठकर बड़ी संख्या में ग्रामीण माता के गीत गाते हुए यहां पहुंचते है। बताया जाता है कि यह मंदिर करीब पांच सौ साल पुराना है और तीन सौ मीटर की उंचाई पर पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित है। यह मंदिर जिस पहाड़ी पर बना हुआ है वह भी अनोखी है। इस पहाड़ी का पत्थर माता की मूर्ति के रूप में पूजता है। इसके बाद पहाड़ी के पत्थर अपने साथ घर ले जाते हैं।
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दरअसल भारत में जितने भी उत्सव मनाए जाते हैं उनका संबंध ऋतु, स्वास्थ्य, सद्भाव और भाईचारे से है। होली के बाद मौसम का मिजाज बदलने लगता है और गर्मी भी धीरे-धीरे कदम बढ़ाकर आ जाती है। बास्योड़ा मूलतः इसी अवधारणा से जुड़ा पर्व है। इस दिन ठंडे पकवान खाए जाते हैं। राजस्थान में बाजरे की रोटी, छाछ, दही का सेवन शुरू हो जाता है ताकि गर्मी के मौसम और लू से बचाव हो सके। शीतला माता के पूजन के बाद उनके जल से आंखें धोई जाती हैं। यह हमारी संस्कृति में नेत्र सुरक्षा और खासतौर से गर्मियों में आंखों का ध्यान रखने की हिदायत का संकेत है।
बास्योड़ा के दिन नए मटके, दही जमाने के कुल्हड़, हाथ से चलने वाले पंखे लाने व दान करने का भी प्रचलन है। यह परंपरा बताती है कि हमारे पूर्वज ऋतु परिवर्तन को स्वास्थ्य के साथ ही परोपकार, सद्भाव से भी जोड़कर रखते थे। यह प्रचलन तब से है जब कूलर, फ्रीज, एसी जैसे उपकरणों का आविष्कार भी नहीं हुआ था।
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इससे पूर्व रविवार को रांधा पुआ और पूजन की सामग्री की खरीदारी के चलते सुबह से ही बाजारों में रौनक रही। बाजार में मटके, कलश एवं सराई की खूब बिक्री रही। शीतलाष्टमी पर शीतला माता के भोग के लिए पुए, पापड़ी, राबड़ी, लापसी और गुलगुले सहित विभिन्न पकवान तैयार किए गए।
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बास्योडा के दिन जयपुर के निकट चाकसू में शील की डूंगरी पर शीतला माता का लक्खी मेला लगेगा। मेले में प्रदेश के विभिन्न इलाकों से लोग आकर ढ़ोक लगाएंगे। जयपुर, सांगानेर, वाटिका, शिवदासपुरा, निवाई, टोंक, देवली आदि आसपास के इलाकों से जीप, ट्र्रेक्टर ट्रॉली, उंट गाड़ी में बैठकर बड़ी संख्या में ग्रामीण माता के गीत गाते हुए यहां पहुंचते है। बताया जाता है कि यह मंदिर करीब पांच सौ साल पुराना है और तीन सौ मीटर की उंचाई पर पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित है। यह मंदिर जिस पहाड़ी पर बना हुआ है वह भी अनोखी है। इस पहाड़ी का पत्थर माता की मूर्ति के रूप में पूजता है। इसके बाद पहाड़ी के पत्थर अपने साथ घर ले जाते हैं।
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दरअसल भारत में जितने भी उत्सव मनाए जाते हैं उनका संबंध ऋतु, स्वास्थ्य, सद्भाव और भाईचारे से है। होली के बाद मौसम का मिजाज बदलने लगता है और गर्मी भी धीरे-धीरे कदम बढ़ाकर आ जाती है। बास्योड़ा मूलतः इसी अवधारणा से जुड़ा पर्व है। इस दिन ठंडे पकवान खाए जाते हैं। राजस्थान में बाजरे की रोटी, छाछ, दही का सेवन शुरू हो जाता है ताकि गर्मी के मौसम और लू से बचाव हो सके। शीतला माता के पूजन के बाद उनके जल से आंखें धोई जाती हैं। यह हमारी संस्कृति में नेत्र सुरक्षा और खासतौर से गर्मियों में आंखों का ध्यान रखने की हिदायत का संकेत है।
बास्योड़ा के दिन नए मटके, दही जमाने के कुल्हड़, हाथ से चलने वाले पंखे लाने व दान करने का भी प्रचलन है। यह परंपरा बताती है कि हमारे पूर्वज ऋतु परिवर्तन को स्वास्थ्य के साथ ही परोपकार, सद्भाव से भी जोड़कर रखते थे। यह प्रचलन तब से है जब कूलर, फ्रीज, एसी जैसे उपकरणों का आविष्कार भी नहीं हुआ था।