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16 दिन तक भगवान विष्णु से अलग रहती है लक्ष्मी जी, दिवाली पर जाती है गर्भग्रह में
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Thu, 19 Oct 2017 01:23 PM IST
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goddess laxmi
- फोटो : demo pic
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देश में एक मंदिर ऐसा है जहां दिवाली की पूजा से पहले मां लक्ष्मी को भगवान विष्णु से अलग कर दिया जाता है। लक्ष्मी जी को 16 दिन तक भगवान के अलग रखा जाता है और 16 वें दिन प्रतिमा को फिर से गर्भ ग्रह में स्थापित कर दिया जाता है।
दरअसल, दिवाली के उत्सव पर सीकर के महामंदिर रोड स्थित कल्याण जी मंदिर में सोलह दिवसीय पूजा विधान किया जाता है। 16 दिन के इस महापूजन में हर दिन का अपना अलग महत्व होता है, उस दिन के मुताबिक ही पोशाकें मां लक्ष्मी को धारण करवाई जाती है। पूजा का समापन दिवाली पर होता है। इस दिन प्रतिमा को दुल्हन के स्वरूप में सजाकर लाल जोड़ा पहना जाता है।
मंदिर महंत की मानें तो मंदिर की स्थापना 1921 में हुई थी। स्थापना राव राजा कल्याण सिंह ने करवाई थी। माता लक्ष्मी का मंदिर गर्भ ग्रह से करीब पचास मीटर की दूरी पर स्थित है, जहां यह उत्सव आयोजित होता है। लक्ष्मी की अष्टधातु की मूर्ति है।
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मंदिर में सोलह दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत में लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु से अलग कर दिया जाता है। दिवाली की रात्रि पर प्रतिमा को फिर से गर्भ ग्रह में स्थापितकर दिया जाता है। इसके बाद सुबह साढ़े चार बजे बाद मां लक्ष्मी की आरती की जाती है।
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दरअसल, दिवाली के उत्सव पर सीकर के महामंदिर रोड स्थित कल्याण जी मंदिर में सोलह दिवसीय पूजा विधान किया जाता है। 16 दिन के इस महापूजन में हर दिन का अपना अलग महत्व होता है, उस दिन के मुताबिक ही पोशाकें मां लक्ष्मी को धारण करवाई जाती है। पूजा का समापन दिवाली पर होता है। इस दिन प्रतिमा को दुल्हन के स्वरूप में सजाकर लाल जोड़ा पहना जाता है।
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मंदिर महंत की मानें तो मंदिर की स्थापना 1921 में हुई थी। स्थापना राव राजा कल्याण सिंह ने करवाई थी। माता लक्ष्मी का मंदिर गर्भ ग्रह से करीब पचास मीटर की दूरी पर स्थित है, जहां यह उत्सव आयोजित होता है। लक्ष्मी की अष्टधातु की मूर्ति है।
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मंदिर में सोलह दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत में लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु से अलग कर दिया जाता है। दिवाली की रात्रि पर प्रतिमा को फिर से गर्भ ग्रह में स्थापितकर दिया जाता है। इसके बाद सुबह साढ़े चार बजे बाद मां लक्ष्मी की आरती की जाती है।