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कोरोना संकट: नौकरी जाने की सबसे बुरी मार झेल रहे हैं युवा

Thu, 03 Sep 2020 10:13 PM IST
बीबीसी Published by: अनिल पांडेय Updated Thu, 03 Sep 2020 10:13 PM IST
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Youths are loosing jobs and suffering the worst condition of their lives
भारत में नौकरी पर संकट - फोटो : iStock

मई की शुरुआत में शालिका मदान को उनके दफ्तर से एक कॉल आया और उनसे कहा गया कि उन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है। शालिका दिल्ली के एक लॉ फर्म में काम करती थीं।

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38 साल की शालिका सिंगल मदर हैं। उनका एक बेटा है। उन्होंने इस कंपनी को अपनी जिंदगी के दो साल से भी ज्यादा का समय दिया लेकिन कोरोना की वजह से लगाए गए लॉकडाउन ने उनकी जिंदगी और नौकरी दोनों पर लगाम दी।
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शालिका कहती हैं, "मैंने नौकरी से नहीं निकाले जाने को लेकर उनसे गुहार लगाई। मैंने उनसे कहा कि मैं बिना सैलरी के भी काम कर लूंगी लेकिन मुझे नौकरी से ना निकालें। लेकिन मेरे बॉस ने कहा कि उनका धंधा और पैसा सब ख़त्म हो चुका है। वो मेरी हालत समझते हैं लेकिन वो असहाय हैं।"
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शालिका के पास एक दशक से अधिक का अनुभव है। सिर्फ शालिका ही नहीं महामारी की वजह से लाखों भारतीयों की नौकरी चली गई है।

सेंटर फॉर इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आकड़ों के मुताबिक, लॉकडाउन लगने के एक महीने के बाद से करीब 12 करोड़ लोग अपने काम से हाथ गंवा चुके हैं। अधिकतर लोग असंगठित और ग्रामीण क्षेत्र से हैं।

भारत की चालीस करोड़ नौकरियों में से अधिकांश असंगठित क्षेत्रों में ही हैं। सीएमआईई के मुताबिक, लॉकडाउन के दौरान अप्रैल के महीने में ऐसे सात करोड़ लोगों ने जिन्होंने अपना काम-धंधा गंवाया था, वो वापस काम पर लौट चुके हैं।

दोबारा आर्थिक गतिविधियों के शुरू होने और फसल की अच्छी पैदावर की वजह से ऐसा हो पाया है क्योंकि इससे ना सिर्फ बड़े पैमाने पर लोगों को काम मिला है बल्कि कृषि क्षेत्र में भी लोगों को अतिरिक्त काम मिला है। राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली जॉब गारंटी योजना ने भी इसमें मदद की है लेकिन यह ख़ुशख़बरी यहीं तक सीमित है।

सीएमआईई के आकलन के मुताबिक, वेतन पर काम करने वाले संगठित क्षेत्र में 1।9 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां लॉकडाउन के दौरान खोई हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक अन्य रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है कि 30 की उम्र के नीचे के करीब चालीस लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नौकरियाँ महामारी की वजह से गंवाई हैं। 15 से 24 साल के लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ा है।

सीएमआईई के मैनेजिंग डायरेक्टर महेश व्यास का कहना है, "ज्यादातर 30 साल से कम उम्र वाले प्रभावित हुए हैं। कंपनियां अनुभवी लोगों को रख रही हैं और नौजवानों पर इसकी मार पड़ रही है।" कई लोग मानते हैं कि यह भारत की धीमी होती अर्थव्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू है।

महेश व्यास बताते हैं, "ट्रेनी और प्रोबेशन पर काम करने वाले अपनी नौकरियां गंवा चुके हैं। कंपनियां कैंपस में जाकर नौकरियां नहीं दे रही हैं। किसी भी तरह की कोई नियुक्ति नहीं हो रही है। जब 2021 में काम की तलाश करने वाले युवाओं का अगला बैच ग्रेजुएट होगा तो वो बेरोजगारों की फौज में शामिल होंगे।"

नए ग्रेजुएट हुए लोगों को नौकरी नहीं देने का मतलब होगा आमदनी, शिक्षा और बचत पर विपरित प्रभाव पड़ना। महेश व्यास कहते हैं, "इससे नौकरी की तलाश करने वालों, उनके परिवार, अर्थव्यवस्था सब पर असर होगा।"

सैलरी में कटौती और मांग में सुस्ती आने से घरेलू आय पर भी नकारात्मक असर होगा। पिछले साल के सीएमआईई के सर्वे में पाया गया था कि करीब 35 प्रतिशत लोग मानते थे कि उनकी आय पिछले साल की तुलना में बेहतर हुई है जबकि इस साल सिर्फ दो फीसद लोगों का ऐसा मानना है।

निम्न वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोगों की आमदनी में कटौती हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वेतनभोगी लोगों ने लॉकडाउन के चार महीनों में करीब चार अरब डॉलर अपने जरूरी बचत से निकाला ताकि वो नौकरी जाने और सैलरी में हुई कटौती की भारपाई कर सकें।

महेश व्यास कहते हैं, "आय में आई कमी की ख़ासतौर पर मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग पर मार पड़ी है।" नौकरी नहीं रहने की वजह से ज्यादा से ज्यादा लोगों के हाथ से काम-धंधा छीन रहा है। लेकिन यह कोई अचानक से आयी तब्दीली नहीं है।

अर्थशास्त्री विनोज अब्राहम की ओर से 2017 में किए गए अध्ययन में यह बात साफ तौर पर सामने आयी थी कि 2013-14 और 2015-16 के बीच रोजगार में आजादी के बाद संभवत: पहली बार इतनी भारी गिरावट आई है। यह अध्ययन श्रम ब्यूरो से इकट्ठा किए गए डेटा को आधार बनाकर किया गया था।

श्रम भागीदारी से अर्थव्यवस्था में सक्रिय कार्यबल का पता चलता है। सीएमआईई के मुताबिक, यह श्रम भागीदारी 2016 में लागू की गई नोटबंदी के बाद 46 फीसद से घटकर 35 फीसद तक पहुँच गई थी। इसने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया। वर्तमान में मौजूदा 8 फीसद की बेरोजगारी दर इस बदतर स्थिति की हकीकत बयां नहीं करती है।

महेश व्यास कहते हैं, "ऐसा तब होता है जब नौकरी की तलाश करना बेकार हो जाता है क्योंकि नौकरी रहती ही नहीं है।" शालिका मदान इससे सहमत दिखती हैं। वो बताती हैं "दो दर्जन कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन दिए। यहां तक कि अपनी बचत और मां के पेंशन भी ख़र्च कर डाले लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली।"

वो कहती हैं, "मैंने नौकरी खोजना ही अब बंद कर दिया है।" आर्थिक असुरक्षा भारत में काफी बढ़ चुकी है। शोधकर्ता मैरिएन बर्ट्रेंड, कौशिक कृष्णन और हीथर स्कॉफिल्ड ने इस पर अध्ययन किया है कि भारतीय, लॉकडाउन की चुनौतियों से कैसे निपट रहे हैं।

उन्होंने अपने अध्ययन में पाया है कि सिर्फ 66 फीसद घरों के पास आर्थिक संकट का सामना करने के लिए दूसरे हफते से ज्यादा का संसाधन मौजूद है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी कह चुकी हैं कि सरकार नौकरी जाने की बात से इनकार नहीं करती है।

पिछले वित्त वर्ष के मासिक औसत की तुलना में जून में नई नौकरियों की संख्या में भी 60 फीसद की गिरावट आई है। पिछले हफ्ते निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा "भारत एक दैवीय घटना जैसी असमान्य स्थिति से गुजर रहा है।।।इस दौरान हम अर्थव्यवस्था में संकुचन देख सकते हैं।"

भारत में कोविड-19 के मामले 35 लाख के करीब होने जा रहे हैं और अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है। अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से सुधार की गुंजाइश अभी दूर की कौड़ी नजर आ रही है। असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही है।

लॉकडाउन के दौरान जिन लोगों के काम छूट गए थे और जो अपने गांव लौट चुके थे, वो अब लॉकडाउन की पाबंदियाँ हटने के साथ ही अपने काम की जगहों पर लौटना शुरू कर चुके हैं। इनमें से कुछ को ज्यादा पैसे भी दिए जा रहे हैं क्योंकि उनको काम पर रखने वाले जल्दी से जल्दी अपना व्यवसाय फिर से शुरू करना चाहते हैं।

लेबर इकोनॉमिस्ट केआर श्याम सुंदर का कहना है, "इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था खुलने के साथ ही बहुत सारे लोग अपने काम पर लौट आएंगे लेकिन वेतन पर काम करने वाले लोगों को समय लगेगा।"

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