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योगी जी ने नई गंगा तो बहाई नहीं फिर उपेन्द्र शुक्ला हार कैसे गए?

Fri, 16 Mar 2018 08:41 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Updated Fri, 16 Mar 2018 08:41 AM IST
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yogi didn't do anything new so how upendra shukla lost in electons

कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व मंत्री का कहना है कि गोरखपुर में मंदिर हार जाए, मुनासिब नहीं लगता? लेकिन भाजपा के लोकसभा उपचुनाव प्रत्याशी उपेन्द्र नाथ शुक्ला हार गए हैं। भाजपा इसकी समीक्षा कर रहा है, लेकिन भाजपा से ज्यादा विपक्ष खुशी मनाते हुए इसकी समीक्षा कर रहा है। भाजपा के पूर्वी उ.प्र. क्षेत्र से आने वाले एक केन्द्रीय मंत्री ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा है कि 37 प्रतिशत का मतदान बहुत कुछ कहता है। वहीं, गोरखपुर की राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले सूत्र का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वहां कोई नई गंगा तो बहाई नहीं है, फिर उपेन्द्र नाथ शुक्ला हार कैसे गए?

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क्या किया मुख्यमंत्री योगी ने?

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर और आस -पास कुछ भी नया नहीं किया है। वह नब्बे के दशक से गोरखपुर में जनहित में आंदोलन चलाते रहे हैं। युवा हिन्दू वाहिनी के सर्वे सर्वा रहे हैं। कट्टर हिन्दुत्व की अगुवाई करते रहे हैं और मठ के इस बाबा को हमेशा से मुस्लिम विरोधी तथा आक्रामक रुख के लिए जाना जाता रहा है। हाथ झटक-झटक कर जोश से भरा भाषण योगी की पहचान रही है और महंत अवैद्यनाथ का उत्तराधिकारी बनने के बाद से मठ का प्रमुख चेहरा भी योगी ही हैं।
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19 मार्च को मुख्यमंत्री बनने के बाद से उन्होंने इस रास्ते को नहीं छोड़ा। बाबा राघव दास मेडिकल कालेज में आक्सीजन की कमी से हुई दुर्घटना को छोड़ दें तो कोई और अप्रिय घटना नहीं हुई है। गोरखपुर से लगाव जस का तस है। वहां हवाई अड्डा, मेट्रो रेल परियोजना लेकर जा रहे हैं। गोरखपुर महोत्सव मनाया जा रहा है और केन्द्र तथा राज्य सरकार और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के भी जाने का क्रम बना हुआ है। विकास के कार्यों को लेकर योगी आदित्यनाथ के प्रतिनिधि उच्च स्तर पर संवेदनशील हैं और गोरखपुर से जुड़ी हर घटना पर खुद मुख्यमंत्री भी नजर रखते हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री गोरखपुर के विरोधियों को तेजी के साथ कमजोर करने की प्रक्रिया में अग्रसर हैं। एक पूर्व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के यहां छापा को भी इसी नजरिए से देखा जाता है। युवा हिन्दू वाहिनी का भी उ.प्र. में प्रभाव बढ़ रहा है। यह सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले भी कर रहे थे और अब इसे काफी विस्तार देकर कर रहे हैं।
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फिर क्यों हारे शुक्ला?

सामान्य चर्चा में कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरपीएन सिंह ने उपचुनाव से पहले चर्चा में कहा था कि गोरखपुर की योगी आदित्यनाथ की संसदीय सीट जीत पाना मुश्किल है। सिंह का कहना था कि वहां के लोग मंदिर को बमुश्किल ही हराएंगे? यह कभी जमाना था जब कांग्रेस वहां की सीट जीती थी। आरपीएन सिंह गलत नहीं हैं। गोरखपुर के गोरक्षनाथ पीठ के पूर्व महंत द्विजेन्द्रनाथ बड़े प्रभावशाली थे। मठ की राजनीतिक बुनियाद को उन्होंने काफी ताकत दी थी। उनके बाद महंत बने अवैद्यनाथ ने उनके राजनीतिक दर्शन को काफी हद तक स्थापित किया। योगी आदित्यनाथ उसमें कुछ नई परंपरा जोड़कर उसे आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिए महंत अवैद्यनाथ से लेकर योगी आदित्यनाथ तक सीट अभेद्य बनी रही।

हिन्दू युवा वाहिनी के वरिष्ठ सूत्र और योगी आदित्यनाथ की कृपा प्राप्त सूत्र ने उपचुनाव के मतदान से काफी पहले कहा था कि उपेन्द्र नाथ शुक्ला जी आदमी अच्छे हैं, लेकिन मठ के बाहर के प्रत्याशी हैं? कोशिश पूरी की जा रही है, देखिए क्या होता है? ठंडी सांस लेकर आए इस जवाब से लग रहा था कि कहीं शुक्ला जी का जीतना मुश्किल न हो जाए?

एक संदर्भ और महत्वपूर्ण है। कांग्रेस के गोरखपुर के अध्यक्ष कांग्रेस मुख्यालय आए थे। वह उपेन्द्र नाथ शुक्ला को प्रत्याशी बनाए जाने से काफी खुश थे। इसकी एक बड़ी वजह मठ के बाहर का उम्मीदवार होना था और दूसरी बड़ी वजह एक ऐसे उम्मीदवार का होना था, जिसे योगी आदित्यनाथ ने अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके कभी उभरने नहीं दिया।

घोषित नहीं किया उत्तराधिकारी

योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर संसदीय सीट से मुख्यमंत्री बनने के बाद इस्तीफा तो दे दिया था, लेकिन किसी को इस सीट पर अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था। इतना ही नहीं गोरक्षनाथ पीठ में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी को लेकर न तो कोई घोषणा की है और न ही किसी को इसके लिए उनके द्वारा तैयार करने के अभी तक संकेत हैं। लेकिन सूत्र बताते हैं कि योगी जी मंदिर के पुजारी कमलनाथ को लोकसभा उपचुनाव का टिकट दिलवाना चाहते थे। इसकी कोशिश भी हुई, लेकिन चली भाजपा आलाकमान की। यह कयास ही हैं कि योगी जी निश्चित रुप से इसे पचा नहीं पाए होंगे। ठीक वैसे ही जैसे उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से सामंजस्य बिठाने में वह थोड़ा सा असहज महसूस करते हैं। लेकिन यह सच था कि उपेन्द्र नाथ शुक्ला गोरखपुर से भाजपा के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके थे। यह भी सच था कि उन्हें जिताने की जिम्मेदारी योगी आदित्यनाथ के कंधों पर थी। इसलिए योगी और उनके कैबिनेट ने भरपूर मेहनत की।

क्या घट गई है योगी की ताकत?

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दोधारी तलवार पर चल रहे थे योगी

उपेन्द्र नाथ शुक्ला के साथ प्रचार में खड़े रहना योगी के लिए दोधारी तलवार पर चलना जैसा था। युवा हिन्दू वाहिनी के सदस्य सूत्र के मुताबिक जब लक्ष्य बड़ा हो तो निजी रिश्तों की जगह सिकुड़ जाती है। शायद इसे शीर्ष नेतृत्व भी समझ रहा था। योगी की नैतिक जिम्मेदारी उनकी निजी सोच के आगे उठकर खड़ी हो गई थी। इसलिए योगी आदित्यनाथ ने खुलकर प्रचार किया। हां, हिन्दू युवा वाहिनी ने पहले जैसा दमखम नहीं दिखाया। लोगों को बूथ तक लाने, वोट डलवाने की पहले की तरह कसरत नहीं हुई। लोग कम आए भी। मतदान भी घटा। गोरखपुर घंटाघर के पास रहने वाले सूत्र भी मानते हैं कि यदि मठ का उम्मीदवार होता तो जरूर फिजां थोड़ी बदली होती। यद्यपि भाजपा के एक सांसद इन सब को कोरी बकवास मानते हैं। उनका कहना है कि सपा-बसपा के साथ आने से विपक्ष के वोट बढ़ गए। सूत्र का कहना है कि यदि यह गठबंधन आगे जारी रहा तो राजनीतिक चुनौती काफी बढ़ सकती है।

एक बहस यह भी

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर में ब्रह्मण समर्थकों में पहले भी नहीं गिने जाते थे। हालांकि अमर मणि त्रिपाठी का परिवार योगी को अपना संरक्षक मानता है। उपेन्द्र शुक्ला ब्राह्मण होकर चुनाव हार गए हैं। हालांकि वह काफी पहले से योगी के कोपभाजन का शिकार माने जाते रहे हैं। अब गोरखपुर के ब्राह्मण नेता मान रहे हैं कि इससे वहां के ब्राह्मणों को झटका लगा है। यह झटका गोरखपुर के साथ-साथ आस-पास के जिलों में फैल रहे संदेश से लग सकता है। इसका भाजपा को आने वाले समय में नुकसान उठाना पड़ सकता है। कुल मिलाकर स्थानीय चर्चा में समाजवादी पार्टी और बसपा के मिलने से विपक्ष का वोट बैंक बढ़ा, मतदान में उन्हें लाभ मिला, लेकिन यह मानने वालों की अच्छी खासी संख्या है कि यदि मंदिर खुलकर साथ आया होता तो उपेन्द्र नाथ शुक्ला लोकसभा सदस्य होते। शुक्ला के करीबी भी इसे बमुश्किल पचा पा रहे हैं। लेकिन केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ल को भी चुनाव का नतीजा पचना मुश्किल है।

तो क्या घट गई योगी की ताकत?

गोरखपुर को ध्यान में रखकर यह कहना मुश्किल है। वहां के समीकरण को समझने वाले लोगों का मानना है कि गोरखपुर के लिए लोकसभा उपचुनाव का असर केवल तात्कालिक है। योगी आदित्यनाथ की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उनकी हिन्दू युवा वाहिनी गोरखपुर के आस-पास पहले से ज्यादा प्रभावी हुई है। हां, योगी आदित्यनाथ को जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था, वह छवि जरूर थोड़ी फीकी पड़ सकती है। योगी के विरोधी कुछ सक्रिय होने के लिए आक्सीजन पा सकते हैं। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से राज्य सरकार के कामकाज पर जनता की मुहर को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं। क्योंकि अब से करीब एक साल बाद ही गोरखपुर समेत पूरे देश में लोकसभा चुनाव होना है। इसके प्रचार का रास्ता योगी आदित्यनाथ के साथ ही आगे बढ़ेगा।

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