Yoga Day 2025: अमेरिका सहित कई देशों में 'योग' की धूम, भारतीय शिक्षकों पर डॉलर बरसा रहा पीएम मोदी का 'आइडिया'
संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में जब पीएम मोदी ने 'योग' का विचार दुनिया के समक्ष रखा और 21 जून 2015 को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया तो उसके बाद तस्वीर बदलती चली गई।
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीब एक दशक पहले 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' का आइडिया, दुनिया के सामने रखा था। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र में मोदी ने जब 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' का विचार, सदस्य राष्ट्रों के सामने रखा तो सभी ने उसका स्वागत किया। ये आइडिया काम कर गया और 11 दिसंबर, 2014 को यूएन के 193 सदस्य देश, 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस आयोजित करने पर सहमत हो गए। 21 जून, 2015 को जब पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया तो उसके बाद दुनिया में भारतीय योग शिक्षकों की मांग बढ़ने लगी। अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, जापान, अफ्रीका, हंगरी, बुलगारिया और स्पेन सहित अनेक देशों में बड़ी तादाद में लोग 'योग' सीख रहे हैं। भारतीय योग शिक्षकों पर डॉलर बरसने लगा है। हर साल सैंकड़ों भारतीय योग शिक्षक, किसी न किसी देश में पहुंच रहे हैं।
यूपी के ओरैया जिले में स्थित गेल में कार्यरत सदानंद, जिन्होंने इंटरनेशनल फाउंडेशन ऑफ योग प्रोफेशनल (आईएफवाईपी) जैसे बड़े संगठन को खड़ा करने में अहम योगदान दिया है, वे बताते हैं, आज भारतीय योग एक वैश्विक आंदोलन बन चुका है।
चौथा बैच, विदेश जाने के लिए तैयार
बतौर सदानंद, आईएफवाईपी ने बीते कई वर्षों में सैंकड़ों योग शिक्षक तैयार किए हैं। अब उनके संगठन से जुड़ी योग शिक्षक स्वाति कुमारी, अटलांटा 'यूएस' जाने के लिए तैयार हैं। आईएफवाईपी के जरिए योग शिक्षकों को ट्रेनिंग एवं उसके मॉड्यूल के बारे में बताया जाता है। विदेशों के प्रोटोकॉल की जानकारी दी जाती है। अब देश में अधिकांश प्रदेशों से योग शिक्षक, दूसरे मुल्कों में जा रहे हैं। कुछ निजी प्रयासों से तो बाकी योग संगठनों की मदद से वहां तक पहुंचते हैं। भारतीय दूतावास भी इस प्रयास में मदद करता है।
50 से अधिक योग शिक्षकों का चयन
आईएफवाईपी, एक माध्यम है। पहले लोगों को योग में प्रशिक्षित करते हैं और उसके बाद उन्हें एक कुशल ट्रेनर की भूमिका में ढाला जाता है। विदेश जाकर योग सिखाया जाए, इसके लिए प्रत्यक्ष एजेंसी तो सरकार ही है। इस बार आईएफवाईपी का चौथा बैच, विदेश जाने के लिए तैयार है। अभी तक तीन सौ से अधिक योग शिक्षक, दूसरे देशों में जा चुके हैं। पहले बैच में 150 तो दूसरे में लगभग 70 योग शिक्षकों को डॉलर कमाई का मौका मिला। कुछ प्रतिभागी, कोविड के चलते रह गए थे, उन्हें दोबारा से अवसर दिया गया। फिलहाल साढ़े तीन सौ योग शिक्षक तैयार हैं। इनमें पचास से अधिक योग शिक्षकों का चयन हो गया है।
लोगों के चेहरों पर संतोष, ये एक बड़ा पुरस्कार
यूएस जाने के लिए चयनित योग शिक्षिका स्वाति कुमारी के मुताबिक, प्रारंभ में योग मेरे लिए केवल एक शारीरिक अभ्यास था। आसनों और व्यायाम तक सीमित था। योग दर्शन, सांख्य और पतंजलि के सूत्र मुझे समझ नहीं आते थे। बुद्धि उस स्तर तक विकसित नहीं थी और ज्ञान को आत्मसात करने की समझ भी नहीं थी। धीरे-धीरे मैंने योग को जीवनशैली के रूप में अपनाना शुरू किया। आत्मनिरीक्षण, ध्यान और प्राणायाम के अभ्यास ने मेरे मन को स्थिर करना सिखाया। योग ने मेरी भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद की, और मैं पहले से अधिक स्थिर, आत्मविश्वासी और विवेकशील बनने लगी।" ज्ञान योग ने मुझे यह सिखाया कि केवल आसनों तक सीमित रहना योग नहीं है, यह तो मन, बुद्धि और आत्मा की एक गहन साधना है।
विदेशों में योग के महत्व को साझा कर सकूंगी
2016 में मुझे इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ योगा प्रोफेशनल्स से जुड़ने का अवसर मिला। मैंने देशभर में इस संगठन के साथ मिलकर योग शिविर और कार्यशालाएं आयोजित कीं। विभिन्न पाठ्यक्रमों का संचालन किया और समन्वयक की भूमिका निभाई। कॉर्पोरेट संस्थानों, विद्यालयों और समाज में योग के माध्यम से सकारात्मकता फैलाने का प्रयास किया। लोगों के चेहरों पर संतोष और शांति देखना मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था। हाल ही में मुझे आईसीसी की ओर से एक अंतरराष्ट्रीय अवसर मिला है, जहाँ मैं विदेशों में योग के महत्व को साझा कर सकूंगी। यह मेरे लिए न केवल गर्व की बात है, बल्कि एक उत्तरदायित्व भी है। मैं इसे एक नई शुरुआत के रूप में देखती हूँ। यह वैश्विक स्तर पर भारत की योग परंपरा को फैलाने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित होगा।
ये एक बड़े संघर्ष की कहानी है ...
'योग से बरस रहे डॉलर' बाबत सदानंद कहते हैं, ये एक बड़े संघर्ष की कहानी है। 2003 की बात है, जब उनकी मां को गठिया ने जकड़ लिया था। डॉक्टर, वैद्य और योगचार्यों से संपर्क किया गया। पतंजलि योगपीठ जैसे बड़े संगठनों के यहां भी गए। मां को आराम भी मिला, लेकिन उनकी पीड़ा मेरे लिए एक प्रेरणा का काम कर गई। इसके बाद सदानंद ने देश में योग की थोड़ी बहुत जानकारी रखने वालों को एकत्रित करना शुरू कर दिया। छोटी छोटी वर्कशॉप आयोजित की गई। विभिन्न संस्थानों से संपर्क किया गया। इस तरह योग सिखाने एक प्लेटफार्म तैयार हुआ। शुरुआत में आर्थिक दिक्कतें भी बहुत आई। छह साल पहले तक दिल्ली में वे एक स्थायी दफ्तर तक नहीं ले सके थे। एक योगाचार्य ने नजफगढ़ में एक कमरा हमें दिला दिया था। वह दफ्तर बाहरी दिल्ली में था, इसलिए उसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं हो सका। जब कोई बैठक, वर्कशॉप या सम्मेलन होता है तो गांधी पीस फाउंडेशन का हॉल किराए पर ले लेते थे। नौ-दस वर्ष पहले ऐसी ही एक जगह पर इंटरनेशनल फाउंडेशन ऑफ योग प्रोफेशनल (आईएफवाईपी) की स्थापना की गई।
प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से 2015 में बदली तस्वीर ...
संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में जब पीएम मोदी ने 'योग' का विचार दुनिया के समक्ष रखा और 21 जून 2015 को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया तो उसके बाद तस्वीर बदलती चली गई। बतौर सदानंद, हमने 2015 में एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया। धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। अक्तूबर 2016 में आयुष मंत्रालय के साथ बैठक हुई। फंड को लेकर मंत्रालय ने कहा, देखिये इस तरह तो डायरेक्ट फंड नहीं मिलेगा। इसके लिए रजिस्टर्ड बॉडी बनानी होगी। इसके बाद आईएफवाईपी को पंजीकृत कराया गया। आईएफवाईपी बनने के बाद अगला कदम योग को सर्वसुलभ बनाना था। देश-विदेश हर जगह पर योग को पहुंचाने का लक्ष्य तय कर दिया। इसके लिए देश-विदेश के उन सभी लोगों को साथ में लेने का काम शुरू हुआ, जिन्हें योग की हल्की-फुल्की जानकारी थी। बहुत से लोगों को 'डिप्लोमा-डिग्री इन योग' कराया गया। इंडस्ट्री के लोगों से बातचीत की गई। शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों को आईएफवाईपी से जोड़ा। पंजाब, चंडीगढ़, यूपी, राजस्थान गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल सहित कई राज्यों के अस्पतालों में योग शिक्षक मुहैया कराए गए। अब केंद्रीय मंत्रालयों और कॉरपोरेट जगत के साथ भी योग की क्लास प्रारंभ की गई हैं।
आईएफवाईपी से जुड़े 38 हजार से ज्यादा योगाचार्य ...
सदानंद के मुताबिक, जब आयुष मंत्रालय ने क्यूसीआई द्वारा योग प्रोफेशनल प्रमाणन की योजना शुरू की तो उसके बाद 38 हजार से ज्यादा योगचार्य प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर आईएफवाईपी से जुड़े चुके हैं। लोगों को योग की ट्रेनिंग दी और फिर उन्हें विदेशों में योगचार्य की जॉब दिलवाई। भारतीय योग शिक्षकों पर डॉलर की बरसात होने लगी। अब लक्ष्य यह है कि अपने देश के हर गांव-शहर और सरकारी-गैर सरकारी संगठन, सब जगह पर कम से कम एक योगचार्य रहे, जो लोगों को मानसिक और शारीरिक तौर पर स्वस्थ रख सके। इसके लिए छात्र, डॉक्टर, प्रोफेसर और एमएनसी कर्मी भी हमारे संगठन के साथ जुड़ रहे हैं। आईएफवाईपी द्वारा योग शिक्षकों को ट्रेनिंग देकर अमेरिका, ब्राजील, जापान, श्रीलंका, भूटान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, अफ्रीका, हंगरी, बुलगारिया, स्पेन व फिजी आदि देशों में योगचार्यों को भेजा जा चुका है। कुछ योगचार्यों दो-तीन सप्ताह यानी शॉर्ट टर्म तो कुछ दो साल की लॉंग टर्म के लिए विदेश जाते हैं।
प्रति महीना कमा रहे दो से ढ़ाई लाख रुपये ...
हर साल सौ से अधिक योग शिक्षकों को केंद्र सरकार के सहयोग से विदेश भेजा जा रहा है। कोविड के दौरान यह सिलसिला थम गया था। बतौर सदानंद, 2015 से पहले कोई सामान्य योग शिक्षक, विदेश नहीं जा पाता था। किसी अप्रोच वाले का ही नंबर लगता था। इसके बाद सामान्य लोग, योग सिखाने की ट्रेनिंग लेकर विदेश पहुंचने लगे। 2016 में पहला बैच विदेश गया था। इस साल भी स्क्रीनिंग के बाद सौ लोगों को विदेश भेजा गया है। योग शिक्षक, दो वर्ष के लिए विदेश जाते हैं और प्रति माह दो से ढाई लाख रुपये कमा लेते हैं। कई योग शिक्षकों को दोबारा से दो वर्ष के लिए विदेश में रहने का अवसर मिल जाता है। मोदी सरकार ने जब से योग को अपने प्राइम एजेंडे में शामिल किया है, तब से योग के प्रति दुनिया का झुकाव हुआ है। अब तो इस फील्ड में आईटी व मेनेजमेंट वाले लोग भी आ रहे हैं।
आईसीसीआर-विदेश मंत्रालय का अहम योगदान ...
सदानंद के अनुसार, सभी योगाचार्य आईसीसीआर-विदेश मंत्रालय के माध्यम से ही दूसरे देशों में भेजे जाते हैं। रिपब्लिक ऑफ कोरिया सियोल में सोमा दत्ता, बहरीन में रुद्रीश कुमार सिंह, सेशेल्स हाईकमीशन विक्टोरिया में ललिता संचेती, यूएसए में एंजेला माजरेकर, पापुआ न्यूगिनी में अजित सिंह अहलावत, नेपाल में संजय माचे और पीपी कृष्णन व हंगरी में अंकिता सूद आदि योग शिक्षक अपनी सेवाएं दे चुके हैं। विदेश जाने के लिए किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से योग में डिग्री, डिप्लोमा का प्रमाण-पत्र व अनुभव होना चाहिये। चयन इंटरव्यू प्रक्रिया के तहत होता है। संस्कृत और अंग्रेजी जानने वालों को प्रमुखता दी जाती है।