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चिंतित कांग्रेस को अब प्रणब दा के भाषण का इंतजार, आरएसएस समारोह पर बनाई ये रणनीति
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 30 May 2018 10:30 AM IST
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प्रणब मुखर्जी
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आरएसएस प्रचारकों के 7 जून के दीक्षांत समारोह में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषण को लेकर कांग्रेस में चिंता साफ देखी जा सकती है। लेकिन पार्टी की मनोदशा यह है कि वह नागपुर में कार्यक्रम से पहले कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहती। कांग्रेस के प्रवक्ता टॉम वडक्कन ने "किसी भी टिप्पणी से इंकार" करने वाली लाइन पकड़ ली है, लेकिन यह स्पष्ट किया कि "कांग्रेस और आरएसएस की विचारधारा में बहुत अंतर है।"
पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता अभिषेष मनु सिंघवी ने कहा, "मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने के बाद राजनीति छोड़ दी। किसी दीक्षांत समारोह में उनका बोलना उनकी अपनी मान्यताओं के बारे में कोई संकेत नहीं है। वह क्या कहते हैं और उनके राजनीतिक जीवन के 50 वर्षों में उनकी स्थापित मान्यताओं से उनका मूल्यांकन करें।" मुखर्जी को जानने वाले ने बताया कि है वह आरएसएस की सभा में राष्ट्रवाद की" वास्तविक भावना" पर विचार रख सकते हैं। यह विचार हिंदुत्व खेमे से जुड़े "विशिष्टतावादी" दृष्टिकोण की आलोचना हो सकती है।
हालांकि, चिंताएं होना लाजिमी है। एक कांग्रेस नेता ने कहा कि आरएसएस शिविर में मुखर्जी की उपस्थिति कांग्रेस और 'धर्मनिरपेक्ष' शिविर के लिए खराब संकेत साबित हो सकते हैं। एक वरिष्ठ और बड़े 'धर्मनिरपेक्ष' व्यक्ति द्वारा आरएसएस मुख्यालय का दौरा करना उस संस्था के लिए अंतिम स्वीकृति होगी जिसे अभी भी कांग्रेस "अछूत" मानती है और जिसे राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर किए जाने वाले अपने हर हमले में शुमार करते हैं।
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वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सीके जाफर शरीफ ने चिट्ठी लिखकर मुखर्जी से अपील की है कि वे अपने इस दौरे को रद्द कर दें। शरीफ ने "सदमा और निराशा" व्यक्त करते हुए कहा, "मैं उन जरूरी कारणों को समझने में असमर्थ हूं।" लेकिन कांग्रेस के अनुभवी नेता एच आर भारद्वाज ने मुखर्जी की यात्रा का समर्थन किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि एआईसीसी के महाधिवेशनों में सभी प्रस्तावों के मसौदों को तैयार करने वाले मुखर्जी ने बुराड़ी अधिवेशन में आरएसएस पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था और साथ ही साथ राष्ट्र के आधारभूत सिद्धांतों पर "सांप्रदायिकता" से हमला करने के लिए संगठन को फटकार लगाई थी।
दिल्ली से कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने सवाल किया, "यदि आरएसएस ने ऐसे विचारों वाले व्यक्ति को आमंत्रित किया है, तो इसका मतलब यह है कि आरएसएस स्वीकार करता है कि संगठन के बारे में उनके (मुखर्जी) विचार सही थे।"
मुखर्जी का बचाव करने वाले नेताओं का कहना है कि दो वास्तविकताओं में सामंजस्य बैठाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि विशुद्ध राजनीतिक लगने वाले आक्रामक हमलों की बजाए आरएसएस की आलोचना करना वैचारिक लड़ाई करने का एक बेहतर तरीका था, खास तौर पर 2014 के बाद से। मुखर्जी के आरएसएस के निमंत्रण को स्वीकार करने के विभिन्न मतों के बीच, सबकी निगाह अब इस बात पर टिकी हुई है कि राष्ट्रपति क्या कहते हैं और उनकी लहजा क्या होगा।
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पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता अभिषेष मनु सिंघवी ने कहा, "मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने के बाद राजनीति छोड़ दी। किसी दीक्षांत समारोह में उनका बोलना उनकी अपनी मान्यताओं के बारे में कोई संकेत नहीं है। वह क्या कहते हैं और उनके राजनीतिक जीवन के 50 वर्षों में उनकी स्थापित मान्यताओं से उनका मूल्यांकन करें।" मुखर्जी को जानने वाले ने बताया कि है वह आरएसएस की सभा में राष्ट्रवाद की" वास्तविक भावना" पर विचार रख सकते हैं। यह विचार हिंदुत्व खेमे से जुड़े "विशिष्टतावादी" दृष्टिकोण की आलोचना हो सकती है।
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हालांकि, चिंताएं होना लाजिमी है। एक कांग्रेस नेता ने कहा कि आरएसएस शिविर में मुखर्जी की उपस्थिति कांग्रेस और 'धर्मनिरपेक्ष' शिविर के लिए खराब संकेत साबित हो सकते हैं। एक वरिष्ठ और बड़े 'धर्मनिरपेक्ष' व्यक्ति द्वारा आरएसएस मुख्यालय का दौरा करना उस संस्था के लिए अंतिम स्वीकृति होगी जिसे अभी भी कांग्रेस "अछूत" मानती है और जिसे राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर किए जाने वाले अपने हर हमले में शुमार करते हैं।
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वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सीके जाफर शरीफ ने चिट्ठी लिखकर मुखर्जी से अपील की है कि वे अपने इस दौरे को रद्द कर दें। शरीफ ने "सदमा और निराशा" व्यक्त करते हुए कहा, "मैं उन जरूरी कारणों को समझने में असमर्थ हूं।" लेकिन कांग्रेस के अनुभवी नेता एच आर भारद्वाज ने मुखर्जी की यात्रा का समर्थन किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि एआईसीसी के महाधिवेशनों में सभी प्रस्तावों के मसौदों को तैयार करने वाले मुखर्जी ने बुराड़ी अधिवेशन में आरएसएस पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था और साथ ही साथ राष्ट्र के आधारभूत सिद्धांतों पर "सांप्रदायिकता" से हमला करने के लिए संगठन को फटकार लगाई थी।
दिल्ली से कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने सवाल किया, "यदि आरएसएस ने ऐसे विचारों वाले व्यक्ति को आमंत्रित किया है, तो इसका मतलब यह है कि आरएसएस स्वीकार करता है कि संगठन के बारे में उनके (मुखर्जी) विचार सही थे।"
मुखर्जी का बचाव करने वाले नेताओं का कहना है कि दो वास्तविकताओं में सामंजस्य बैठाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि विशुद्ध राजनीतिक लगने वाले आक्रामक हमलों की बजाए आरएसएस की आलोचना करना वैचारिक लड़ाई करने का एक बेहतर तरीका था, खास तौर पर 2014 के बाद से। मुखर्जी के आरएसएस के निमंत्रण को स्वीकार करने के विभिन्न मतों के बीच, सबकी निगाह अब इस बात पर टिकी हुई है कि राष्ट्रपति क्या कहते हैं और उनकी लहजा क्या होगा।