World Autoimmune Arthritis Day: हल्के में न लें जोड़ों का दर्द, रोगियों में हार्ट अटैक-ब्रेन स्ट्रोक का जोखिम
बढ़ती उम्र में होने वाला गठिया यानी आर्थराइटिस अब 20 से 22 साल के युवाओं में सबसे ज्यादा देखने को मिल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक देश के 22 करोड़ से ज्यादा लोग जोड़ों में सूजन और दर्द यानी गठिया से ग्रस्त हैं। यह बीमारी दिव्यांगता का कारण भी बन सकती है। परीक्षित निर्भय की रिपोर्ट...
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विस्तार
आजीवन असहनीय दर्द, पैरों में कंपन, कूल्हे में सूजन
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के रुमेटोलॉजी विभाग के वरिष्ठ डॉ. रंजन गुप्ता बताते हैं कि गठिया की एक स्थिति एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस भी है। यह बीमारी मरीज को आजीवन रहती है। इसमें असहनीय दर्द होता है, पैरों में कंपन, कूल्हे में सूजन रहती है। शुरुआत में कुछ साल तक मरीज को हल्का दर्द रह सकता है, लेकिन शरीर में विटामिन, कैल्शियम की कमी होने, प्रोटीन और ईएसआर बढ़ने से उसकी हालत बिगड़ने लगती है। दीवार पकड़ कर चलना, करवट न ले पाना, रीढ़ का आगे की ओर झुकना, जैसी समस्याएं हमेशा रहती हैं।
नवजात शिशुओं में भी गठिया
डॉक्टरों के अनुसार, गठिया की बीमारी सिर्फ 40 साल या उससे अधिक आयु वालों में नहीं रह गई है, अब 20 से 22 साल तक की आयु के युवा भी इसकी चपेट में हैं। गठिया का एक प्रकार ऐसा भी है, जो नवजात शिशुओं में हो सकता है। अगर मरीजों के आंकड़े देखें तो भारत में 22 करोड़ से ज्यादा गठिया रोगी हैं, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है।
एक बीमारी के इतने रूप
- रुमेटाइड आर्थराइटिस
- शोग्रिन सिंड्रोम
- सोरियाटिक आर्थराइटिस
- सिस्टेमेटिक लुपस एरिथेमेटोसस
- अडल्ट ऑनसेट स्टिल्स डिजीज
- ऐंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस
- जूवेनाइल इडियोपैथिक आर्थराइटिस
यहां अलर्ट हो जाएं...
- 6 सप्ताह या इससे ज्यादा समय तक जोड़ों में निरंतर दर्द रहना।
- जोड़ों में सूजन आना।
- शरीर में जकड़न महसूस होना, जो आराम करने से और बढ़ जाए।
- जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, आनुवंशिक स्थिति और धूम्रपान कर रहे हड्डियां कमजोर
बीच में छोड़ देते हैं इलाज
नई दिल्ली स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के निदेशक डॉ. अजय कुमार शुक्ला बताते हैं... उनके पास ऐसे कई मरीज आते हैं, जिनकी इतिहास देखने के बाद पता चलता है कि वह रुमेटोलॉजी का रोगी है और उसने अपना इलाज बीच में ही छोड़ दिया। कुछ साल बाद फिर से दर्द होने लगता है तो वह
अस्पताल आते हैं।
विश्व ऑटोइम्यून ऑर्थराइटिस दिवस (सांकेतिक तस्वीर)।
आर्थराइटिस यानी गठिया किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। यह शब्द 200 से भी ज्यादा बीमारियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर यह परेशानी 60 साल या उसके बाद लोगों में होती है, लेकिन यह बीमारियां 20 से 30 साल की आयु वाले युवाओं को भी बुजुर्ग जैसा बना देती हैं। एक समय बाद दर्द निवारक गोलियां भी असर बंद करने लगती हैं। - डॉ. उमा कुमार, रुमेटोलॉजी विभागाध्यक्ष, एम्स, नई दिल्ली
- ऐसे मरीजाें का शरीर लचीला नहीं होता और फुर्ती कम होती है।
- लंबे समय एक जगह बैठ जाएं तो उठने पर आगे की ओर झुकते हैं।
- लेटने पर करवट लेने में भी समस्या होती है।
सालों तक भ्रम में रहते हैं मरीज
इन ऑटोइम्यून बीमारियों का सबसे बड़ा नुकसान समय पर रोग की पहचान नहीं होना है। एक मरीज सालों तक इसी भ्रम में रहता है कि उसे दर्द सर्वाइकल या फिर मांसपेशियों में खिंचाव की वजह से हो रहा है। वह दर्द निवारक गोलियों का सेवन करता है। व्यायाम करता है। जब इनमें से किसी से आराम नहीं मिलता, तब इलाज कराने डॉक्टर के पास पहुंचता है। तब तक यह बीमारियां उसके शरीर खासतौर पर जोड़ों को काफी नुकसान पहुंचा चुकी होती हैं।
दिनचर्या सुधारने की जरूरत
जो लोग इन बीमारियों से पीड़ित हैं, उन्हें दवाओं के साथ-साथ अपनी दिनचर्या को भी सुधारने की जरूरत है।''
- सुबह उठने के बाद सूर्य नमस्कार इनके शरीर को लचीला बनाने में मदद कर सकता है।
- दिन और रात के भोजन में हरी सब्जियां और फलों का सेवन होना चाहिए।
- सुबह और शाम व्हीट ग्रास जूस फायदेमंद हो सकता है।
- विटामिन और कैल्शियम के साथ शरीर में प्रोटीन मात्रा की निगरानी भी रखें।
मोटापा, सिगरेट और शराब से बड़ा जोखिम
- अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के एक अध्ययन के मुताबिक मोटापे से जूझ रहे तीन में से एक व्यक्ति को आर्थराइटिस या गठिया है, जबकि तीन में से दो अमेरिकियों का या तो वजन ज्यादा है या वे मोटापे से ग्रस्त हैं।
- दिल्ली एम्स का एक अध्ययन बताता है कि सिगरेट और शराब का सेवन गठिया रोगियों के लिए एक ट्रिगर का काम करता है। ऐसे मरीजों में दवाओं का असर भी कम होता है।