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घर में कृष्ण और राम जैसे बच्चों की चाह बढ़ी, बच्चे पैदा करने का पसंदीदा दिन जन्माष्टमी और रामनवमी

Tue, 11 Sep 2018 05:41 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली Updated Tue, 11 Sep 2018 05:41 PM IST
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women wants to deliver child on auspicious day like janmashtami and ram navami

महिलाएं अपनी डिलीवरी के लिए एक खास दिन चुनने लगी हैं। बच्चा पैदा करना है, कौन से दिन करना है, कितने बजे करना है, कौन सा दिन शुभ है, कौन सा पल और प्रहर शुभ है अब यह सब आधुनिक युग में नया ट्रेंड बनता जा रहा है।  फिलहाल डिलीवरी का जो ट्रेंड देखने को मिल रहा है, उसके मुताबिक अनेक गर्भवती महिलाएं कृष्ण जन्माष्टमी के दिन अपनी संतान को जन्म देना चाहती हैं। दूसरे नंबर पर रामनवमी का दिन आता है। शिवरात्रि भी डिलीवरी के पसंदीदा दिनों में शुमार हो गई है।

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अब महिलाएं शुभ दिन, शुभ पल के साथ अपने बच्चे को दुनिया में ला रहे हैं। लिहाजा वह मनपसंद डिलीवरी की तारीख भी ले रही हैं यह अलग बात है कि महिलाओं को इसके लिए थोड़ा कष्ट  सहना पड़ रहा है। हालांकि ऐसी ज्यादातर डिलीवरी सर्जरी के द्वारा ही संभव हो पाती हैं। वैसे कई बार नॉमर्ल डिलीवरी भी होती है। 
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मनपसंद डिलीवरी डेट, मेट्रो सिटी से अब छोटे शहरों में पहुंचा है यह ट्रेंड

महिला विशेषज्ञों के मुताबिक, पहले केवल मेट्रो सिटी तक ही मनपसंद डिलीवरी डेट लेने का ट्रेंड था। इसमें भी संभ्रांत परिवारों की महिलाएं ही आगे आती थीं। लेकिन अब धीरे-धीरे यह ट्रेंड छोटे शहरों, कस्बों से होता हुआ मध्यम आय वर्ग वाले परिवारों में मनपसंद डिलीवरी डेट का चलन बढ़ रहा है।  
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डॉक्टर क्या कहते हैं, मनपसंद डिलीवरी सही है गलत

रॉकलैंड अस्पताल की महिला विशेषज्ञ डॉक्टर शीतल का कहना है कि आजकल यह चलन बढ़ता जा रहा है। ज्यादातर गर्भवती महिलाएं चाहती हैं कि उनके घर में जन्माष्टमी के दिन किलकारी गूंजे। रामनवमी को भी महिलाएं डिलीवरी के लिए बहुत अच्छा दिन मानती हैं। इसके बाद शिवरात्रि का नंबर आता है।

कुछ दिन दूसरे भी हैं जिन्हें महिलाएं विशेषरूप से पसंद करती हैं। मनपसंद डिलीवरी डेट के लिए ज्यादातर महिलाओं को सर्जरी से होकर गुजरना पड़ता है। डॉक्टर शीतल बताती हैं कि सामान्य तौर पर 40 सप्ताह या नौ माह प्लस एक सप्ताह पूरा होने पर नॉमर्ल डिलीवरी हो जाती है। 37 सप्ताह के बाद कभी भी डिलीवरी की जा सकती है। समय से पहले डिलीवरी में 18-20 घंटे लगते हैं।

कुछ केस तो ऐसे भी आते हैं कि जिनमें किन्ही खास धार्मिक मान्यता को ध्यान में रखकर डिलीवरी का समय तय किया जाता है। जैसे, दिन के किसी विशेष पहर में, शाम को या रात का कोई विशेष समय, यह सब भी डिलीवरी के लिए देखा जाने लगा है। अगर गर्भकाल के 37 सप्ताह पूरे हो गए हैं तो डिलीवरी में कोई दिक्कत नहीं आती है। जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित रहते हैं। इस बार जन्माष्टमी पर एक दिन में मनपसंद डिलीवरी के करीब 70-80 केस तक आए हैं। यह तो बड़े अस्पतालों की औसत  गिनती हैं। छोटे अस्पतालों में भी जन्माष्टमी पर समय पूर्व डिलीवरी कराई गई हैं।

women wants to deliver child on auspicious day like janmashtami and ram navami
Janmashtami Celebration 2018

ज्योतिषियों की नजर में मनपसंद डिलीवरी गलत है, नवजात में कोई न कोई कमी मिलेगी

मेडिकल साइंस जैसे विषयों पर रिसर्च करने वाले ज्योतिषाचार्य राजीव नारायण शर्मा मनपसंद डिलीवरी डेट को ठीक नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि यह गलत है। प्राकृतिक नियमों के खिलाफ है। इन तरीकों से नवजातों का न तो लग्न बदला जा सकता है और न ही कोई दूसरा प्रयोजन पूरा हो सकता है। यह केवल मन का वहम है कि हमारा बच्चा जन्माष्टमी को पैदा हो या फिर रामनवमी को। समय पूर्व बच्चे के जन्म से किसी गृह आदि में बदलाव हो जाएगा, यह बात पूरी तरह अतार्किक है। इससे कुछ नहीं हो सकता। शर्मा का कहना है कि अगर गर्भकाल के प्राकृतिक चक्र से छेड़छाड़ होती है तो नवजात में अवश्य ही कोई न कोई कमी होगी। शरीर के किसी अंग की बनावट या आकार में न्यूनाधिक अंतर तो मिलेगा ही। यदि बच्चे का जन्म तय समय से पांच-छह घंटे पहले भी कराया जाता है तो सांस चलने या धड़कन आदि में कुछ न कुछ फर्क मिलेगा।

नॉमर्ल डिलीवरी के मुकाबले सिजेरियन केस बढ़ते जा रहे हैं

स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में नॉमर्ल डिलीवरी के मुकाबले सिजेरियन केस तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। मनपसंद डिलीवरी डेट या दर्द नहीं सहने की बात हो, दोनों के चलते सर्जरी केस अधिक देखने को मिल रहे हैं। 

तमिलनाडु में 2006 के दौरान सर्जरी से डिलीवरी कराने का प्रतिशत 20.3 था, 2016 में वह 34 प्रतिशत हो गया है, गोवा में 25 से 31 प्रतिशत, मणिपुर में 9 से 21, असम में 5.3 से 13.4 और ओडिसा में 5.1 से 13.8 प्रतिशत पहुंच गया है। प्राइवेट अस्पतालों में सर्जरी दर 54 प्रतिशत तो सरकारी अस्पतालों में यह दर 23.7 प्रतिशत है। त्रिपुरा के प्राइवेट हॉस्पिटलों में सर्जरी से डिलीवरी कराने का प्रतिशत 74 है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह प्रतिशत महज 18 है। पश्चिम बंगाल के निजी चिकित्सा संस्थानों में 70.9 प्रतिशत केस सर्जरी से डिलीवरी कराने के आते हैं तो वहीं सरकारी अस्पतालों में यह दर 18.8 प्रतिशत है।

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