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महिला आरक्षण: कभी इसकी प्रति फाड़ी गई, कभी हाथापाई की नौबत आई, 27 साल में कब कैसे हंगामे की भेंट चढ़ा विधेयक
Wed, 20 Sep 2023 08:06 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Wed, 20 Sep 2023 08:06 PM IST
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महिला आरक्षण विधेयक
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AMAR UJALA
विस्तार
नारी शक्ति वंदन विधेयक बुधवार को लोकसभा में पास हो गया। गुरुवार को इस पर ऊपरी सदन यानी राज्य सभा में चर्चा हो सकती है। इससे पहले 2010 में राज्यसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक पास हुआ था, लेकिन लोकसभा में पास नहीं हो सका था। लोकसभा मे ंपहली बार महिला आरक्षण से जुड़ा कोई बिल पास हुआ है।बीते 27 साल से महिला आरक्षण विधेयक को पास कराने की कई कोशिशें हो चुकी हैं। कई बार इससे जुड़े बिल और विरोध के कारण गिर गए। लिहाजा हमें जानना चाहिए कि पहले कब-कब महिला आरक्षण विधेयक लाए गए? ये विधेयक क्यों पारित नहीं हुए? समर्थन में कौन और विरोध में कौन था?
महिला आरक्षण विधेयक
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AMAR UJALA
पहले जानते हैं क्या है महिला आरक्षण विधेयक?
मंगलवार को महिला आरक्षण से जुड़ा बिल लोकसभा में पेश हुआ जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण का प्रावधान है। इसी 33 फीसदी में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी है।
मंगलवार को महिला आरक्षण से जुड़ा बिल लोकसभा में पेश हुआ जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण का प्रावधान है। इसी 33 फीसदी में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी है।
महिला आरक्षण विधेयक
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AMAR UJALA
देश में महिला आरक्षण कब-कब पेश हुआ?
देश की संसद में महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 1996 में पेश हुआ। एचडी देवगौड़ा वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को 81वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। यह विधेयक तत्कालीन कानून मंत्री रमाकांत डी खलप द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था, तब सत्तारूढ़ पक्ष में एक राय नहीं बन सकी थी।
लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव समेत कई नेताओं ने संशोधन की मांग करते हुए इसका विरोध जताया। विधेयक को अंततः लोकसभा की तत्कालीन सदस्य गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया।
लोकसभा ने बिल के विरोध में शरद यादव ने कहा था, 'कौन महिला है, कौन नहीं है, केवल बाल-कटी महिला बाहर नहीं रहने देंगे।' वहीं मुलायम सिंह यादव ने कहा था, 'बड़े घर की लड़कियों और महिलाओं को फायदा मिलेगा, हमारे गांव की गरीब महिलाओं को नहीं। वे आकर्षक नहीं होती, बस इतना कहूंगा ज्यादा नहीं।'
देश की संसद में महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 1996 में पेश हुआ। एचडी देवगौड़ा वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को 81वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। यह विधेयक तत्कालीन कानून मंत्री रमाकांत डी खलप द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था, तब सत्तारूढ़ पक्ष में एक राय नहीं बन सकी थी।
लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव समेत कई नेताओं ने संशोधन की मांग करते हुए इसका विरोध जताया। विधेयक को अंततः लोकसभा की तत्कालीन सदस्य गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया।
लोकसभा ने बिल के विरोध में शरद यादव ने कहा था, 'कौन महिला है, कौन नहीं है, केवल बाल-कटी महिला बाहर नहीं रहने देंगे।' वहीं मुलायम सिंह यादव ने कहा था, 'बड़े घर की लड़कियों और महिलाओं को फायदा मिलेगा, हमारे गांव की गरीब महिलाओं को नहीं। वे आकर्षक नहीं होती, बस इतना कहूंगा ज्यादा नहीं।'
संसद सत्र
- फोटो :
PTI
अटल सरकार में लाए गए विधेयकों के दौरान फाड़ी गई प्रतियां
जेपीसी ने नौ दिसंबर 1996 को 11वीं लोकसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की। बाद में इस विधेयक को 26 जून 1998 को अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 84वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में 12वीं लोकसभा में फिर से पेश किया गया। 1998 में जब इस विधेयक को पेश करने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री थंबी दुरै खड़े हुए थे। उस वक्त संसद में भारी हंगामा हुआ। यहां तक कि हाथापाई भी हुई। कुछ सांसदों ने उनके हाथ से विधेयक की प्रति को लेकर लोकसभा में ही फाड़ दिया था।
उस दौरान आरजेडी सांसद सुरेंद्र प्रकाश यादव ने लाल कृष्ण आडवाणी के हाथ से कॉपी छीनकर फाड़ दी। इसके बाद सुरेंद्र अपने साथी अजित कुमार मेहता के साथ स्पीकर की टेबल की और बढ़े ताकि बाकी बची कॉपियों को फाड़ा जा सके।
उस वक्त राज्यसभा में जब विधेयक रखा गया तो सदन में विपक्षी सांसदों ने जमकर हंगामा भी किया। राज्यसभा में बिल लाए जाने पर सदन में सुभाष यादव (आरजेडी), साबिर अली (एलजेपी), वीरपाल सिंह यादव (एसपी), नंद किशोर यादव (एसपी), अमीर आलम खान और कमाल अख्तर (एसपी) और इजाज अली ने हंगामा किया। लिहाजा सांसदों को निलंबित कर दिया गया।
इसे 2002 में और 2003 में सदन में लाया गया, लेकिन फिर भी यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
जेपीसी ने नौ दिसंबर 1996 को 11वीं लोकसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की। बाद में इस विधेयक को 26 जून 1998 को अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 84वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में 12वीं लोकसभा में फिर से पेश किया गया। 1998 में जब इस विधेयक को पेश करने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री थंबी दुरै खड़े हुए थे। उस वक्त संसद में भारी हंगामा हुआ। यहां तक कि हाथापाई भी हुई। कुछ सांसदों ने उनके हाथ से विधेयक की प्रति को लेकर लोकसभा में ही फाड़ दिया था।
उस दौरान आरजेडी सांसद सुरेंद्र प्रकाश यादव ने लाल कृष्ण आडवाणी के हाथ से कॉपी छीनकर फाड़ दी। इसके बाद सुरेंद्र अपने साथी अजित कुमार मेहता के साथ स्पीकर की टेबल की और बढ़े ताकि बाकी बची कॉपियों को फाड़ा जा सके।
उस वक्त राज्यसभा में जब विधेयक रखा गया तो सदन में विपक्षी सांसदों ने जमकर हंगामा भी किया। राज्यसभा में बिल लाए जाने पर सदन में सुभाष यादव (आरजेडी), साबिर अली (एलजेपी), वीरपाल सिंह यादव (एसपी), नंद किशोर यादव (एसपी), अमीर आलम खान और कमाल अख्तर (एसपी) और इजाज अली ने हंगामा किया। लिहाजा सांसदों को निलंबित कर दिया गया।
इसे 2002 में और 2003 में सदन में लाया गया, लेकिन फिर भी यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
यूपीए सरकार के साझा कार्यक्रम में शामिल रहा बिल
जब मई 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई, तो विधेयक को गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में जगह मिली। इसमें कहा गया था कि यूपीए सरकार विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के लिए कानून लाने का कदम उठाएगी। लेकिन यूपीए सरकार भी लोकसभा में विधेयक पास करने में विफल रही।
जब मई 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई, तो विधेयक को गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में जगह मिली। इसमें कहा गया था कि यूपीए सरकार विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के लिए कानून लाने का कदम उठाएगी। लेकिन यूपीए सरकार भी लोकसभा में विधेयक पास करने में विफल रही।
असदुद्दीन ओवैसी
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अमर उजाला
2010 से लटका हुआ है महिला आरक्षण बिल
महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108वां विधेयक 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में 2008 में पेश हुआ था। विधेयक को राज्यसभा में पेश किया गया और कानून और न्याय पर स्थायी समिति को भेजा गया। स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की। वहीं समाजवादी पार्टी, जदयू और राजद के विरोध के बीच विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया। महिला आरक्षण विधेयक 2010 में राज्यसभा में भारी बहुमत से पारित हुआ। चार साल तक यह लंबित रहा और 2014 में समाप्त हो गया। राज्यसभा से पास होने के बाद भी यह दोबारा लोकसभा से पास नहीं हो पाया। इसकी बड़ी वजह सपा, बसपा और आरजेडी का कड़ा विरोध और कोटे के भीतर कोटे की मांग था जिसके चलते ये विधेयक अधर में लटका गया
2010 में सपा सांसद अबु आजमी और उनके साथी सांसदों ने सदन में तत्कालीन कानून मंत्री हंसराज भरद्वाज के हाथों से बिल की कॉपियां छीनने की कोशिश की। इस दौरान मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि कि अगर महिला आरक्षण विधेयक पारित हो गया, तो संसद उन महिलाओं से भर जाएगी जो शोर मचाएंगी और सीटियां बजाएंगी।
असदुद्दीन ओवैसी ने बिल को प्रतिगामी करार दिया और कहा कि यह मुस्लिमों के हित के लिए नहीं है। उन्होंने यह भी दावा किया कि महिला आरक्षण विधेयक से सदन अंततः 'हिंदू लोकसभा' में बदल जाएगा।
महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108वां विधेयक 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में 2008 में पेश हुआ था। विधेयक को राज्यसभा में पेश किया गया और कानून और न्याय पर स्थायी समिति को भेजा गया। स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की। वहीं समाजवादी पार्टी, जदयू और राजद के विरोध के बीच विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया। महिला आरक्षण विधेयक 2010 में राज्यसभा में भारी बहुमत से पारित हुआ। चार साल तक यह लंबित रहा और 2014 में समाप्त हो गया। राज्यसभा से पास होने के बाद भी यह दोबारा लोकसभा से पास नहीं हो पाया। इसकी बड़ी वजह सपा, बसपा और आरजेडी का कड़ा विरोध और कोटे के भीतर कोटे की मांग था जिसके चलते ये विधेयक अधर में लटका गया
2010 में सपा सांसद अबु आजमी और उनके साथी सांसदों ने सदन में तत्कालीन कानून मंत्री हंसराज भरद्वाज के हाथों से बिल की कॉपियां छीनने की कोशिश की। इस दौरान मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि कि अगर महिला आरक्षण विधेयक पारित हो गया, तो संसद उन महिलाओं से भर जाएगी जो शोर मचाएंगी और सीटियां बजाएंगी।
असदुद्दीन ओवैसी ने बिल को प्रतिगामी करार दिया और कहा कि यह मुस्लिमों के हित के लिए नहीं है। उन्होंने यह भी दावा किया कि महिला आरक्षण विधेयक से सदन अंततः 'हिंदू लोकसभा' में बदल जाएगा।
बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती
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संवाद न्यूज एजेंसी
इन नेताओं ने भी पहले किया विरोध:
- देवेन्द्र प्रसाद यादव (समाजवादी जनता दल डेमोक्रेटिक)
- रघुवंश प्रसाद सिंह (राजद)
- जी.एम. बनतवाला (अध्यक्ष IUML)
- इलियास आजमी (बसपा बाद में आप)
- मायावती (बसपा सुप्रीमो)
- मोहम्मद अली अशरफ फातमी (जनता दल यूनाइटेड)