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उत्तराखंड में सरकार और विभागों की दूत बनीं महिलाएं, जल-जंगल-जमीन को बचाएंगे स्कूली बच्चे

Tue, 20 Aug 2019 02:12 AM IST
Nilesh Kumar सीमा शर्मा,नई दिल्ली
सीमा शर्मा,नई दिल्ली Published by: Nilesh Kumar Updated Tue, 20 Aug 2019 02:12 AM IST
सार

  • सरकारी स्कूलों के स्मार्ट इको क्लब में ग्रामीणों की जल-जंगल-जमीन की दिक्कतों का मिला समाधान 
  • उत्तराखंड साइंस एजुकेशन एंड रिसर्स सेंटर और डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एजुकेशन का पायलट प्रोजेक्ट सफल
  • यूएसईआरसी ने मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश को दिल्ली में इस पायलट प्रोजेक्ट का डेमो भी दिया

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Women became ambassadors of government in Uttarakhand, School children will save water-forest-land
महिलाएं (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

उत्तराखंड के दूरदराज इलाकों की पहाड़ी महिलाएं प्रदेश सरकार की दूत बनी हैं। दूरदराज के 65 ग्रामीण स्कूलों में स्मार्ट ईको क्लब के माध्यम से महिलाएं सड़क, बिजली, पानी, आग, खनन आदि की दिक्कत सीधे स्कूल पहुंचा रही हैं। यहां से स्कूली शिक्षक या प्रिंसिपल उन शिकायतों को विभागों व सरकार तक भेजते हैं। खास बात यह है कि जहां विभागों को दिक्कतों की जानकारी हफ्तों नहीं मिल सकती थी, वहां बच्चों के माध्यम से चंद घंटों में सूचना प्रसारित हो जाती है।

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उत्तराखंड साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (यूएसईआरसी) देहरादून के वैज्ञानिक कल्याण सिंह रावत के मुताबिक, यूएसईआरसी ने डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एजुकेशन उत्तराखंड के माध्यम से जल-जंगल और जमीन का पायलट प्रोजेक्ट दूरदराज के 65 ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में शुरू किया था। इसके लिए सरकारी स्कूलों में स्मार्ट ईको क्लब बनाए गए। इनमें छात्रों के साथ-साथ उनकी माताओं को भी जोड़ा गया। 
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महिलाओं को जोड़ने का मुख्य मकसद सूचनाओं को जल्द पहुंचाना था। महिलाओं और छात्रों को जल-जंगल और जमीन के माध्यम से पर्यावरण, जल संरक्षण, स्वच्छता के प्रति जागरूक किया गया। इसके अलावा, उन्हें दिक्कतों को साझा करने की जानकारी भी दी गई। यूएसईआरसी ने शनिवार को मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को दिल्ली में इस पायलट प्रोजेक्ट का डेमो भी दिया। 

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जंगलों से महिलाओं का सीधा संपर्क

उत्तराखंड की महिलाएं घर और बाहर का सारा काम करती हैं। वे घर के साथ जंगल व खेती भी देखती हैं। इसीलिए जैसे ही उन्हें टूटी सड़क, गंदा पानी, पीने के पानी की पाइप टूटने, खनन, जंगल में आग, अवैध लकड़ी की कटाई आदि की जानकारी मिलती है, वे स्वयं या बच्चों के माध्यम से स्कूल तक पहुंचा देती हैं। 

इसकी सूचना बनकार संबंधित विभागों व अधिकारियों को भेज दी जाती थी। सूचना सही समय पर पहुंचने पर विभाग के कर्मी आकर दिक्कतों को दूर करने में जुट जाते। पहले दिक्कतों की सूचना हफ्तों या महीनों तक विभागों तक नहीं पहुंच पाती थी। पहाड़ी इलाका होने के चलते कर्मियां का प्रतिदिन हर जगह पहुंचना मुश्किल होता था।

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