कांग्रेस की बेचैनी में दिख रही भाजपा को उम्मीद, मुस्लिम मतों में बिखराव पर ही टिकी है आस
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पूर्वोत्तर का द्वार असम में भाजपा को पहली बार कमल खिलने की उम्मीद है। मगर यह उम्मीद विधानसभा चुनाव हर हाल में जीतने के आत्मविश्वास से नहीं बल्कि कांग्रेसी खेमे में छाई बेचैनी से पैदा हुई है। खासतौर से अंतिम चरण में मुसलिम बहुल इलाकों में हुए रिकार्ड मतदान के कारण पार्टी नेताओं में चिंता भी है।
पार्टी नेताओं को डर है कि अंतिम चरण के अंतिम दो-तीन घंटों के दौरान हुए ताबड़तोड़ मतदान कहीं कांग्रेस के पक्ष में अल्पसंख्यकों के ध्रुवीकरण का नतीजा तो नहीं था? चूंकि पार्टी के रणनीतिकार बिहार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के साथ-साथ राजद-जदयू के परंपरागत मतों का एक दूसरे में सफल स्थानांतरण का हश्र देख चुकी है, इसलिए असम में हर हाल में जीत का सार्वजनिक दावा करने से पार्टी बच रही है।
पार्टी के नेता मानते हैं कि भाजपा गठबंधन को बहुमत मिलना इस पर निर्भर करेगा कि मुस्लिम मत कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी में बंटी या नहीं। प्रथम चरण के मतदान के बाद भाजपा खेमे में खासा उत्साह था। उत्साह का कारण कांग्रेसी खेमे से आ रही बेचैनी की सूचना थी। मगर अंतिम चरण में हुए ताबड़तोड़ मतदान ने भाजपा की भी बेचैनी बढ़ाई है।
मुस्लिम मतों में बिखराव पर ही टिकी है आस
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक अंतिम तीन घंटे में इतनी जबर्दस्त वोटिंग हुई कि मुसलिम बहुल क्षेत्र में मतदान का आंकड़ा 90 फीसदी को पार कर गया। पार्टी को डर है कि कहीं अंतिम समय में मुस्लिम मतदाता भाजपा को हराने की नीयत से तो इतनी बड़ी संख्या में बाहर नहीं निकले।
पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि अगर अजमल की पार्टी मुस्लिम मतों में ठीक ठाक बंटवारा नहीं कर पाई तो भाजपा गठबंधन बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पाएगा। क्योंकि राज्य की करीब करीब 50 फीसदी विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल हैं।
भाजपा की चिंता का एक बड़ा कारण अंतिम चरण के मतदान के बाद कांग्रेसी खेमे में छाई चुप्पी भी है। पहले चरण के मतदान के बाद राज्य कांग्रेस के कई नेताओं की ओर से पार्टी के प्रदर्शन के संदर्भ में निराशाजनक बयान आए थे। मगर अंतिम चरण के बाद कांग्रेसी खेमे में भी चुप्पी है। भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि कांग्रेस भी अंतिम चरण में ताबड़तोड़ वोटिंग का कारण तलाशने में जुटी है।