क्या पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह चीन के साथ मील का पत्थर लगा पाएंगे मोदी
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन के वुहान शहर में हैं। शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ तीन मुलाकात हो चुकी है। शनिवार को सुबह प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों ईस्टलेक के किनारे वॉक करते हुए मार्निंग टॉक करेंगे। कुछ देर बाद साथ-साथ नौका विहार का लुफ्त उठाएंगे। इसके बाद दोपहर का लंच भी करेंगे। यानी तीन बार कल भी भेंट होगी।
इसके बाद दोनों देशों के शिखर नेताओं के बीच जून 2018 नें एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान भेंट होगी। यह तो प्रधानमंत्री मोदी के चीन में शानदार स्वागत की तस्वीर है, लेकिन क्या वह चीन के साथ पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी की तरह रिश्तों में मील का पत्थर लगा पाएंगे?
अभूतपूर्व स्वागत
चीन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अनौपचारिक मुलाकात पर रजामंदी जताई। यह अपने आप में काफी बड़ा कदम है। दरअसल चीन में प्रटोकॉल काफी अहम है। वहां हमारे प्रधानमंत्री को जाने पर पहले अपने समकक्ष चीन के प्रधानमंत्री से मिलना होता है। इसके बाद उनकी मुलाकात राष्ट्रपति से होती है। लेकिन यहां मामला अलग है। इससे बचने के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों राजधानी बीजिंग से बाहर मिले हैं। यानी राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तोड़कर भेंट की है। भेंट कोई एक बार नहीं बल्कि छह बार कर रहे हैं। एक तरह से दो दिन का पूरा समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दे रहे हैं।
शुक्रवार को दोनों नेता पहले हुबेई संग्रहालय में मिले। वहां प्रतिनिधि मंडल स्तरीय चर्चा हुई। इसके बाद ईस्टलेक गेस्ट हाऊस में मिले जहां दोनों देशों के अधिकारी भी मौजूद रहे और अंत में साथ में रात्रि भोज का लुफ्त लिया। इसी तरह से शनिवार को भी शी जिनपिंग प्रधानमंत्री मोदी के साथ दोपहर के भोज तक व्यस्त रहेंगे। यह अपने आप में न केवल काफी बड़ी बात है, बल्कि चीन द्वारा भारत के प्रधानमंत्री को दिया गया अभूतपूर्व सम्मान है।
प्रधानमंत्री ने भी बिछाए थे पलक पांवड़े
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति जिनपिंग के लिए भी पलक पांवड़े बिछाए थे। अहमदाबाद में पहली बार उतरे जिनपिंग का अभूतपूर्व स्वागत किया था। साथ में झूला झूले थे। अब तक का रिकार्ड देखा जाए तो प्रधानमंत्री अपने चार साल के कार्यकाल में सबसे अधिक चीन के प्रधानमंत्री से ही मिले हैं। दोनों नेता 10 से अधिक बार मिल चुके हैं। चार साल में चार बार प्रधानमंत्री चीन का दौरा कर चुके हैं और अगले महीने फिर एससीओ की बैठक में हिस्सा लेने जाएंगे। जबकि राष्ट्रपति शी भी दो बार भारत का दौरा कर चुके हैं। इसके सामानांतर प्रधानमंत्री जिनपिंग के बाद सबसे अधिक अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिले हैं।
टफ है भारत-चीन संबंध
प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने से लेकर 2018 के इतिहास में भारत के साथ चीन से रिश्ता हमेंशा पेंचीदा रहा है। नेहरू और लाई का दौर हिन्दी-चीनी भाई-भाई का था, लेकिन 20 अक्टूबर-21 नवंबर 1962 तक चीन के साथ हुए युद्ध ने दोनों देशों को संबंध के दो ध्रुवों पर ले जाकर खड़ा कर दिया। कई दशक तक दोनों देशों में संबंध अनसुलझे रहे। 1988 में दोनों देशों ने रिश्ते पर जमी बर्फ हटाई। इसका श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दिया जाता है। राजीव गांधी ने 34 साल बाद प्रधानमंत्री के रूप में 1988 में चीन का दौरा किया था। उस समय भारत और चीन के बीच में कड़वाहट काफी बढ़ चुकी थी। पूर्व विदेश सचिव शशांक के अनुसार युद्ध जैसे हालात बनने लगे थे।
पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर भी राजीव की इस यात्रा को भारत चीन रिश्ते के इतिहास में मील का पत्थर मानते हैं। हैदर का कहना है कि राजीव की इस यात्रा के बाद भारत और चीन में आपसी विश्वास को बढ़ाने का दौर शुरू हुआ। दोनों देश तमाम भ्रांतियों से बाहर आए। इसके बाद प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने चीन का दौरा किया। नरसिंह राव के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन का दौरा किया। पूर्व और देश के पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र इसे कूटनीति के कड़े इंतहान की तरह मानते थे। कई बार बातचीत में उन्होंने बताया था कि कैसे चीन के साथ तिब्बत, नाथुला दर्रा और सिक्किम को लेकर सहमति बन पाई। कैसे कई गतिरोध दूर हो पाए। वाजपेयी के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दस साल में तीन बार चीन गए, लेकिन संबंधों के लिहाज से देखें तो राजीव गांधी और वाजपेयी के समय में बड़ी उपलब्धि मिल पाई।
मुश्किल दौर
कूटनीति के जानकार मौजूदा समय को भारत-चीन संबंध के लिहाज से काफी मुश्किल भरा मान रहे हैं। चीन ने डोकलाम से लेकर अरुणाचल तक सीमा को काफी दबाव बना रखा है। डोकलाम में पिछले साल चीन की सेना के आ धमकने के बाद सामान्य स्थिति को बनाने के लिए भारतीय राजनयिकों को तीन दर्जन से अधिक बैठके करनी पड़ी। दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा राष्ट्रपति शी जिनपिंग को आगे आना पड़ा।
इस दौरान चीन ने भारत को खुले तौर पर युद्ध की धमकी भी दी। अरुणाचल को लेकर चीन का सख्त रूख बना हुआ है। चीन 2013 में भारत के साथ बने सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए हुए बार्डर डिफेंस कोआपरेशन एग्रीमेंट को अमल में लाने में संकोच कर रहा है। दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कई दर्जन बैठकों के दौर के बाद भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं है। द्विपक्षीय व्यापार में लगातार असंतुलन का बढऩा, पाकिस्तान के आर्थिक गलियारे के विकास की चीन की योजना, वन बेल्ट वन रोड पर उसकी आक्रामकता को लेकर देश में मतभेद बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर
अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन के साथ अडंगा लगाने से बाज नहीं आता। पाकिस्तान के आतंकी संगठनों पर नकेल कसने के मामले में वह भारत के रूख के सामानांतर रुख अपनाता है। एनएसजी की सदस्यता को लेकर वह भारत का खुलकर सहयोग नहीं करता और पाकिस्तान को इसका सदस्य बनाने की वकालत करता है। भारत के पड़ोसी देशों में वह पैठ बढ़ा रहा है और मालदीव समेत अन्य देशों में भारत विरोधी गुट को समर्थन देता है। चीन एससीओ में भी भारत के मुकाबले पाकिस्तान को अहम दर्जा देने का प्रयास करता रहता है।
यह स्थिति तब है जब भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स जैसे फोरम के अहम सदस्य हैं। भारत, रूस, चीन के बीच में त्रिकोणीय संबंध को संतुलित करने के लिए आरआईसी मंच सक्रिय है। रूस भारत का मजबूत, विश्वसनीय सामरिक साझीदार देश है और भारत तथा चीन के बीच में समय-समय पर रिश्तों में संतुलन लाने में सहयोगी बना रहता है।
प्रधानमंत्री मोदी की चुनौती
कूटनीति के जानकारों के अनुसार मौजूदा समय में भारत और चीन के बीच में रिश्तों का संतुलन सबसे बड़ी चुनौती है। चीन अपनी तुलना अमेरिका के समकक्ष कर रहा है। वहीं राष्ट्रपति शी जिनपिंग का चीन और पूरी दुनिया में लगातार प्रभाव बढ़ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी चीन को अमेरिका, उत्तरी कोरिया तथा दक्षिणी कोरिया के बीच में रिश्तों के संतुलन के लिए काफी अहम मान रहे हैं। इसके सामानांतर चीन के राष्ट्रपति शी और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के बीच बन रही सहमति माने रखती है। इन तमाम परिदृश्यों के बीच में चीन एशिया, दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। चीन के रणनीतिकारों को भारत चीन के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध बनकर खड़ा दिखाई देता है। ऐसे में सीमा पर शांति, द्विपक्षीय व्यापार असुंतलन में कमी तथा बन बेल्ट वन रोड पर टकराव टालना एक बड़ी चुनौती है।