SC: 'लिविंग विल पर दिशानिर्देश बनाना अधिक व्यावहारिक, फैसले की समीक्षा नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने साफ की स्थिति
न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत के स्पष्टीकरण से और अधिक भ्रम पैदा नहीं होना चाहिए। हम बस इसे थोड़ा और अधिक व्यावहारिक बना देंगे। पीठ ने कहा कि हम इसकी समीक्षा नहीं कर सकते हैं।
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निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराने वाले अपने 2018 के ऐतिहासिक फैसले की समीक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ कर दी है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को कहा है कि वह अपने चार साल से ज्यादा पुराने फैसले की समीक्षा नहीं करेगा। हालांकि अदालत ने लिविंग विल की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए दिशानिर्देश बनाने की बात कही है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि गरिमा के साथ मौत एक मौलिक अधिकार है। साथ ही शीर्ष अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को कानूनन वैध ठहराया था।
न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत के स्पष्टीकरण से और अधिक भ्रम पैदा नहीं होना चाहिए। हम बस इसे थोड़ा और अधिक व्यावहारिक बना देंगे। पीठ ने कहा कि हम इसकी समीक्षा नहीं कर सकते हैं। हमने मामले को खुली अदालत में रखा है। हम पूरी बात को फिर से नहीं खोल सकते। गौरतलब है कि इस पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, हृषिकेश रॉय और जस्टिस सी टी रविकुमार भी शामिल हैं।
गुरुवार को फिर होगी सुनवाई
द इंडियन सोसाइटी फॉर क्रिटिकल केयर की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी दातार ने सुनवाई के दौरान लिविंग विल की प्रक्रिया के उन क्षेत्रों को विस्तार से बताते हुए एक चार्ट प्रस्तुत किया, जो अव्यावहारिक हैं। उन्होंने कहा कि दिए गए सुझावों पर डॉक्टरों के साथ चर्चा की गई है और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की पूरी रिपोर्ट है। हालांकि बुधवार को भी मामले की सुनवाई अधूरी रह गई। अब गुरुवार को फिर से इस पर सुनवाई होगी।
इससे पहले मंगलवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 'कुछ' संशोधन करने का संकेत दिया था। पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि यह विधायिका पर निर्भर करता है कि वह गंभीर रूप से बीमार रोगियों के लिए कानून बनाए जो अपना उपचार बंद करना चाहते हैं।
लिविंग विल/एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों में संशोधन की है मांग
पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ 2018 में जारी किए गए लिविंग विल/एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों में संशोधन की मांग वाली याचिका पर विचार कर रही थी। मंगलवार को द इंडियन सोसाइटी फॉर क्रिटिकल केयर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी दातार ने पेश किया था कि इस प्रक्रिया में कई हितधारकों की भागीदारी के कारण सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत बनाई गई प्रक्रिया असाध्य हो गई है।
अभी की है यह प्रक्रिया
उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के लिविंग विल / एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक मेडिकल बोर्ड को पहले यह घोषित करना होगा कि मरीज के ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं है या वह ब्रेन डेड है। इसके बाद प्रक्रिया में कहा गया है कि जिला कलेक्टर को दूसरी राय प्राप्त करने के लिए एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड का गठन करना होगा, जिसके बाद मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी को भेजा जाएगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी दातार ने कहा कि पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अग्रिम निर्देश जारी करने के तरीके के बारे में कुछ निर्देश दिए थे। एक तीन-चरणीय प्रक्रिया की व्याख्या की गई थी जोकि बहुत बोझिल है। इस दौरान उन्होंने लिविंग विल के संदर्भ में सुझाव दिया कि इसके लिए दो गवाह हो सकते हैं। इसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका समाप्त की जा सकती है। दातार ने पीठ को यह भी बताया कि बोर्ड के सुझावों पर वसीयत पर काम किया जा रहा है। हमें मजिस्ट्रेट को बरकरार नहीं रखना चाहिए।