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समय की कमी के चलते फिलहाल 'तीन तलाक' पर ही होगी सुनवाई: SC

Tue, 16 May 2017 06:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Updated Tue, 16 May 2017 06:44 AM IST
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Will deal with only triple talaq due to paucity of time: SC 
- फोटो : Yahoo

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ कर दिया कि वह फिलहाल समय की कमी के चलते तीन तलाक की संवैधानिक वैधता को लेकर ही सुनवाई करेगा। बहुविवाह और निकाह हलाला पर सुनवाई बाद में की जाएगी।

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अटॉर्नी जनरल ने बहस की शुरुआत करते हुए कहा था कि संविधान पीठ को तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह, तीनों की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई करनी चाहिए। तीनों एक-दूसरे से जुड़े मामले हैं। 
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उन्होंने कहा कि दो सदस्यीय पीठ ने इन तीनों ही मसलों को परीक्षण के लिए संविधान पीठ के पास भेजा था। इस पर संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि समय की कमी की वजह से हम फिलहाल तीन तलाक के मामले पर सुनवाई रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में निकाह हलाला और बहुविवाह की संवैधानिक वैधता का भी परीक्षण किया जाएगा। हम फिलहाल इसे लंबित रखते हैं।

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माफी मांगे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

Will deal with only triple talaq due to paucity of time: SC 

हर पितृसत्तात्मक समाज में भेदभाव: बोर्ड
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने संविधान पीठ के समक्ष कहा कि ‘तीन तलाक’ कोई मसला नहीं है, मसला पितृसत्ता का है। हर पितृसत्तात्मक समाज में इस तरह का भेदभाव होता है, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम या पारसी या कोई और। 

हिंदुओं केकई कानूनों में ऐसा है। हिंदुओं में यह पिता पर निर्भर करता है कि वह अपनी अर्जित संपत्ति में बेटी को हिस्सा दे या नहीं, वहीं मुस्लिम समाज में बेटी को हिस्सा मिलता है।

माफी मांगे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: केंद्र
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संविधान पीठ के समक्ष कहा कि बोर्ड को अपने उस बयान पर माफी मांगनी चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि पुरुषों में निर्णय लेने की क्षमता महिलाओं के मुकाबले अधिक होती है। 

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में बोर्ड ने यह भी कहा था कि पुरुष अपनी भावनाओं पर अच्छी तरह नियंत्रण रखते हैं और जल्दबाजी में आकर गलत फैसले नहीं लेते। तुषार मेहता ने कहा कि बोर्ड को यह बयान वापस लेना चाहिए और माफी मांगना चाहिए। बोर्ड द्वारा ऐसा न करने पर अदालत को कार्रवाई करनी चाहिए।

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