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Mumbai Local Train Blasts: क्यों बरी किए गए मुंबई लोकल ट्रेन विस्फोट के दोषी, बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा?
Mon, 21 Jul 2025 12:51 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: बशु जैन
Updated Mon, 21 Jul 2025 12:51 PM IST
सार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में 12 दोषियों को निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को मामले के सबूत पेश करने में फेल बताया। आइए जानते हैं कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या-क्या कहा?
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बॉम्बे हाईकोर्ट
- फोटो : एएनआई
विस्तार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में 12 दोषियों को निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की जांच कर रहे महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) की निष्क्रियता पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने साफतौर पर कहा कि अभियोजन पक्ष मामले को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। इसलिए यह विश्वास करना कठिन है कि उन्होंने अपराध किया है।
जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चांडक की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपराध में इस्तेमाल हुए बमों को रिकॉर्ड पर पेश नहीं कर सका। साथ ही जिन सबूतों के आधार पर आरोप लगाए गए, उसके आधार पर उनको दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान और मामले में विशेष अदालत की तरफ से दोषी करार दिए गए लोगों से कथित बरामदगी का कोई साक्ष्य मूल्य नहीं है। अभियोजन पक्ष के साक्ष्य, गवाहों के बयान और निचली अदालत से दोषी करार लोगों से की गई कथित बरामदगी का कोई मेल भी नहीं है। इसलिए साक्ष्यों और बयानों को दोषसिद्धि के लिए निर्णायक नहीं माना जा सकता।
अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो तुरंत रिहा कर दिया जाएगा
पीठ ने कहा कि वह पांच दोषियों को दी गई मृत्युदंड और शेष सात को आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखने से इनकार करती है और उन्हें बरी करती है। कोर्ट ने कहा कि अगर ये लोग किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत जेल से रिहा कर दिया जाएगा।
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ठीक से नहीं रखे गए सबूत, गवाहों से पूछताछ करने में फेल रहा अभियोजन पक्ष
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को मामले में महत्वपूर्ण गवाहों से पूछताछ करने में फेल रहने और बरामद वस्तुओं की घटिया और खराब सीलिंग और रखरखाव करने पर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपराध में इस्तेमाल हुए बमों को रिकॉर्ड में लाने में विफल रहा। इसलिए बरामदगी के सबूत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
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जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चांडक की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपराध में इस्तेमाल हुए बमों को रिकॉर्ड पर पेश नहीं कर सका। साथ ही जिन सबूतों के आधार पर आरोप लगाए गए, उसके आधार पर उनको दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान और मामले में विशेष अदालत की तरफ से दोषी करार दिए गए लोगों से कथित बरामदगी का कोई साक्ष्य मूल्य नहीं है। अभियोजन पक्ष के साक्ष्य, गवाहों के बयान और निचली अदालत से दोषी करार लोगों से की गई कथित बरामदगी का कोई मेल भी नहीं है। इसलिए साक्ष्यों और बयानों को दोषसिद्धि के लिए निर्णायक नहीं माना जा सकता।
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अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो तुरंत रिहा कर दिया जाएगा
पीठ ने कहा कि वह पांच दोषियों को दी गई मृत्युदंड और शेष सात को आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखने से इनकार करती है और उन्हें बरी करती है। कोर्ट ने कहा कि अगर ये लोग किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत जेल से रिहा कर दिया जाएगा।
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ठीक से नहीं रखे गए सबूत, गवाहों से पूछताछ करने में फेल रहा अभियोजन पक्ष
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को मामले में महत्वपूर्ण गवाहों से पूछताछ करने में फेल रहने और बरामद वस्तुओं की घटिया और खराब सीलिंग और रखरखाव करने पर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपराध में इस्तेमाल हुए बमों को रिकॉर्ड में लाने में विफल रहा। इसलिए बरामदगी के सबूत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
अदालत (सांकेतिक)
- फोटो : ANI
'ऐसा लग रहा यातना देने के बाद बयान लिए गए'
हाईकोर्ट ने मामले के कुछ दोषियों के कबूलनामों को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि उन्हें यातना देने के बाद ये बयान लिए गए। बयान अधूरे और असत्य पाए गए हैं क्योंकि कुछ हिस्से एक-दूसरे की नकल हैं। बचाव पक्ष ने यह साबित कर दिया है कि उस समय उनके मुवक्किलों को यातना दी गई थी। अदालत ने अभियुक्त की पहचान परेड को भी खारिज कर दिया और कहा कि संबंधित पुलिस को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था।
गवाहों के बयान भी भरोसेमंद नहीं
उच्च न्यायालय ने गवाहों के बयानों को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान विश्वसनीय या भरोसेमंद नहीं हैं और अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए निर्णायक नहीं हैं। सबूतों पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है और बचाव पक्ष उन्हें खारिज करने में सफल रहा है। गवाहों ने घटना के चार महीने बाद पहचान परेड के दौरान पुलिस के सामने और चार साल बाद अदालत में उनकी पहचान की थी। कोर्ट ने कहा कि गवाहों को घटना वाले दिन घटना में संलिप्त लोगों को देखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला ताकि वे बाद में उनकी सही पहचान कर सकें। हमें ऐसा कोई कारण नहीं मिला जिससे उनकी स्मृति जागृत हो और चेहरे याद आ सकें।
हमने अपना कर्तव्य निभाया
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल किलोर और श्याम चांडक की पीठ ने कहा कि उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया। यह जिम्मेदारी हम पर डाली गई है। कोर्ट के फैसले के बाद दोषियों के वकील युग चौधरी ने कहा कि यह फैसला मानवता और न्यायपालिका में विश्वास बहाल करता है, क्योंकि 12 लोग 19 साल से उस अपराध के लिए जेल में सड़ रहे हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं।
हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मुरलीधर ने भी धैर्यपूर्वक सुनवाई करने और दोषियों को बरी करने के लिए उच्च न्यायालय को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि आरोपियों ने निर्दोष होने के बावजूद अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जेल में बिताया। जांच एजेंसियां आतंकवाद से संबंधित मामलों की जांच करते समय सांप्रदायिक पूर्वाग्रह दिखाती हैं।
हाईकोर्ट ने मामले के कुछ दोषियों के कबूलनामों को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि उन्हें यातना देने के बाद ये बयान लिए गए। बयान अधूरे और असत्य पाए गए हैं क्योंकि कुछ हिस्से एक-दूसरे की नकल हैं। बचाव पक्ष ने यह साबित कर दिया है कि उस समय उनके मुवक्किलों को यातना दी गई थी। अदालत ने अभियुक्त की पहचान परेड को भी खारिज कर दिया और कहा कि संबंधित पुलिस को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था।
गवाहों के बयान भी भरोसेमंद नहीं
उच्च न्यायालय ने गवाहों के बयानों को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान विश्वसनीय या भरोसेमंद नहीं हैं और अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए निर्णायक नहीं हैं। सबूतों पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है और बचाव पक्ष उन्हें खारिज करने में सफल रहा है। गवाहों ने घटना के चार महीने बाद पहचान परेड के दौरान पुलिस के सामने और चार साल बाद अदालत में उनकी पहचान की थी। कोर्ट ने कहा कि गवाहों को घटना वाले दिन घटना में संलिप्त लोगों को देखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला ताकि वे बाद में उनकी सही पहचान कर सकें। हमें ऐसा कोई कारण नहीं मिला जिससे उनकी स्मृति जागृत हो और चेहरे याद आ सकें।
हमने अपना कर्तव्य निभाया
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल किलोर और श्याम चांडक की पीठ ने कहा कि उन्होंने अपना कर्तव्य निभाया। यह जिम्मेदारी हम पर डाली गई है। कोर्ट के फैसले के बाद दोषियों के वकील युग चौधरी ने कहा कि यह फैसला मानवता और न्यायपालिका में विश्वास बहाल करता है, क्योंकि 12 लोग 19 साल से उस अपराध के लिए जेल में सड़ रहे हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं।
हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मुरलीधर ने भी धैर्यपूर्वक सुनवाई करने और दोषियों को बरी करने के लिए उच्च न्यायालय को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि आरोपियों ने निर्दोष होने के बावजूद अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा जेल में बिताया। जांच एजेंसियां आतंकवाद से संबंधित मामलों की जांच करते समय सांप्रदायिक पूर्वाग्रह दिखाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
मुंबई लोकल ट्रेनों में सात विस्फोट हुए थे
11 जुलाई 2006 को पश्चिमी लाइन पर विभिन्न स्थानों पर मुंबई लोकल ट्रेनों में सात विस्फोट हुए थे। इस दौरान 180 से अधिक लोग मारे गए थे और कई अन्य घायल हुए थे। 2015 में एक विशेष अदालत ने इस मामले में 12 लोगों को दोषी ठहराया था, जिनमें से पांच को मृत्युदंड और शेष सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मौत की सजा पाने वाले दोषियों में कमाल अंसारी (अब मृत), मोहम्मद फैसल अताउर रहमान शेख, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, नवीद हुसैन खान और आसिफ खान शामिल थे। विशेष अदालत ने उन्हें बम लगाने और कई अन्य आरोपों में दोषी पाया था। जबकि तनवीर अहमद मोहम्मद इब्राहिम अंसारी, मोहम्मद माजिद मोहम्मद शफी, शेख मोहम्मद अली आलम शेख, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मुजम्मिल अताउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख और ज़मीर अहमद लतीउर रहमान शेख को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। एक आरोपी वाहिद शेख को 2015 में ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था।
सोमवार को हाईकोर्ट का फैसला सुनाए जाने के बाद राज्य भर की विभिन्न जेलों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश किए गए दोषियों ने अपने वकीलों का धन्यवाद किया।
11 जुलाई 2006 को पश्चिमी लाइन पर विभिन्न स्थानों पर मुंबई लोकल ट्रेनों में सात विस्फोट हुए थे। इस दौरान 180 से अधिक लोग मारे गए थे और कई अन्य घायल हुए थे। 2015 में एक विशेष अदालत ने इस मामले में 12 लोगों को दोषी ठहराया था, जिनमें से पांच को मृत्युदंड और शेष सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मौत की सजा पाने वाले दोषियों में कमाल अंसारी (अब मृत), मोहम्मद फैसल अताउर रहमान शेख, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, नवीद हुसैन खान और आसिफ खान शामिल थे। विशेष अदालत ने उन्हें बम लगाने और कई अन्य आरोपों में दोषी पाया था। जबकि तनवीर अहमद मोहम्मद इब्राहिम अंसारी, मोहम्मद माजिद मोहम्मद शफी, शेख मोहम्मद अली आलम शेख, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मुजम्मिल अताउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख और ज़मीर अहमद लतीउर रहमान शेख को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। एक आरोपी वाहिद शेख को 2015 में ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था।
सोमवार को हाईकोर्ट का फैसला सुनाए जाने के बाद राज्य भर की विभिन्न जेलों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश किए गए दोषियों ने अपने वकीलों का धन्यवाद किया।