कानों देखी: वसुंधरा राजे और 'भगवा चाणक्य' ने उछाला टॉस, हेड आएगा या टेल?
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विस्तार
राजनीति में छोटा-छोटा देकर बड़ा ले लो का खेल या बड़ा देकर छोटा ले लो खूब चलता है। इसे आप राजनीतिक डिप्लोमेसी कह सकते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की आस लिए कोई निकला था और शपथ किसी और ने ले ली थी। इस बार कुछ वैसा ही नजारा राजस्थान के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। हालात की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान में अपने पीछे खड़े होने वाले 35-40 वफादार विधायकों की संख्या गिनाने वाली वसुंधरा ने इसे 25 तक लाकर सीमित कर लिया था। बताते हैं कि वसुंधरा का सारा दबाव, फोकस इसी संख्या के इर्द गिर्द टिकट दिलाने का था। इस दांव के पीछे का मर्म भगवा ब्रिगेड के चाणक्य बखूबी समझते थे। लिहाजा असल की बार्गेनिंग यहीं शुरू हुई। प्रत्याशियों की घोषणा से पहले इस पर टॉस उछला, मैच भी हुआ। अभी इस खेल के बारे में इतना भर पता है कि वसुंधरा राजे को मतगणना के दिन का इंतजार है। दीन दयाल उपाध्याय स्थित भगवा मुख्यालय के सूत्रों का कहना है कि अब वह चाहें जितना इंतजार कर लें और नतीजा भी चाहे जो आए, लेकिन आगे कंट्रोल में रहेंगी।
राजभर के पास उम्मीद के सिवा बचा क्या है?
चौबे जी गए थे छब्बे बनने, दूबे बनकर लौट आए। बड़ी सटीक कहावत है। लखनऊ वाले मौर्या जी तो कहते हैं कि थोड़े दिन इंतजार कर लीजिए। 4 नवंबर को राजभर मंत्रिपद की शपथ लेंगे। लोकभवन के सूत्र कहते हैं कि जब वह छब्बे बन जाएं, तभी जानिए। सच पूछिए तो सुभासपा के साथ बड़ा बुरा हो रहा है। उनकी परेशानी यह भी है कि दारा सिंह चौहान भी स्टेपनी बनकर चिपके हुए हैं। मामला इस समय बड़े भैया और छोटे भैया वाला है। उन्हें एक तरफ विधानसभा में शिवपाल सिंह यादव की काटी चिकोटी परेशान किए है। शिवपाल ने कह दिया था कि मुख्यमंत्री जी जल्दी राजभर को मंत्री बनाइए, नहीं तो वह जल्द ही हमारे साथ आ जाएंगे। शिवपाल ने यह बयान तब दे दिया था, एक अंतराल पर राजभर उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के सचिवालय में घूमते मिल जाते थे। दूसरी तरफ दिल्ली घाव पर मरहम लगा रहा है और लखनऊ मंत्रिमंडल की हवा रोककर बैठा है। ऊपर से भाजपा के कई नेता उन्हें दगा हुआ कारतूस कह देते हैं।
मायावती क्या करेंगी?
मायावती की कैडर वाली पार्टी का सबसे बड़ा लक्ष्य लोकसभा चुनाव 2024 में एक दर्जन के आसपास सीटें लाना है। बसपा में अब बामसेफ वाले नेता बहुत कम बचे हैं। मायावती के जमाने वाले हैं। उनका कहना है कि यह काम मुश्किल नहीं है, लेकिन अकेले चुनाव लड़कर यह नामुमकिन भी है। हालांकि बहनजी ने अभी किसी तरह के गठबंधन के संकेत नहीं दिए हैं। कभी बसपा में काफी प्रभावी रहे एक नेता को उम्मीद है कि जिस तरह से सपा के अखिलेश यादव से मायावती के संवाद की संभावना बढ़ रही है, वह रंग ला सकती है। दूसरे, मायावती सोनिया गांधी को थोड़ा मान देती हैं। एक वकील साहब का कहना है कि सब तो ठीक है, लेकिन पहले 15 जनवरी को बहनजी का जन्मदिन मना लिया जाए। नया साल चूंकि चुनावी साल है, इसलिए जन्मदिन भी अच्छे तरीके से मनाया जाएगा। बसपा के जमीनी नेता भी इसके लिए तैयार हैं। समझा जा रहा है कि इसके बाद मायावती कुछ संकेत दे सकती हैं।
मोदी जी का दीपावली मिलन और महाराष्ट्र से लेकर गोरखपुर तक इसकी गूंज
मंच पर कुर्सियां लगी थीं। भाजपा के प्रवक्ता इस पर बैठने वालों के नाम नहीं बता पा रहे थे। मीडिया के कुछ दिग्गज इसकी सूची में आगामी लोकसभा चुनाव देखकर उत्तर प्रदेश के लिहाज से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नाम जोड़ रहे थे। इसके पीछे एक तर्क और दिया जा रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी के बाद कैबिनेट में सबसे वरिष्ठ राजनाथ ही हैं। प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष और गृहमंत्री की कुर्सियों पर किसी को संशय नहीं था। लेकिन जैसे ही पीएम मंच पर आए, उनके साथ आए दो चेहरों ने चौंका दिया। एक नाम भाजपा महामंत्री राधामोहन अग्रवाल का और दूसरा विनोद तावड़े का। कोई इसे प्रधानमंत्री मोदी का पावर बैलेंस का तरीका बता रहा है, तो कोई इसे पार्टी के कार्यक्रम में पार्टी द्वारा तय किए नाम। वैसे कुछ भी हो इस दीपावली मिलन को प्रधानमंत्री ने अपने अंदाज में खास बना दिया। जिनसे हाथ मिलाए, उनके हौंसले बुलंद हैं। क्योंकि प्रधानमंत्री के दूसरे कार्यकाल का यह पहला और अंतिम दीपावली मिलन कार्यक्रम है और जो सेल्फी या हाथ मलने से बच गए, उनके जेहन में अभी भी इसकी कसक बरकरार है।
बेगर्स हैव नो चॉइस, इसलिए इंडिया गठबंधन होगा
बेगर्स हैव नो चॉइस (भिखारी के पास विकल्प चुनने का अवसर नहीं होता)। इंडिया गठबंधन के नेता इसी थीम पर 4 दिसंबर के बाद की उम्मीद पालकर बैठे हैं। वह जब भी पटना फोन घुमाते हैं, राजद प्रमुख लालू प्रसाद उनसे सब्र करने को कहते हैं। सूत्र का कहना है कि जिस तरह से सत्ता पक्ष अपने फायदे के लिए कमर के नीचे वार करके नेताओं को जेल भेज रहा है और अपने घड़िय़ालों को बचाकर उनका हौसला बढ़ा रहा है, चिंता की बात कहते हैं। कहते हैं कि राजनीति में सब लालू प्रसाद यादव नहीं हैं कि जेल हो आएं। इसलिए क्षेत्रीय दलों को अपना वजूद बचाने के लिए इस छाते के नीचे आना होगा।