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जेएनयू में फिर क्यों लगे 'आजादी' के नारे? 

Fri, 16 Feb 2018 08:38 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Fri, 16 Feb 2018 08:38 PM IST
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Why the slogans of freedom is raised again in JNU campus
जेएनयू (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का कैंपस एकबार फिर आजादी के नारों से गूंज रहा है। ये नारे राजनीति से प्रेरित नहीं, बल्कि शैक्षणिक नियमों में फेर-बदल के खिलाफ लगाए जा रहे हैं। बीते गुरुवार को हजारों छात्र विश्वविद्यालय प्रशासनिक भवन के सामने सुबह से देर रात ये नारे लगाते रहे। कुलपति एम जगदीश कुमार सहित अन्य प्रशासनिक पदाधिकारी पूरे प्रदर्शन के दौरान भवन से बाहर नहीं निकले। 
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छात्र कुलपति से मांगों को लेकर मिलने की बात कह रहे थे। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. प्रमोद कुमार ने पहले भीड़ हटाने की शर्त रखी थी। उन्होंने अधिकारियों को भवन के अंदर बंधक बनाने का आरोप भी लगाया है। जेएनयू छात्र संगठन का कहना है कि यह कोई बंधक बनाने जैसा नहीं था। किसी को भी अंदर-बाहर जाने से नहीं रोका जा रहा था पर अधिकारी खुद बाहर नहीं आएं।
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दरअसल यह विरोध उस फैसले के खिलाफ है जिसमें छात्रों को 75 फीसदी उपस्थिति अनिवार्य रूप से पूरा करने को कहा गया है।

विश्वविद्यालय के कुलपति एम जगदीश कुमार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का हवाला देते हुए इसे लागू किया है, जिसका न सिर्फ छात्र बल्कि शिक्षक भी विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि जेएनयू में पहले इस तरह के नियम नहीं रहे हैं। छात्र और शिक्षक एक संजीदा माहौल में पठन-पाठन करते रहे हैं।
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उनका आरोप है कि वर्तमान कुलपति विश्वविद्यालय के 'ओपन नॉलेज फ्लो' की संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं और छात्रों को क्लासरूम की दीवारों के भीतर सीमित रखने की साजिश कर रहे हैं।

कुलपति का विरोध पहले भी हुआ 

यह पहला मौका नहीं है जब छात्र कुलपति के फैसले का विरोध कर रहे हैं। 27 जनवरी, 2016 को कुलपति का पद संभालने के बाद एम जगदीश कुमार लगातार अपने फैसले को लेकर विवादों में रहे हैं।

सबसे ज्यादा विरोध उनके उस फैसले पर हुआ था जब उन्होंने कैंपस के अंदर सेना से आर्मी टैंक लगाने की मांग की थी। उनका कहना था कि इससे छात्रों में देश प्रेम की भावना बढ़ेगी। भाजपा के सरकार में आने के बाद जेएनयू पर लगातार देशद्रोह के आरोप लगते रहे हैं। दो साल पहले 9 फरवरी 2016 को जेएनयू विश्वविद्यालय परिसर में हुए एक कार्यक्रम में कथित तौर पर देश विरोधी नारे लगे थे।

इस सिलसिले में जेएनयू छात्रसंघ के उस समय के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके दो साथियों उमर खालिद और अनिर्बन को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि तीनों बाद में जमानत पर छूट गए। लेकिन कन्हैया कुमार इससे पहले 23 दिन जेल में रहे। इस केस को दो साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक दिल्ली पुलिस की तरफ से मामले में कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है। 

देशद्रोह होने के आरोप 

समय-समय पर जेएनयू के छात्रों पर देशद्रोही होने के आरोप लगते रहे हैं। कैंपस के अंदर कथित रूप से देशद्रोह के नारे लगाने वाली घटना के बाद सेना से रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल निरंजन सिंह की अगुवाई में आठ सैनिकों ने वीसी से मुलाकात की थी और विश्वविद्यालय के अंदर का माहौल बदलने की गुजारिश की थी।

राजस्थान से भाजपा विधायक ज्ञानदेव अहूजा भी जेएनयू के लिए विवादित बोल बोल चुके हैं। अहूजा ने अलवर की एक रैली में कहा था कि जेएनयू में रोजाना शराब की 4000 बोतलें, सिगरेट के 10 हजार फिल्टर, बीड़ी के 4000 टुकड़े, हड्डियों के छोटे-बड़े 50 हजार टुकड़े, चिप्स के 2000 रैपर्स और 3000 इस्तेमाल किए गए कॉन्डम मिलते हैं।

आखिर क्यों पूरा मामला सरकार बनाम जेएनयू होते चला गया, इस सवाल पर जेएनयू छात्र संघ के महासचिव रह चुके रामा नागा कहते हैं, "जेएनयू हमेशा से सरकारी नीतियों की आलोचना करता रहा है। यह शोध संस्थान है और सरकारी नीतियों की खूबियों और खामियों पर शोध करता है। यही सरकार को पसंद नहीं है।" 

पढ़ाई लिखाई में 'अव्वल' जेएनयू

Why the slogans of freedom is raised again in JNU campus
कन्हैया कुमार
'अव्वल' जेएनयू 

जेएनयू छात्र संघ की वर्तमान उपाध्यक्ष सिमॉन जोया खान कहती हैं कि आज के माहौल में सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने को देशद्रोह ठहरा दिया जाता है। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों से जेएनयू को राष्ट्रवादी गतिविधियां बढ़ी हैं।

वो कहती हैं, "जेएनयू में पिछले साल पहली बार करगिल विजय दिवस मनाया गया था। जेएनयू गेट से कन्वेंशन सेंटर तक 2200 फीट के झंडे के साथ तिरंगा मार्च निकाला गया था। हमारी हर आलोचना को देशद्रोह से जोड़ दिया जाता है और सेना को बीच में ला दिया जाता है।"

वर्तमान में चल रहे विरोध प्रदर्शन में छात्र कक्षाओं का विरोध कर रहे हैं। कक्षाओं के बाहर खुले में पठन-पाठन का आयोजन हो रहा है। इससे पहले जेएनयू में कभी भी ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट और रिसर्च कोर्स में कक्षाएं अनिवार्य नहीं रही हैं। बावजूद इसके विश्वविद्यालय रैंक के मामले में अव्वल रहा है।

देशभर के शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता तय करने वाली सरकारी संस्थान NAAC खुद इसे बेहतर मानती है। बीते अक्टूबर को संस्थान ने जेएनयू को A++ ग्रेड दिया था।

जेएनयू के खिलाफ 'साजिश'? 

छात्र जहां कुलपति के हर फैसले को राजनीति से प्रेरित मानते हैं तो अध्यापक इसे शैक्षणिक व्यवस्था पर बुरा असर डालने वाला बता रहे हैं। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व महासचिव और वर्तमान में राजनीति विज्ञान से पीएचडी कर रहे छात्र रामा नागा कहते हैं, "जब भी जेएनयू में कोई प्रदर्शन होता है तो हमलोग देश को एक अलग आलोचनात्मक नजरिया देते हैं या एक अलग मॉडल प्रस्तुत करते हैं। सरकार को इससे परेशानी है। इसलिए वो हमलोगों को ऐसे मुद्दे में फंसा रही है, जिससे हमलोग बाहर की चीजों पर सोचना बंद कर दें।"

वो कुलपति पर नए फैसले को गैर लोकतांत्रिक तरीके से लागू करने का आरोप लगाते हैं। रामा नागा कहते हैं, "विश्वविद्यालय की स्थापना से आज तक सभी फैसले एकेडमिक काउंसिल में लोकतांत्रिक तरीके से लिया जाता रहा था, जिसमें छात्र, शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारियों की मंजूरी अनिवार्य होती थी। लेकिन अब जबरन फैसले को थोपा जाने लगा है।" 

छात्र संघ की वर्तमान उपाध्यक्ष सिमॉन जोया खान कहती हैं कि जेएनयू के छात्र पढ़ाई को लेकर हमेशा से संजीदा रहे हैं। वो कहती हैं, "हमलोग क्लास का विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि हमें जिस दायरे में बांधने की कोशिश की जा रही है, वो गलत है।"

जेएनयू अध्यापक संघ भी फैसले का विरोध कर रहे हैं। संघ के सचिव सुधीर कुमार सुथार कहते हैं कि कुलपति का यह फैसला एक स्वस्थ व्यक्ति को किमोथेरेपी देने जैसा है। सुधीर कुमार सुथार कहते हैं, "पिछले दो साल में बहुत सारे फैसले लिए गए हैं जिसका कोई मतलब समझ नहीं आता है। एकेडमिक काउंसिल की कार्यप्रणाली को प्रभावित किया जा रहा है। उपस्थिति पूरी नहीं होने पर छात्रों को दी जाने वाली सुविधाएं, जैसे स्कॉलरशिप, मेस सुविधा आदि बंद करने की धमकी दी जा रही है। यह दुख देने वाला फैसला है।"

अध्यापक संघ की अध्यक्ष सोनाझरिया मिंज भी कुलपति के रवैये को गलत ठहराती हैं और कुलपति पर प्रभावित पक्षों से बात नहीं करने का आरोप लगाती हैं। वो कहती हैं, "कुलपति न बच्चों से बात कर रहे हैं और न ही अध्यापक संघ से। मुद्दे पर बात करने के लिए हमलोग कुलपति से कई बार समय मांग चुके हैं पर वो कोई जवाब नहीं दे रहे हैं।" 

अध्यापक संघ का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों पर दबाव बनाने के लिए बेवजह उनपर जुर्माना लगा रहा है। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है अध्यापक संघ छात्रों को भड़का रहा है। रजिस्ट्रार के जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि छात्रों का आंदोलन गैरकानूनी है। वे विश्वविद्यालय के नियमों और प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रदर्शन कर दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं।

जेएनयू के छात्रों का आरोप है कि वर्तमान सरकार निष्पक्ष शोध को प्रभावित करना चाह रही है। छात्रों का आरोप है कि पूरे देश में जेएनयू के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया पर विश्वविद्यालय के बतौर मुखिया होने के बावजूद कुलपति कभी संस्थान का पक्ष लेते नहीं दिखें।
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