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देश के लिए जान देने वाले केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों को 'शहीद' क्यों नहीं मानती सरकार

Wed, 11 Nov 2020 06:48 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 11 Nov 2020 06:48 PM IST
सार

अर्धसैनिक बलों के जवानों की तरफ से कई बार केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि कम से कम उन्हें शहीद का दर्जा तो दे दिया जाए। अभी तक देश में किसी भी राज्य की तरफ से इन जवानों को यह दर्जा नहीं दिया गया है...

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Why the government does not consider the soldiers of central paramilitary forces who have died for the country as martyrs
शहीद कर्मियों को श्रद्धांजलि - फोटो : अमर उजाला (फाइल)

विस्तार

बॉर्डर की चौकसी और आंतरिक सुरक्षा में लगे केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के करीब 11 लाख जवान अगर ड्यूटी के दौरान मारे जाते हैं तो उन्हें 'शहीद' नहीं कहा जाता। उनके बारे में कई जगह खबर छपती है कि फलां ऑपरेशन में पैरामिलिट्री फोर्स के इतने जवान मारे गए। ऐसे ऑपरेशन में यदि सेना को जान का नुकसान होता है तो वहां 'शहीद' लिखा जाता है। अर्धसैनिक बलों के जवानों की तरफ से कई बार केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि कम से कम उन्हें शहीद का दर्जा तो दे दिया जाए। अभी तक देश में किसी भी राज्य की तरफ से इन जवानों को यह दर्जा नहीं दिया गया है। साथ ही इन्हें सेवानिवृत्ति पश्चात एक्स अर्धसैनिक का दर्जा भी नहीं मिलता।
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सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पंवार कहते हैं, हैरानी की बात तो ये है कि इन बलों के टॉप बॉस भी कुछ नहीं बोलते। अगर सभी बलों के महानिदेशक चाहें तो वे केंद्रीय गृह मंत्रालय पर यह दबाव डाल सकते हैं कि ऑपरेशनल ड्यूटी के दौरान मारे जाने वाले जवानों को 'शहीद' कहा जाए।

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पंवार के अनुसार, कम से कम आतंकियों और नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन में मारे जाने वालों को तो शहीद का दर्जा दे दें। मान लें कि कहीं पर एक गांव हैं। वहां का एक जवान जो कि बीएसएफ में तैनात है। वह बॉर्डर पर शत्रु राष्ट्र की फायरिंग में मारा जाता है। उसकी जो भी फाइल तैयार होगी, उसमें कहीं भी शहीद शब्द नहीं लिखा होगा। उसी गांव में सेना का कोई जवान बॉर्डर पर मारा जाता है तो उसे शहीद कहा जाएगा।
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यही अंतर देश के लिए जान देने वालों के अर्धसैनिकों के परिवारों पर वज्र की भांति प्रहार करता है। यह मामला उच्च न्यायालय में भी जा चुका है। वहां सरकार यह शपथ पत्र दे देती है कि हमने शहीद की कोई परिभाषा तैयार नहीं की है। यह तो सोसायटी द्वारा स्वीकार्य एक शब्द है। सब जानते हैं कि शहीद का दर्जा, भारतीय समाज में सामाजिक स्टेट्स का प्रतीक भी माना जाता रहा है। अगर सेना में कोई शहीद होता है तो उसे बहुत सारे आर्थिक लाभ एवं दूसरी मदद भी मिलती है। अर्धसैनिक बलों के जवानों को कुछ खास नहीं मिलता।

बीएसएफ के पूर्व आईजी एमएस मल्ही बताते हैं कि अर्धसैनिक बलों की कोई लॉबी ही नहीं है। ऐसे में उनकी सुनवाई कौन करेगा। सेना के रिटायर्ड लोगों के बड़े संगठन है। हर जिले में सैनिक बोर्ड हैं। वहां स्थानीय नेताओं से संपर्क बना रहता है। चुनाव के दौरान सेवानिवृत्त सैनिकों का समर्थन मांगा जाता है। स्थानीय नेता, सरकार को भूतपूर्व सैनिकों की दिक्कतों के बारे में अवगत कराते रहते हैं। इस तरह से भूतपूर्व सैनिकों की एक राजनीतिक आवाज बन जाती है। सरकार को उनकी मांगों के आगे झुकना पड़ता है।

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में एक जवान को साठ साल तक नौकरी करनी पड़ती है। इसके बाद रिटायर होकर जब वह अपने परिवार के पास आता है तो संघर्ष करने का समय नहीं बचता। आईपीएस, जो कि इन बलों में सुपर बॉस का पद संभालते हैं, वे कभी इस बाबत नहीं सोचते कि इन्हें कम से कम शहीद का दर्जा तो दिला दें।

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह कहते हैं कि आईपीएस को अर्धसैनिक बलों से कोई मतलब नहीं होता। वे आते हैं और अपना कार्यकाल पूरा कर चले जाते हैं। 2004 में अर्धसैनिक बलों को पुरानी पेंशन व्यवस्था से बाहर कर दिया गया। तब भी कोई आईपीएस डीजी इन बलों के बचाव में नहीं आया।


आजादी के बाद करीब 35 हजार जवानों ने देश के लिए अपनी शहादत दी है। एसोसिएशन ने सरकार को सैकड़ों ज्ञापन देकर आग्रह किया है कि इन बलों में शहादत देने वालों को शहीद का दर्जा दे दें, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। अर्धसैनिक बलों के कल्याणार्थ, कल्याण एवं पुनर्वास बोर्ड की स्थापना की गई थी। यह संगठन भी सफेद हाथी साबित हो रहा है। अभी तक अर्धसैनिक कल्याण बोर्ड का गठन नहीं किया गया। अर्धसैनिक स्कूलों की स्थापना नहीं हुई। सेंट्रल पुलिस कैंटीन पर 50 जीएसटी की छूट देने को सरकार राजी नहीं हुई।

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