Pawan Khera: पवन खेड़ा-नेहा सिंह राठौर पर कार्रवाई क्यों, भाजपा-मोदी की छवि पर क्या पड़ेगा असर?
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिता पर कथित अभद्र टिप्पणी के कारण कांग्रेस नेता पवन खेड़ा पर हुई कार्रवाई का पहला एपिसोड उन्हें जमानत मिलने के बाद समाप्त हो गया है। भोजपुरी गायिका नेहा सिंह राठौड़ को उनके एक गाने के कारण उत्तर प्रदेश पुलिस का नोटिस मिलने की भी सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हो रही है। इसके पहले भी कई सरकार विरोधी विचार लोगों पर कार्रवाई की जा चुकी है, जिस पर हंगामा मच चुका है। बड़ा प्रश्न है कि सरकार का विरोध करने वाली सामान्य आलोचना पर भी इस तरह की कड़ी कार्रवाई क्यों हो रही है, और इसका भाजपा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर क्या असर पड़ रहा है?
'अपनी आलोचना नहीं सुनना चाहती सरकार'
कांग्रेस नेता रितु चौधरी ने अमर उजाला से कहा कि पवन खेड़ा की जिस टिप्पणी पर इतना विवाद खड़ा किया गया, वह एक मानवीय भूल के कारण हुई थी। उन्होंने बिना कोई देर इस पर खेद भी प्रकट कर दिया था। इसके बाद मामला तुरंत समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन जिस तरह पवन खेड़ा को गिरफ्तार किया गया और उन्हें असम पुलिस ने निशाना बनाने की कोशिश की, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार केवल लोगों का दमन करने पर उतारू है। वह किसी भी कीमत पर अपनी आलोचना सुनने को तैयार नहीं है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि गांधी परिवार को उनकी कई पीढ़ी तक अपमानित किया जाता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता उनकी नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर अभद्र टिप्पणियां करते रहते हैं, लेकिन कांग्रेस ने अपने शासन में कभी उनके खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई नहीं की। उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष के विरोध करने के अधिकार का दमन करने की कोशिश है।
रितु चौधरी ने कहा कि उनके नेता पर हुई कार्रवाई कांग्रेस के रायपुर अधिवेशन को प्रभावित करने के लिए की गई है। सरकार यह समझ रही है कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस मजबूत हुई है और रायपुर अधिवेशन से इस मजबूती को जनता के बीच और ज्यादा आधार और स्वीकृति मिलेगी। यही कारण है कि उनके वरिष्ठ नेताओं पर कार्रवाई कर लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है।
'भाजपा नहीं करा रही एफआईआर'
उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता एसएन सिंह ने अमर उजाला से कहा कि सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि पवन खेड़ा का मामला हो या नेहा सिंह राठौड़ का, उन पर भाजपा ने कोई एफआईआर नहीं दर्ज कराई है। जब पार्टी को किसी बात का विरोध करना होता है, तो वह संबंधित पार्टियों के कार्यालयों पर धरना-प्रदर्शन करती है। इस मामले में भाजपा ने कोई धरना-प्रदर्शन नहीं किया, लिहाजा इसे भाजपा की तरफ से की गई कार्रवाई नहीं कहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इन मामलों में इन लोगों की टिप्पणियों से क्षुब्ध सामान्य जनता की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई हैं। यदि भारत के लोकतंत्र में इन लोगों (पवन खेड़ा और नेहा सिंह राठौड़) को अपनी बात कहने का अधिकार है, तो उससे चोटिल हुए व्यक्ति को भी कानून की धाराओं के अंतर्गत उपचार पाने का अधिकार है। यदि उन्होंने ऐसा किया है तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता।
संवैधानिक संस्थाओं-पदों पर हमले कैसे रुकेंगे
एसएन सिंह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने लगातार राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय, थल सेनाध्यक्ष और चुनाव आयोग पर अंगुली उठाई है और उनके विरुद्ध अभद्र टिप्पणियां की हैं। अभद्र टिप्पणी करने वालों में कांग्रेस का सर्वोच्च नेतृत्व भी शामिल रहा है। ऐसे में ये क्यों न माना जाए कि ये नकारात्मक टिप्पणियां जानबूझकर और गलत मंशा से की जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि ये सभी पद संविधान सृजित हैं। इन पर बैठे व्यक्ति के बारे में नकारात्मक टिप्पणी केवल इन पर बैठे व्यक्तियों के विरुद्ध की गई नकारात्मक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उस संवैधानिक पद और स्वयं संविधान पर की गई टिप्पणी है। इसलिए संविधान और संवैधानिक पदों की मर्यादा बनाए रखने के लिए ऐसी अभद्र टिप्पणी करने वालों पर सख्त कार्रवाई करना बेहद आवश्यक है।
सबके लिए हों एक जैसे कानून
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा कि लोकतंत्र अपनी मूल भावना में ही लोगों को सरकार से असहमत होने का अधिकार देता है। उसकी यह विशेषता ही उसे एक सफल लोकतंत्र बनाती है। लेकिन जिस तरह से नेहा सिंह राठौड़ के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर उन्हें नोटिस थमाया गया है, यह दर्शाता है कि सरकार अपने विरुद्ध किसी की आलोचना सुनने को तैयार नहीं है। यह लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है और यह लोकतंत्र के प्रति सरकार की सोच को दर्शाता है।
आशुतोष ने कहा कि लोकतंत्र का अर्थ है कि किसी अपराध के लिए एक सामान्य व्यक्ति और एक प्रधानमंत्री के बीच भेद नहीं किया जाना चाहिए। यदि किसी टिप्पणी के लिए पवन खेड़ा और दूसरे गैर-भाजपाई दलों के नेताओं पर कार्रवाई हो रही है तो ऐसी ही कार्रवाई उन भाजपा नेताओं पर भी होनी चाहिए जो समय-समय पर विपक्ष के नेताओं पर अभद्र टिप्पणियां करते रहते हैं।
लेकिन ऐसा न होना यह दर्शाता है कि एक वर्ग स्वयं को दूसरों से ऊपर समझ रहा है और सरकार के बल प्रयोग के जरिए वह अपने विरोधियों का दमन करने पर उतारू है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की सोच लोकतांत्रिक व्यवस्था, देश और समाज को कमजोर करती है।
सोशल मीडिया ने बदले मानक, लाभ नहीं मिलता
वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडे ने कहा कि सोशल मीडिया के इस दौर में समाज के कई मानक टूट रहे हैं, तो कई नए मानक स्थापित हो रहे हैं। सामान्य टिप्पणी करने में भी नैतिकता की सोच रखने वालों का युग समाप्त हो चुका है और अब हर राजनीतिक दल का एक ऐसा समर्थक वर्ग तैयार हो चुका है, जो उनका विरोध करने वालों से तुरंत गाली-गलौज और हिंसा करने को उतारू रहता है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि इस तरह की कार्रवाइयों को राजनीतिक दलों के द्वारा ही बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे यह बीमारी संक्रामक हो गई है।
नेताओं की रैलियों में किसी एक वर्ग के लोगों के लिए अपमानजनक और हिंसा को उकसाने वाले भाषणों पर जनता के बीच ताली बजना भी यह बताता है कि जनता के एक वर्ग के बीच यह संस्कृति स्वीकार्य हो रही है। दूसरे दल भी देखा-देखी अब जवाब देने में किसी से कमजोर नहीं रहना चाहते और जमकर अपने विरोधियों पर उसी अपमानजनक शब्दों में टिप्पणी कर रहे हैं जिससे माहौल और ज्यादा गंदा हो रहा है।
उन्होंने कहा कि अब तक यह संस्कृति केवल पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे वामपंथी प्रभाव वाले राज्यों में देखने को मिलती थी, अब यह देशव्यापी होती दिख रही है। आलोचना करने की छूट के कारण सोशल मीडिया इस बीमारी का संवाहक बना हुआ है।
इस तरह की आलोचनाओं के कारण किसी दल को कोई राजनीतिक लाभ मिलता हो, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक वर्ग ऐसा अवश्य पैदा हुआ है जो इस तरह की टिप्पणियों के जरिए प्रतिक्रिया देने पर स्वयं को संतुष्ट महसूस करता है। अपने मतदाताओं की इन्हीं भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए नेता भी इसे बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन इससे देश की सामान्य सामाजिक व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही है, वर्गों के बीच वैमनस्य बढ़ रहा है जो कभी सांप्रदायिक-जातीय हिंसा के रूप में सामने आ सकता है। उन्होंने कहा कि इसका नुकसान आपसी तनाव के रूप में पूरे देश को भुगतना पड़ेगा।