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व्यभिचार में मर्द ही अपराधी क्यों, महिलाएं क्यों नहीं, संविधान पीठ करेगी परीक्षण
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Sat, 06 Jan 2018 02:17 AM IST
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Supreme Court
- फोटो : FILE PHOTO
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व्यभिचार(अडेल्ट्री) मामले में मर्द ही अपराधी क्यों, महिलाएं क्यों नहीं, इस मसले पर अब संविधान पीठ परीक्षण करेगी। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने शुक्रवार को भारतीय दंड संहिता की धारा-497 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेज दिया है।
मालूम हो कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 150 वर्ष पूर्व इस कानूनी प्रावधान को प्रथम दृष्टया पुरातनकालीन बताया था। शीर्ष अदालत का कहना था कि यह प्रावधान महिला और पुरुष को एक समान नजर से नहीं देखता। आपराधिक कानून पुरुष और स्त्रियों के लिए बराबर है लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा-497 में इस सिद्धांत का अभाव है। पीठ ने कहा था कि कोई कानून महिलाओं को यह कहते हुए संरक्षण नहीं दे सकता कि व्यभिचार के मामले में हमेशा महिला पीड़िता होती हैं।
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मालूम हो कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 150 वर्ष पूर्व इस कानूनी प्रावधान को प्रथम दृष्टया पुरातनकालीन बताया था। शीर्ष अदालत का कहना था कि यह प्रावधान महिला और पुरुष को एक समान नजर से नहीं देखता। आपराधिक कानून पुरुष और स्त्रियों के लिए बराबर है लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा-497 में इस सिद्धांत का अभाव है। पीठ ने कहा था कि कोई कानून महिलाओं को यह कहते हुए संरक्षण नहीं दे सकता कि व्यभिचार के मामले में हमेशा महिला पीड़िता होती हैं।
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क्या यह लिंग विभेद नहीं है?
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पीठ ने सवाल किया था कि क्या यह कानून भेदभावपूर्ण वाला नहीं है? क्या यह लिंग विभेद नहीं है? क्या यह कहने से कि महिला पर अपराध नहीं बनता क्योंकि उसमें पति की सहमति है। क्या इस तरह कानून महिलाओं की प्रतिष्ठा को कम नहीं करता? क्या इससे महिला की व्यक्तिगत पहचान को चोट नहीं पहुंचाता? क्या यह महिलाओं को उत्पाद की तरह समझना नहीं है? क्या इस तरह के प्रावधान से महिलाओं को गुलाम की तरह समझना नहीं है? ऐसे तमाम सवाल करते हुए पीठ ने 150 वर्ष पुराने इस कानून की वैधता का परीक्षण करने का निर्णय लिया था।
धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन यह अपराध पुरुषों तक ही सीमित है अगर उसका किसी दूसरे की पत्नी केसाथ संबंध हो। इस मामले में पत्नी को न व्यभिचारी माना जाता है और न ही कानूनन उसे उकासने वाला ही माना जाता है। वहीं पुरुषों को इस अपराध के लिए पांच वर्ष तक की सजा हो सकती है।
धारा-497 हर परिस्थितियों में महिलाओं को पीड़िता मानता है, वहीं मर्दों को अपराधिक मुकदमा झेलना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट केरल निवासी जोसफ शिन की याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में धारा-497 पर पुनर्विचार करने की गुहार की गई है। याचिका में इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण और लिंग विभेद वाला बताया गया है।
धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन यह अपराध पुरुषों तक ही सीमित है अगर उसका किसी दूसरे की पत्नी केसाथ संबंध हो। इस मामले में पत्नी को न व्यभिचारी माना जाता है और न ही कानूनन उसे उकासने वाला ही माना जाता है। वहीं पुरुषों को इस अपराध के लिए पांच वर्ष तक की सजा हो सकती है।
धारा-497 हर परिस्थितियों में महिलाओं को पीड़िता मानता है, वहीं मर्दों को अपराधिक मुकदमा झेलना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट केरल निवासी जोसफ शिन की याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में धारा-497 पर पुनर्विचार करने की गुहार की गई है। याचिका में इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण और लिंग विभेद वाला बताया गया है।