मुख्य न्यायाधीश इसलिए रो पड़े थे...
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भारत की अदालतों में लाखों लंबित पड़े मामलों और न्यायपालिका की मुश्किलों का ज़िक्र करते हुए रविवार को मुख्य न्यायाधीश प्रधानमंत्री की मौजूदगी में भावुक हो गए थे। बीबीसी के संदीप सोनी ने पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण से न्यायपालिका से जुड़े पूरे मसले पर बातचीत की है। वरिष्ठ वकील और पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण के अनुसार-
भारत में न्यायपालिका की निंदा अकसर इस बात को लेकर होती है कि बहुत सारे मुकदमे बिना फैसले के पड़े हुए हैं और अनेक मामलों में फैसला होने में कई साल लग जाते हैं। स्वाभाविक है कि इसके कारण जनता में गुस्सा है, जबकि इसके पीछे बहुत सारी वजहें है जिनका लोगों को पता नहीं होता है।
संविधान लागू होने से पहले जजों की भूमिका बहुत सीमित थी। उनके पास 'रिट' संबंधी अधिकार नहीं थे, न ही सरकार या सरकारी अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर आपत्ति करने का अधिकार था। इसलिए उस जमाने में जजों की संख्या कम रखी गई थी।
जब 1950 में संविधान ने पहली बार नागरिकों को मूल अधिकार दिए और जजों को कार्यपालिका के काम की समीक्षा के नए अधिकार दिए, तब से न्यायपालिका के काम का दायरा बहुत बढ़ गया।
अगर सरकार अपना काम ईमानदारी और होशियारी से करे, तो ज्यादा 'रिट' याचिकाएं दायर नहीं होंगीं। कई जगह कार्यपालिका में बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार और कई बार कानून को ठीक से नहीं समझने की वजह से भी 'रिट' का दायरा बढ़ा है।
बड़ी संख्या में 'बार' में काबिल लोग नहीं आ रहे
एक वजह ये भी है कि पहले जब 'बार' से कम ही संख्या में काबिल लोगों की जरूरत होती थी, तो वो आसानी से मिल जाते थे। लेकिन जब बड़ी संख्या में 'बार' में काबिल लोग नहीं आ रहे हों, तो आपको जजों के पदों पर नियुक्त करने के लिए बड़ी संख्या में ऐसे काबिल लोग नहीं मिल पाते हैं। इन सब की वजह से, अब यह विवाद है कि सरकार जजों की नियुक्ति में कुछ दखल चाहती है, जो कि स्वाभाविक रूप से न्यायपालिका को मंज़ूर नहीं है।
साथ ही विवाद यह भी है कि उच्च न्यायालयों के जजों के लिए कॉलेजियम ने बहुत सारी सिफारिश की हैं लेकिन उनको भरा नहीं जा रहा है। सरकार उनकी नियुक्ति नहीं कर रही है। शायद इसलिए भारत के मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह दुःख ज़ाहिर किया है।
यह एक गंभीर संकट है और इसका एक समाधान तो यह है कि अगर कहीं भी, न्यायपालिका के किसी हिस्से में भ्रष्टाचार शुरू होता है तो उसकी तुरंत जांच करानी चाहिए और दोषी लोगों को दंड दिया जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि अब तक ऐसी परंपरा चलती आ रही है कि उच्च न्यायालय का जज बनने के लिए, जब तक किसी की उम्र 40-45 साल नहीं हो जाती है, तब तक उस पर विचार नहीं किया जाता है। एक काबिल जज सारा कानून जानता है और इसलिए वो एक साधारण जज के मुकाबले चार गुना तक ज्यादा कार्यकुशल हो सकता है। ऐसे काबिल जज आप को तभी मिलेंगे, जब आप काबिल वकीलों को पहले ही जज नियुक्त कर लेंगे, क्योंकि बाद में जब उनकी वकालत चलने लगती है, तो उनकी जज बनने में दिलचस्पी नहीं रहती है।