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CAPF: केंद्रीय बलों में टॉप तक क्यों नहीं पहुंच पाते कैडर अधिकारी, IPS पर क्या कहता है 1955 का फोर्स एक्ट

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sat, 18 Jan 2025 06:49 PM IST
सार

केंद्रीय गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न किया जाए। 1955 के एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। उसमें कहा गया था कि इन बलों के कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व का मौका दिया जाए। वे आगे बढ़ेंगे और पदोन्नति के जरिए टॉप तक पहुंच जाएंगे। तब ये सलाह नहीं मानी गई और केंद्रीय सुरक्षा बलों में अधिकांश पद आईपीएस के लिए रिजर्व कर दिए गए। 

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Why cadre officers are not able to reach top in central forces, what does Force Act of 1955 say about IPS?
सीएपीएफ। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कैडर अफसर अपने हितों के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक चले गए। उन्होंने अदालत में जीत भी हासिल की, मगर ग्राउंड पर वे हार गए। 2019 में अदालती लड़ाई जीत चुके कैडर अफसरों को दोबारा से अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अभी तक अदालत का फैसला लागू नहीं हो सका। आखिर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में टॉप तक क्यों नहीं पहुंच पाते कैडर अधिकारी, अब ये सवाल दोबारा से चर्चा का विषय बना है। सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी एचआर सिंह ने कहा है, बल में दो कैडर अधिकारी, नेतृत्व की सभी योग्यताएं पूरी करते हैं। वे बल से जुड़ी हर छोटी बड़ी बात से वाकिफ हैं। जनहित में उन्हें डीजी और एडीजी का पद सौंपा जाना चाहिए। सीआरपीएफ के पहले महानिदेशक वीजी कनेत्कर ने कहा था, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। दूसरी तरफ, 1955 के फोर्स एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही नहीं, 1970 में तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, जेएस, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न हों। इन बलों में कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व करने का मौका दिया जाए। ऐसे में वे पदोन्नति के जरिए इन बलों में  आगे बढ़ते रहेंगे और टॉप तक पहुंच जाएंगे। 
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सीआरपीएफ में आईजी रैंक से रिटायर हुए पूर्व कैडर अफसर वीपीएस पंवार ने सुप्रीम कोर्ट से केस जीतने के बाद कहा था, 1970 में यह बात साफ हो चुकी थी कि केंद्रीय बलों का नेतृत्व कौन करेगा। तत्कालीन होम सेक्रेट्री लल्लन प्रसाद सिंह, सीएपीएफ में आईपीएस के लिए पद आरक्षित करने के पक्ष में नहीं थे। केंद्रीय गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव, बीएसएफ व सीआरपीएफ के डीजी ने भी लिखा था कि केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस के लिए पद आरक्षित न किया जाए। 1955 के एक्ट में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। उसमें कहा गया था कि इन बलों के कैडर अधिकारियों को ही नेतृत्व का मौका दिया जाए। वे आगे बढ़ेंगे और पदोन्नति के जरिए टॉप तक पहुंच जाएंगे। तब ये सलाह नहीं मानी गई और केंद्रीय सुरक्षा बलों में अधिकांश पद आईपीएस के लिए रिजर्व कर दिए गए। 


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पूर्व कैडर अधिकारियों के मुताबिक, 1959 में पहली बार आईपीएस अधिकारी, कमांडेंट बन कर केंद्रीय सुरक्षा बलों में आए थे। ये भी तब हुआ, जब आर्मी ने कहा कि हम अफसर नहीं देंगे। हमें अपनी जरूरतें पूरी करनी हैं। इसके बाद भारत सरकार ने निर्णय लिया कि इन बलों में अफसरों की भर्ती शुरू की जाए। डीएसपी के पद पर भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद 1960 में पहला बैच ट्रेनिंग के लिए एनपीए में पहुंचा। वहां पर आईपीएस के साथ कैडर अफसरों की ट्रेनिंग हुई। 1962 में लड़ाई छिड़ी तो इन बलों में इमरजेंसी कमीशंड ऑफिसर भेजे गए। लड़ाई खत्म होने के बाद वे भी वापस लौट गए। 

बाद के वर्षों में सीआरपीएफ और बीएसएफ ने खुद के चार सौ से अधिक अफसर तैयार कर लिए। डीजी बीएसएफ केएफ रुस्तम ने कहा था, केंद्रीय सुरक्षा बलों में आईपीएस अफसर के लिए पदों का आरक्षण न किया जाए। इसका 1955 के फोर्स एक्ट में भी प्रावधान नहीं है। हम अपने अफसर तैयार करेंगे, जो कुछ समय बाद फोर्स का नेतृत्व करेंगे। इसके बाद 1968 में सीआरपीएफ के पहले डीजी वीजी कनेत्कर ने कहा था, मुझे आईपीएस की जरूरत नहीं है।

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तत्कालीन गृह सचिव एलपी सिंह ने भी दोनों बलों के डीजी की बात को सही माना। सिंह ने कहा, शुरू में बीस फीसदी अफसर आर्मी व आईपीएस कैडर से ले लो। थोड़े समय बाद डीआईजी, कमांडेंट और सहायक कमांडेंट के पद कैडर को सौंप दिए जाएं, लेकिन आईपीएस के लिए वैधानिक आरक्षण न किया जाए। 1970 में गृह मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर 'संगठन' जेसी पांडे ने लिखा, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईपीएस के लिए पद फिक्स मत करो। इससे कैडर अफसरों के मौके प्रभावित होंगे। सीआरपीएफ डीजी ने कहा, अब केवल वर्किंग फार्मूला ले लो, जो बाद में नई व्यवस्था के साथ परिवर्तित हो जाएगा। आईपीएस, आर्मी और स्टेट पुलिस, इन तीनों के अफसरों के लिए सुरक्षा बलों में डीआईजी, कमांडेंट और एसी के पद पर आरक्षण न हो।

कैडर के पूर्व अफसरों के मुताबिक, उसके बाद फाइलें बदल गई। उसी साल यह आर्डर निकाला गया कि केंद्रीय बलों में डीजी के 100 फीसदी पद, 100 फीसदी आईजी, 75 फीसदी डीआईजी, 40 फीसदी सीओ और एसी के 10 फीसदी पद आईपीएस को दिए जाएं। समय के साथ इस कोटे में बदलाव होते रहे। साल 1997 में पहली बार सीआरपीएफ कैडर अफसरों को आईजी के 33 फीसदी पद मिले। 2008 में आईजी के 50 फीसदी और डीआईजी के 80 फीसदी कैडर को मिल गए।

2009 में एडीजी के 33 फीसदी पद कैडर को दिए गए। 1970 से लेकर 2013 तक आईपीएस कैडर, इस मामले में कुछ नहीं बोला। कैडर अधिकारी, पदोन्नति के मोर्चे पर पिछड़ते चले गए। उन्हें मजबूरन कोर्ट में जाना पड़ा। 2015 में हाईकोर्ट से जीते और 2019 में सुप्रीम कोर्ट से जीत गए, लेकिन फिर भी नए सर्विस रूल नहीं बन सके। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार टालमटोल की नीति पर चल रही है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के हजारों अफसर प्रमोशन एवं वित्तीय फायदों में हुए भेदभाव को लेकर परेशान हैं। जूनियर अफसरों को तो 15 वर्ष में पहली पदोन्नति नहीं मिल पा रही। 

जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है।
करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कैडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक पहुंच पाता है। मौजूदा दौर में तो वह भी संभव नहीं है। वजह, सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो डेढ़ दशक में पहली पदोन्नति मिल पा रही है। कैडर अफसर 35 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से डीआईजी या आईजी बनता है। डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सर्विस रूल नहीं बनाए गए हैं। बल के कैडर अधिकारियों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद कोई राहत नहीं दी। 

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