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आखिर क्यों गिरी जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी सरकार, जानें अंदर की बात

Tue, 19 Jun 2018 08:13 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Tue, 19 Jun 2018 08:13 PM IST
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Why BJP-PDP alliance government in Jammu and Kashmir finally came to an end
Mehbooba Mufti-Amit Shah
भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए पीडीपी को दिया अपना समर्थन वापस ले लिया है। जम्मू-कश्मीर के हालात को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि यह तो होना ही था। बस यह नहीं पता था कि कब? पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा भी इसे बेमेल गठबंधन बताते हैं। लेकिन गठबंधन टूटा क्यों? यह सवाल उतनी ही पेचीदा है जितनी कि जम्मू-कश्मीर की चुनौतियां।
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भाजपा-पीडीपी

भाजपा का जम्मू-कश्मीर में कश्मीर, जम्मू और लद्दाख क्षेत्र को लेकर अलग नजरिया है। जम्मू में संघ कई दशक से काम कर रहा है। वहां हिंदुओं की अच्छी खासी आबादी है। जम्मू से लगे लद्दाख क्षेत्र की भी भाजपा हिमायती है और यह उसके राजनीतिक एजेंडे में है कि घाटी (कश्मीर) से विस्थापित कश्मीरी पंडितों की राज्य में वापसी हो, उनका पुनर्वास हो। राज्य में हिंदू हितों की रक्षा हो। जम्मू-कश्मीर के लिए आवांटित विकास का पैसा संतुलित तरीके से कश्मीर, जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में प्रयोग में लाया जाए। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इन सभी के बीच में संतुलित समीकरण बिठाते हुए लोकतंत्र के साथ-साथ जम्हूरियत और कश्मीरियत की नीति को अपनाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अटल बिहारी वाजपेयी की इस नीति से अपने राजनीतिक एजेंडे के हिसाब से भटकती रही है।
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पीडीपी का राजनीतिक एजेंडा भाजपा से कहीं भी मेल नहीं खाता। पीडीपी कश्मीर घाटी में कश्मीर की आवाम के लिए और कश्मीरियत पर केंद्रित राजनीति करती है। जम्मू में इसका प्रभाव सीमित रहता है। लद्दाख और जम्मू क्षेत्र को लेकर इसका नजरिया अलग है। दोनों का राजनीतिक एजेंडा करीब-करीब सामानांतर है। 
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क्यों बढ़ते गए मतभेद

Why BJP-PDP alliance government in Jammu and Kashmir finally came to an end
गठबंधन के कांटे

नवंबर-दिसंबर 2014 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में 87 सीटों वाली विधानसभा में पीडीपी को 28, भाजपा को 25, कांग्रेस को 12, नेशनल कांफ्रेस को 15 और सीत सीटों पर अन्य को सफलता मिली। भाजपा की तरफ से राम माधव, जितेंद्र सिंह समेत कई रणनीतिकार सक्रिय हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद आगे आए और पीडीपी के तत्कालीन प्रमुख मुफ्ती मोहम्मद सईद (महबूबा के पिता) के नेतृत्व में सरकार गठित हुई। इसके लिए मोदी से चर्चा के बाद ही मुफ्ती राजी हुए और एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति बनी। इसमें जम्मू-कश्मीर में अमन के लिए प्रयास, धारा 370 जैसे मुद्दे समेत सब पर आपसी सहमति के बाद यह स्वरुप में आया। लेकिन इस गठबंधन को घाटी के लोगों ने शुरू से ही पीडीपी के लिए आत्मघाती कदम करार देना शुरू कर दिया था।

यही वजह थी कि मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के इंतकाल के बाद उनकी उत्तराधिकारी बेटी महबूबा मुफ्ती ने गठबंधन को जारी रखने, सरकार बनाने, मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने में लंबा समय ले लिया था। पिछले तीन साल से यह कांटे महबूबा को चुभ रहे थे और बढ़ रही चुनौतियां मोदी सरकार की जवाबदेही बढ़ाकर भाजपा को छलनी कर रही थी। पत्थरबाजी की घटना, पैलेटगन के प्रयोग से बच्चों, लोगों का जख्मी होना, आंखों की रोशनी जाना, मेजर गोगोई का स्थानीय कश्मीरी को जीप में बांधकर मानव ढाल बनाना, जम्मू में मंदिर में बच्ची से रेप का मामला समेत तमाम मुद्दों ने राज्य और केंद्र के बीच झगड़ा बढ़ा दिया था। भाजपा का मानना है महबूबा मुफ्ती ठीक से शासन नहीं कर पाई, सरकार नहीं चला पा रही थी।

क्यों बढ़ते गए मतभेद

पीडीपी का कश्मीर के लोगों से वादा और भाजपा का अपना राष्ट्रीय चेहरा दोनों दलों के बीच में मतभेद बढ़ाने के लगातार कारण बनते गए। घाटी में सैन्य बलों की तैनाती में कटौती, सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम समेत तमाम मुद्दों ने इसे समय-समय पर बढ़ाया। राज्य सरकार जहां कश्मीरियत को जम्हूरियत के साथ जोड़कर वार्ता, शांति बहाली के प्रयास समेत अन्य पर जोर दे रही थी, वहीं केंद्र सरकार पाकिस्तान से तल्ख होते रिश्ते, सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ, प्रशासनिक प्रयास आदि में उलझ गई। पहले केंद्र सरकार का आतंक को मुंहतोड़ जवाब देने की मुहिम शुरू हुई और फिर आतंकी बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के कुछ समय बाद से पूरी घाटी के हालात बेकाबू हो गए। अंतरराष्ट्रीय सीमा तथा नियंत्रण रेखा पर लगातार संघर्ष विराम उल्लंघन, जवानों की शहादत और आतंकी घटनाओं में निर्दोष लोगों के मरने की घटनाएं बढ़ गई। हालांकि आतंकियों को सुरक्षा बलों ने बड़ी संख्या में मार गिराया, लेकिन जम्मू-कश्मीर में अमन के रास्ते बंद होते चले गए। राज्य में पर्यटन, व्यापार, शिक्षा, सामान्य जन-जीवन सब काफी अस्त व्यस्त होता चला गया।

नाकामी का विवाद महबूबा के सिर

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ताजा विवाद

केंद्र सरकार सीमा पार के आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर में अराजक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई चाहती है। इसके बरअक्स मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती राज्य में संघर्ष विराम, वार्ता प्रक्रिया की पहल, अमन के प्रयासों को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। माना यह जा रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों के सामने कश्मीर में बिगड़ते जा रहे हालात पर जवाब देना काफी बड़ा सवाल बनता जा रहा है। अगले साल 2019 में देश में आम चुनाव होने हैं। सूत्र बताते हैं कि इसको देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्य में निर्णायक पहल का मन बनाया है। इसी नीति के तहत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कश्मीर मामलों के प्रभारी राम माधव, केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह, राज्य में भाजपा के मंत्री निर्मल सिंह समेत अन्य के साथ बैठक की और समर्थन वापस लेने का निर्णय लिया।

नाकामी का विवाद महबूबा के सिर

भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में नीतियों के फेल होने, आतंकवाद बढ़ने, अमन-चैन में आई परेशानियों तथा राज्य में सरकार के स्तर पर हुई सभी विफलताओं का ठीकरा निवर्तमान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती पर फोड़ दिया है। इस तरह से वहां पर्यटन उद्योग के चौपट होने, व्यापार की स्थितियों के खराब होने तथा राज्य में अशांति के लिए महबूबा मुफ्ती सरकार जिम्मेदार है। भाजपा के इस राजनीतिक पैंतरे से वहां की नाकामी के लिए पीडीपी जिम्मेदार है। इसलिए उसे समर्थन वापस लेना पड़ा है। भाजपा की रणनीति का पूरे देश में उसके राजनीतिक एजेंडे पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

अब क्या होगा आगे

Why BJP-PDP alliance government in Jammu and Kashmir finally came to an end
उमर अब्दुल्ला (फाइल फोटो)
भाजपा और पीडीपी अलग राह पर हैं। राज्य में राज्यपाल शासन की उम्मीद है। इस तरह से भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में अमन और शांति के प्रयास में केंद्र और राज्य के बीच में मौजूद वर्तमान राज्य सरकार की भूमिका को खत्म कर दिया है। भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। नेशनल कांफ्रेस के उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल से भेंट करके ताजा हालात पर चर्चा की और अपना पक्ष रखा है।

ऐसे में यदि आने वाले समय में राज्य में राज्य सरकार के गठन की संभावना नहीं बनती तो राज्यपाल शासन का लगना तय माना जा रहा है। राज्यपाल केंद्र सरकार के सुझाव के साथ तालमेल बनाकर राज्य में कानून-व्यवस्था, प्रशासन समेत अन्य जिम्मेदारियों को संभालता है। भाजपा का तर्क है कि ऐसा होने के बाद राज्य में आतंकियों के हौसले पस्त हो जाएंगे।
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