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स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने से घबराते हैं लोग?
दिव्या आर्य, बीबीसी
Updated Wed, 27 Dec 2017 05:09 PM IST
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प्यार का इजहार करता एक जोड़ा
- फोटो : BBC
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पिछले हफ्ते दिल्ली से सटे गाजियाबाद में एक मुसलमान मर्द और हिंदू औरत की शादी को 'लव जिहाद' बताते हुए सैकड़ों लोगों के प्रदर्शन की खबर शायद आपने भी देखी हो। अगर खबर पढ़ने का वक्त मिला हो तो ये भी जानते होंगे कि उस औरत और मर्द के परिवार ने इस शादी को 'लव जिहाद' बताए जाने का जोरदार विरोध किया।
मुसलमान मर्दों के जबरन हिंदू औरतों से शादी करने को कई हिंदुत्ववादी संगठनों ने 'लव जिहाद' की संज्ञा दी है। इन संगठनों का मानना है कि ऐसी शादियों के जरिए हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है।
गाजियाबाद के परिवार ने मीडिया को बताया कि ये सहमति से की गई शादी थी जिसके लिए किसी ने भी अपना धर्म नहीं बदला। लड़की के पिता ने 'स्क्रोल' समाचार वेबसाइट को बताया कि ये शादी 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत हुई जिसमें मां-बाप की रजामंदी लेना जरूरी होता है, तो जबरदस्ती का तो सवाल ही नहीं उठता।
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बल्कि उनका आरोप है कि 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत शादी करने से ही प्रदर्शन और हंगामे का खतरा पैदा हुआ।
क्या है 'स्पेशल मैरिज एक्ट' 1954?
भारत में ज्यादातर शादियां अलग-अलग धर्मों के कानून और 'पर्सनल लॉ' के तहत होती हैं। इसके लिए मर्द और और- दोनों का उसी धर्म का होना जरूरी है।
यानी अगर दो अलग-अलग धर्म के लोगों को आपस में शादी करनी हो तो उनमें से एक को धर्म बदलना होगा। पर हर व्यक्ति मोहब्बत के लिए अपना धर्म बदलना चाहे, ये जरूरी नहीं है।
इसी समस्या का हल ढूंढने के लिए संसद ने 'स्पेशल मैरिज एक्ट' पारित किया था जिसके तहत अलग-अलग धर्म के मर्द और औरत बिना धर्म बदले कानूनन शादी कर सकते हैं।
ये कानून हिंदू मैरिज एक्ट के तहत होने वाली कोर्ट मैरिज से अलग है और पेचीदा भी। बल्कि इसके तहत शादी करने वालों के लिए यह कानून एक नई चुनौती पैदा करता है।
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मुसलमान मर्दों के जबरन हिंदू औरतों से शादी करने को कई हिंदुत्ववादी संगठनों ने 'लव जिहाद' की संज्ञा दी है। इन संगठनों का मानना है कि ऐसी शादियों के जरिए हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है।
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गाजियाबाद के परिवार ने मीडिया को बताया कि ये सहमति से की गई शादी थी जिसके लिए किसी ने भी अपना धर्म नहीं बदला। लड़की के पिता ने 'स्क्रोल' समाचार वेबसाइट को बताया कि ये शादी 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत हुई जिसमें मां-बाप की रजामंदी लेना जरूरी होता है, तो जबरदस्ती का तो सवाल ही नहीं उठता।
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बल्कि उनका आरोप है कि 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत शादी करने से ही प्रदर्शन और हंगामे का खतरा पैदा हुआ।
क्या है 'स्पेशल मैरिज एक्ट' 1954?
भारत में ज्यादातर शादियां अलग-अलग धर्मों के कानून और 'पर्सनल लॉ' के तहत होती हैं। इसके लिए मर्द और और- दोनों का उसी धर्म का होना जरूरी है।
यानी अगर दो अलग-अलग धर्म के लोगों को आपस में शादी करनी हो तो उनमें से एक को धर्म बदलना होगा। पर हर व्यक्ति मोहब्बत के लिए अपना धर्म बदलना चाहे, ये जरूरी नहीं है।
इसी समस्या का हल ढूंढने के लिए संसद ने 'स्पेशल मैरिज एक्ट' पारित किया था जिसके तहत अलग-अलग धर्म के मर्द और औरत बिना धर्म बदले कानूनन शादी कर सकते हैं।
ये कानून हिंदू मैरिज एक्ट के तहत होने वाली कोर्ट मैरिज से अलग है और पेचीदा भी। बल्कि इसके तहत शादी करने वालों के लिए यह कानून एक नई चुनौती पैदा करता है।
साधारण कोर्ट मैरिज से अलग कैसे है 'स्पेशल मैरिज एक्ट'
शादी के लिए जाता एक जोड़ा
- फोटो : BBC
साधारण कोर्ट मैरिज से अलग कैसे?
साधारण कोर्ट मैरिज में मर्द और औरत अपने फोटो, 'एड्रेस प्रूफ', 'आईडी प्रूफ' और गवाह को साथ ले जाएं तो 'मैरिज सर्टिफिकेट' उसी दिन मिल जाता है।
'स्पेशल मैरिज एक्ट' में वक्त लगता है। इसके तहत की जा रही 'कोर्ट मैरिज' में जिले के 'मैरिज अफसर' यानी एसडीएम को ये सारे दस्तावेज जमा किए जाते हैं, जिसके बाद वो एक नोटिस तैयार करते हैं। इस नोटिस में साफ-साफ लिखा होता है कि फलां मर्द, फलां औरत से शादी करना चाहते हैं और किसी को इसमें आपत्ति हो तो 30 दिन के अंदर 'मैरिज अफसर' को सूचित करें।
इस नोटिस का मकसद ये है कि शादी करने वाला मर्द या औरत कोई झूठ या फरेब के बल पर शादी ना कर पाए और ऐसा कुछ हो तो एक महीने में सामने आ जाए। हालांकि हिंदू मैरिज एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। ये नोटिस 30 दिन तक कोर्ट के परिसर में लगा रहता है। 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत शादी तभी मुकम्मल मानी जाती है जब 30 दिन के दरमियान कोई व्यक्ति किसी तरह की शिकायत ना करे।
लेकिन इसका उलटा असर भी हो सकता है। गाजियाबाद के उस पिता के मुताबिक अंतर-धार्मिक शादी की जानकारी जब सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हो तो उसका आसानी से गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। गाजियाबाद के परिवार का दावा है कि शादी सहमति से हुई फिर भी अंतर-धार्मिक शादी की खबर बाहरी लोगों को मिलने की वजह से विरोध हुआ जिसके चलते शादी के 'रिसेप्शन' में आए मेहमानों को वापस भेजना पड़ा।
'स्पेशल मैरिज एक्ट' से डर क्यों?
अब फर्ज कीजिए कोई ऐसी शादी हो जिसमें लड़का-लड़की अलग धर्म के हों और राजी हों लेकिन मां-बाप रजामंद ना हों? पहचान छिपाए जाने की शर्त पर एक हिंदू मर्द ने मुझे बताया कि अपनी मुसलमान गर्लफ्रेंड से शादी करने में 'स्पेशल मैरिज एक्ट' बिल्कुल काम नहीं आ रहा।
मर्द और औरत वयस्क हैं और धर्म बदले बगैर शादी करना चाहते हैं पर एक्ट में लिखी नोटिस की शर्त तलवार की तरह गरदन पर लटकी है। उन्हें बताया गया है कि मां-बाप की रजामंदी जरूरी है और नोटिस का मकसद ये जानकारी फैलाना ही है। औरत दूसरे शहर की है, तो नोटिस की एक कॉपी वहां की जिला अदालत में लगाई जाएगी।
नतीजा ये कि अब वो सोच रहे हैं कि कौन अपना धर्म बदले ताकि हिंदू या मुसलमान तरीके से शादी हो सके। पर इसके लिए दिल रजामंद भी नहीं। परेशान हैं कि 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के होने के बावजूद उसकी मदद से शादी करने की हिम्मत नहीं हो रही।
'लव जिहाद' के माहौल और 'स्पेशल मैरिज' की पेचीदगी में अब भी अनसुलझी है उनकी मोहब्बत की कहानी।
साधारण कोर्ट मैरिज में मर्द और औरत अपने फोटो, 'एड्रेस प्रूफ', 'आईडी प्रूफ' और गवाह को साथ ले जाएं तो 'मैरिज सर्टिफिकेट' उसी दिन मिल जाता है।
'स्पेशल मैरिज एक्ट' में वक्त लगता है। इसके तहत की जा रही 'कोर्ट मैरिज' में जिले के 'मैरिज अफसर' यानी एसडीएम को ये सारे दस्तावेज जमा किए जाते हैं, जिसके बाद वो एक नोटिस तैयार करते हैं। इस नोटिस में साफ-साफ लिखा होता है कि फलां मर्द, फलां औरत से शादी करना चाहते हैं और किसी को इसमें आपत्ति हो तो 30 दिन के अंदर 'मैरिज अफसर' को सूचित करें।
इस नोटिस का मकसद ये है कि शादी करने वाला मर्द या औरत कोई झूठ या फरेब के बल पर शादी ना कर पाए और ऐसा कुछ हो तो एक महीने में सामने आ जाए। हालांकि हिंदू मैरिज एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। ये नोटिस 30 दिन तक कोर्ट के परिसर में लगा रहता है। 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत शादी तभी मुकम्मल मानी जाती है जब 30 दिन के दरमियान कोई व्यक्ति किसी तरह की शिकायत ना करे।
लेकिन इसका उलटा असर भी हो सकता है। गाजियाबाद के उस पिता के मुताबिक अंतर-धार्मिक शादी की जानकारी जब सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हो तो उसका आसानी से गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। गाजियाबाद के परिवार का दावा है कि शादी सहमति से हुई फिर भी अंतर-धार्मिक शादी की खबर बाहरी लोगों को मिलने की वजह से विरोध हुआ जिसके चलते शादी के 'रिसेप्शन' में आए मेहमानों को वापस भेजना पड़ा।
'स्पेशल मैरिज एक्ट' से डर क्यों?
अब फर्ज कीजिए कोई ऐसी शादी हो जिसमें लड़का-लड़की अलग धर्म के हों और राजी हों लेकिन मां-बाप रजामंद ना हों? पहचान छिपाए जाने की शर्त पर एक हिंदू मर्द ने मुझे बताया कि अपनी मुसलमान गर्लफ्रेंड से शादी करने में 'स्पेशल मैरिज एक्ट' बिल्कुल काम नहीं आ रहा।
मर्द और औरत वयस्क हैं और धर्म बदले बगैर शादी करना चाहते हैं पर एक्ट में लिखी नोटिस की शर्त तलवार की तरह गरदन पर लटकी है। उन्हें बताया गया है कि मां-बाप की रजामंदी जरूरी है और नोटिस का मकसद ये जानकारी फैलाना ही है। औरत दूसरे शहर की है, तो नोटिस की एक कॉपी वहां की जिला अदालत में लगाई जाएगी।
नतीजा ये कि अब वो सोच रहे हैं कि कौन अपना धर्म बदले ताकि हिंदू या मुसलमान तरीके से शादी हो सके। पर इसके लिए दिल रजामंद भी नहीं। परेशान हैं कि 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के होने के बावजूद उसकी मदद से शादी करने की हिम्मत नहीं हो रही।
'लव जिहाद' के माहौल और 'स्पेशल मैरिज' की पेचीदगी में अब भी अनसुलझी है उनकी मोहब्बत की कहानी।