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Lok Sabha: तो क्या सच में पीओके नहीं बना होता? अमित शाह ने जिसे पंडित नेहरू का ब्लंडर बताया, जानें उसकी सच्चाई

Thu, 07 Dec 2023 08:44 PM IST
जयदेव सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Thu, 07 Dec 2023 08:44 PM IST
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सार
Amit Shah: गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलतियों से पीओके बना। शाह ने सरकार की ओर से जल्द संघर्ष विराम और मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने को नेहरू की दो ऐतिहासिक गलतियां बताया। 
 
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why amit shah mentions nehru policies as blunders on kashmir issue
Amit Shah - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

जम्मू और कश्मीर से जुड़े दो अहम विधेयकों पर बुधवार को संसद के शीतकालीन सत्र में चर्चा हुई। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन संशोधन विधेयक और जम्मू-कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की नीतियों पर सवाल उठाए। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने 1948 में तत्कालीन केंद्र सरकार की ओर से जल्द संघर्ष विराम और मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने को नेहरू की दो ऐतिहासिक गलतियां बताया।


गृह मंत्री के आरोपों के पर कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस ने पलटवार किया। कांग्रेस ने गृह मंत्री पर जानबूझकर उत्तेजक और पूरी तरह से गलत बयान देने का आरोप लगाया। वहीं, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला ने दावा किया अगर आज पुंछ और राजौरी अगर भारत का हिस्सा हैं तो वो नेहरू की वजह से, नहीं तो वह भी पाकिस्तान में चला गया होता।

 
ऐसे में सवाल उठा है कि गृह मंत्री ने जिन दो मुद्दों को नेहरू की गलतियां बताईं वो हैं क्या? आखिर कश्मीर के लिए  संघर्ष विराम कब हुआ था? कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में कब और कैसे पहुंचा? संघर्ष विराम लागू करने के वक्त नेहरू का क्या रुख था? कश्मीर में युद्ध की शुरुआत कैसे हुई थी? आइये जानते हैं...

 

कहानी शुरू होती है रियासतों के विलय से 
दूसरे विश्वयुद्ध में हुए भारी आर्थिक नुकसान और खराब होती अर्थव्यवस्था के चलते ब्रिटिश साम्राज्य तेजी से सिकुड़ रहा था। दो जून 1947 को वाइसरॉय एडमिरल लॉर्ड लुइस माउंटबेटेन ने एलान किया कि भारत की आजादी के लिए ब्रिटेन तैयार हो गया है। इसके साथ यह भी तय हुआ कि भारत को आजादी के साथ उसके दो टुकड़े भारत और पाकिस्तान होंगे।  

आजादी से पहले देश में  देश की 500 से अधिक रियासतों को यह चुनने का विकल्प मिला की वह भारत के साथ जाना चाहती हैं या पाकिस्तान के साथ जाना चाहती हैं। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो उससे एक दिन पहले पाकिस्तान अस्तित्व में आ चुका था। जोधपुर से जूनागढ़ तक और भोपाल से हैदराबाद तक कई ऐसी रियासतें थीं जो शुरुआत में भारत के साथ नहीं जाना चाहती थीं, लेकिन सरदार पटेल की कुशल रणनीति के चलते ये सभी भारत का हिस्सा बनीं। कुछ रियासतें पाकिस्तान के साथ भी गईं। इन सभी के बीच कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान दोनों के ही साथ नहीं जाने का विकल्प चुना। यहीं से पूरी कहानी शुरू हुई। 

कबायलियों के भेष में पाकिस्तानी सेना का कश्मीर पर हमला 
अस्तित्व में आते ही सामरिक रूप से बेहद अहम कश्मीर पर कब्जे के लिए पाकिस्तान साजिश रचने लगा। महज दो महीने बाद ही 24 अक्तूबर 1947 में पाकिस्तानी सैनिकों ने कबायलियों के भेष में कश्मीर पर हमला कर दिया। महाराजा हरि सिंह के पास न तो इतनी सेना थी न ही इतने हथियार कि इनका मुकाबला कर सकते। उनकी सेना पीछे हटने लगी। कबायली मारकाट करने लगे। दो दिन के भीतर कबायली बारामूला तक पहुंच चुके थे। उनका अगला पड़ाव श्रीनगर और फिर वहां का एयरबेस था। पूरे कश्मीर के हालात हरि सिंह के नियंत्रण से बाहर हो चुके थे। वह खुद 25 अक्तूबर को ही श्रीनगर से जम्मू चले गए। जम्मू पहुंचकर हरि सिंह ने पंडित नेहरू से मदद मांगी। 

हरि सिंह के पास इकलौता रास्ता 'विलय' का 
नियम के मुताबिक श्रीनगर में भारतीय सेना तब तक नहीं घुस सकती थी, जब तक कश्मीर का भारत में विलय ना हो जाए। लॉर्ड माउंटबेटन ने इस बारे में स्थिति पहले ही स्पष्ट कर दी थी। इसके बाद हरि सिंह के पास भारत में विलय के अलावा कश्मीर को बचाने का दूसरा रास्ता नहीं था। गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल अन्य रियासतों की तरह कश्मीर को भारत में शामिल करने की कोशिश में लगे थे। जैसे ही हरि सिंह ने मदद की गुहार लगाई, गृह मंत्रालय की ओर से तैयार किए गए विलय के दो पन्नों के दस्तावेज लेकर गृह मंत्रालय के उस समय के सचिव बीपी मेनन 26 अक्तूबर 1947 को जम्मू पहुंचे।

26 अक्तूबर को ही हरि सिंह ने भारत में विलय के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए। अगले दिन 27 अक्तूबर 1947 की सुबह भारतीय फौज श्रीनगर की हवाई पट्टी पर उतरी। इसके बाद कबायलियों के खिलाफ भारतीय सेना ने मोर्चा संभाला। 

विवाद युद्ध पर नहीं, बल्कि युद्ध विराम पर
27 अक्तूबर 1947 से शुरू हुआ यह युद्ध एक साल दो महीने और दो हफ्ते बाद 5 जनवरी 1949 को खत्म हुआ।  दरअसल, युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तानी हमलावरों के कब्जे से जम्मू और कश्मीर दोनों में काफी बड़ा क्षेत्र मुक्त कराया। इसमें पूरी कश्मीर घाटी भी शामिल थी। महीनों तक चले अभियान के बाद भारतीय सशस्त्र बलों के पास मौजूद हथियारों, संचार और आपूर्ति जैसी चुनौतियों के चलते आगे का अभियान काफी कठिन हो चुका था। आगे आने वाली लंबी और कठोर सर्दियां इस चुनौती को और बढ़ा रही थीं। यह एक तरह के गतिरोध की स्थिति थी। 
युद्ध की शुरुआत के बाद ही सेना प्रमुख ने राजनीतिक विकल्प तालशने का सुझाव दिया
इससे पहले युद्ध शुरू होने के चार हफ्ते बाद ही थल सेनाध्यक्ष और भारतीय सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर, जनरल सर रॉय बुचर ने उस वक्त के रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि अब राजनीतिक और सैन्य दोनों तरह से पूरी स्थिति की समीक्षा करने का वक्त आ गया है। जिससे दीर्घकालीन निर्णय लिया जा सके। 

जम्मू-कश्मीर की रक्षा की पहली वर्षगांठ
इन सभी के बीच यह युद्ध जारी रहा। युद्ध शुरू होने के एक साल बाद भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर की रक्षा की पहली वर्षगांठ मनाने के लिए एक मीडिया विज्ञप्ति जारी की। इसमें भारतीय सेना ने कहा "आज, 12 महीने की महंगी लड़ाई के बाद, दुश्मन अपने सैन्य उद्देश्य (श्रीनगर और कश्मीर घाटी पर कब्जा करना)  को प्राप्त करने से पहले की तरह बहुत दूर है। भारतीय सेना ने घाटी के चारों ओर मजबूत घेरा बना दिया है, जिस पर आक्रमणकारी महीनों से व्यर्थ हमला कर रहे हैं।"

नेहरू का बुचर के साथ पत्रचार
नेहरू और बुचर के बीच हुए पत्रचार को लेकर आई रिपोर्ट्स के मुताबिक युद्ध शुरू होने के 13 महीने बाद 22 नवंबर 1948 को बुचर ने नेहरू को सैनिकों की थकान, जूनियर अधिकारियों की कम ट्रेनिंग के बारे में जानकारी दी। उन्होंने हथियारों की कमी के बारे में भी इस खत में लिखा। इसके जवाब में नेहरू ने अगले ही दिन लिखा कि यह जानते हुए कि पाकिस्तानी सेनाएं कश्मीर के हमले में शामिल हैं ऐसे में राजनीतिक और सैन्य दोनों ही दृष्टिकोण से हमारे पास उन पर हमले का विकल्प है। क्या हम ऐसा करने की स्थिति में हैं?

1949 में संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध विराम की घोषणा की
दोनों के बीच हुए पत्राचार से पता चलता है कि नेहरू एक मजबूत समाधान चाहते थे, जबकि बुचर की राय थी यह व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है। इस पत्राचार के बाद 31 दिसंबर, 1948 को, बुचर ने पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल सर डगलस ग्रेसी के साथ युद्धविराम पर सहमति व्यक्त की। 1 जनवरी 1949 को संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध विराम की घोषणा की। जिसे 5 जनवरी को लागू कर दिया गया।
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