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बढ़ते कदम : डब्ल्यूएचओ ने तकनीक दूसरे देशों से साझा करने के लिए भारत से मांगी मदद

Fri, 20 Jan 2023 06:29 AM IST
Jeet Kumar परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली।
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Fri, 20 Jan 2023 06:29 AM IST
सार

600 से ज्यादा कोरोना वायरस के स्वरूपों की पहचान करने में भारतीय वैज्ञानिकों को सफलता मिली।  वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विनोद स्कारिया ने कहा, हमें खुशी है कि भारत अब दूसरे देशों को जीनोम साइंस में प्रशिक्षित कर रहा है। 
 

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WHO seeks India help to share technology with other countries
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई

विस्तार

जीनोम विज्ञान में भारत सीखने की प्रक्रिया में था, लेकिन बीते दो साल में करीब तीन लाख मरीजों के सैंपल सीक्वेंस करने के बाद भारत अब दुनिया के बाकी देशों को इसके तरीके सिखाने लगा है। दरअसल, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दूसरे देशों के साथ इन तकनीकों को साझा करने के लिए भारत से मदद मांगी, जिसके बाद भारत सरकार की ओर से वैज्ञानिकों का एक दल इस काम में जुटा है। 

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हाल ही में भारतीय वैज्ञानिकों का एक दल मालदीव पहुंचा और वहां के डॉक्टर और वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया। नई दिल्ली स्थित जीनोमिक्स और इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (सीएसआईआर-आईजीआईबी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विनोद स्कारिया ने कहा, हमें खुशी है कि भारत अब दूसरे देशों को जीनोम साइंस में प्रशिक्षित कर रहा है। 
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इसका एक सफल परिणाम मालदीव में देखने को मिला, जब उस देश ने अपने यहां कोरोना संक्रमण को लेकर पहला जीनोम सीक्वेंस किया। तीन से चार दिन तक चले इस प्रशिक्षण में उनकी टीम ने मालदीव के वैज्ञानिक और डॉक्टरों का  मार्गदर्शन किया।
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600 से ज्यादा कोरोना वायरस के स्वरूपों की पहचान करने में भारतीय वैज्ञानिकों को मिली सफलता

सदस्य देशों के साथ मिलकर कार्य कर रहा डब्ल्यूएचओ 
कोरोना महामारी को नियंत्रण में लाने के लिए डब्ल्यूएचओ बीते लंबे समय से सभी सदस्य देशों के साथ मिलकर कार्य कर रहा है। भारत की तरह दूसरे देशों को भी वायरस की पहचान करने में सक्षम बनाने के लिए डब्ल्यूएचओ ने यह पहल शुरू की है।


नवंबर 2020 में देश ने की शुरुआत 
किसी भी जीव के डीएनए में मौजूद समस्त जीनों का अनुक्रम संजीन या जीनोम कहलाता है। कोरोना महामारी में नवंबर 2020 में सरकार ने पहली बार जीनोम विज्ञान का सहारा लेते हुए कोरोना वायरस के विभिन्न स्वरूपों की पहचान करना शुरू किया था। इसके लिए बाकायदा एक नेटवर्क स्थापित किया गया, जिसमें अब देश की 53 से ज्यादा प्रयोगशालाएं शामिल हैं।

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