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Chandrayaan-3 Landing: कहां उतरेगा चंद्रयान-3, क्या अंतिम समय पर भी बदली जा सकती है लैंडिंग की जगह? जानें
Wed, 23 Aug 2023 05:45 AM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Wed, 23 Aug 2023 05:45 AM IST
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चंद्रयान-3
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का बहुप्रतीक्षित मिशन चंद्रयान-3 23 अगस्त की शाम को चांद की सतह पर उतरेगा। प्रक्षेपण के 22 दिन बाद चंद्रयान-3 की चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग होगी। इसके साथ ही भारत इतिहास रच देगा और ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। इतना ही नहीं चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग कराने वाला भारत पहला देश बनेगा।लैंडिंग से पहले इसरो ने अपनी तैयारी भी पूरी कर ली है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की टीम ने इस बार सॉफ्ट लैंडिंग के दौरान, 'लास्ट मिनट्स ऑफ टेरर' के जोखिम को लगभग खत्म कर दिया है। लैंडिंग के वक्त वे सभी विकल्प मौजूद रहेंगे, जिनका इस्तेमाल किसी भी आपात स्थिति में सुरक्षित लैंडिंग के लिए किया जा सकता है। इस बीच हमें जानना जरूरी है कि आखिर चंद्रयान-3 मिशन क्या है? कहां उतरेगा चंद्रयान-3? क्या लैंडिंग की जगह अंतिम समय में बदली जा सकती है? इस बार कैसी लोकेशन का चुनाव किया गया है? समझते हैं...
चंद्रयान 3
- फोटो :
AMAR UJALA
चंद्रयान-3 है क्या?
इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 मिशन चंद्रयान-2 का ही अगला चरण है, जो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और परीक्षण करेगा। इसमें एक प्रणोदन मॉड्यूल, एक लैंडर और एक रोवर है। चंद्रयान-3 का फोकस चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंड करने पर है। मिशन की सफलता के लिए नए उपकरण बनाए गए हैं। एल्गोरिदम को बेहतर किया गया है। जिन वजहों से चंद्रयान-2 मिशन चंद्रमा की सतह नहीं उतर पाया था, उन पर फोकस किया गया है।
मिशन ने 14 जुलाई को दोपहर 2:35 बजे श्रीहरिकोटा केन्द्र से उड़ान भरी और अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ तो 23 अगस्त को चंद्रमा पर उतरेगा। यह मिशन भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बना देगा।
इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 मिशन चंद्रयान-2 का ही अगला चरण है, जो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और परीक्षण करेगा। इसमें एक प्रणोदन मॉड्यूल, एक लैंडर और एक रोवर है। चंद्रयान-3 का फोकस चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंड करने पर है। मिशन की सफलता के लिए नए उपकरण बनाए गए हैं। एल्गोरिदम को बेहतर किया गया है। जिन वजहों से चंद्रयान-2 मिशन चंद्रमा की सतह नहीं उतर पाया था, उन पर फोकस किया गया है।
मिशन ने 14 जुलाई को दोपहर 2:35 बजे श्रीहरिकोटा केन्द्र से उड़ान भरी और अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ तो 23 अगस्त को चंद्रमा पर उतरेगा। यह मिशन भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बना देगा।
moon
- फोटो :
istock
भारतीय मिशन कहां उतरेगा?
चंद्रयान-3 मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरेगा। लैंडिंग की जगह चंद्रमा पर बिल्कुल ध्रुवीय क्षेत्र में नहीं है। चंद्रयान-3 के लिए निर्धारित स्थल लगभग 68 डिग्री दक्षिण अक्षांश है। लेकिन ये अभी भी चंद्रमा पर किसी भी अन्य लैंडिंग की तुलना में दक्षिण में बहुत दूर हैं। दुनिया के सभी मिशन अभी तक भूमध्यरेखीय क्षेत्र में ही उतरे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस क्षेत्र को सबसे अधिक धूप मिलती है।
चंद्रयान-3 मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरेगा। लैंडिंग की जगह चंद्रमा पर बिल्कुल ध्रुवीय क्षेत्र में नहीं है। चंद्रयान-3 के लिए निर्धारित स्थल लगभग 68 डिग्री दक्षिण अक्षांश है। लेकिन ये अभी भी चंद्रमा पर किसी भी अन्य लैंडिंग की तुलना में दक्षिण में बहुत दूर हैं। दुनिया के सभी मिशन अभी तक भूमध्यरेखीय क्षेत्र में ही उतरे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस क्षेत्र को सबसे अधिक धूप मिलती है।
चंद्रयान 3
- फोटो :
SOCIAL MEDIA
सॉफ्ट लैंडिंग के लिए क्या बदलाव किए गए हैं?
चंद्रयान-2 से सबक लेकर चंद्रयान-3 में कई सुधार किए गए हैं। लक्षित लैंडिंग क्षेत्र को 4.2 किलोमीटर लंबाई और 2.5 किलोमीटर चौड़ाई तक बढ़ा दिया गया है। चंद्रयान-3 में लेजर डॉपलर वेलोसिमिट्री के साथ चार इंजन भी हैं जिसका मतलब है कि वह चंद्रमा पर उतरने के सभी चरणों में अपनी ऊंचाई और अभिविन्यास को नियंत्रित कर सकता है।
चंद्रयान-3 में किसी भी अप्रत्याशित प्रभाव से निपटने के लिए पैरों को मजबूत किया गया है। इसके साथ अधिक उपकरण, अपडेटेड सॉफ्टवेयर और एक बड़ा ईंधन टैंक लगाए गए हैं। यदि अंतिम मिनट में कोई बदलाव भी करना पड़ा तो ये उपकरण उस स्थिति में महत्वपूर्ण होंगे।
इसरो के प्रमुख एस. सोमनाथ ने कहा कि 2019 का मिशन चंद्रयान-2 आंशिक सफल था, लेकिन इससे मिले अनुभव इसरो के चंद्रमा पर लैंडर उतारने के लिए नए प्रयास में काफी उपयोगी साबित हुए। इसके तहत चंद्रयान-3 में कई बदलाव किए गए।
चंद्रयान-2 से सबक लेकर चंद्रयान-3 में कई सुधार किए गए हैं। लक्षित लैंडिंग क्षेत्र को 4.2 किलोमीटर लंबाई और 2.5 किलोमीटर चौड़ाई तक बढ़ा दिया गया है। चंद्रयान-3 में लेजर डॉपलर वेलोसिमिट्री के साथ चार इंजन भी हैं जिसका मतलब है कि वह चंद्रमा पर उतरने के सभी चरणों में अपनी ऊंचाई और अभिविन्यास को नियंत्रित कर सकता है।
चंद्रयान-3 में किसी भी अप्रत्याशित प्रभाव से निपटने के लिए पैरों को मजबूत किया गया है। इसके साथ अधिक उपकरण, अपडेटेड सॉफ्टवेयर और एक बड़ा ईंधन टैंक लगाए गए हैं। यदि अंतिम मिनट में कोई बदलाव भी करना पड़ा तो ये उपकरण उस स्थिति में महत्वपूर्ण होंगे।
इसरो के प्रमुख एस. सोमनाथ ने कहा कि 2019 का मिशन चंद्रयान-2 आंशिक सफल था, लेकिन इससे मिले अनुभव इसरो के चंद्रमा पर लैंडर उतारने के लिए नए प्रयास में काफी उपयोगी साबित हुए। इसके तहत चंद्रयान-3 में कई बदलाव किए गए।
लैंडर
- फोटो :
ISRO
क्या अंतिम समय पर भी बदली जा सकती है लैंडिंग की लोकेशन?
इसरो ने चंद्रयान-2 से सबक लेकर चंद्रयान-3 में व्यापक बदलाव किए हैं। चंद्रयान-2 के उतरने के लिए जितना क्षेत्र निर्धारित किया गया था, अब उसमें काफी इजाफा किया गया है। लैंडिंग के लिए लगभग 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तय किया गया है। अगर लैंडिंग के लिए एक जगह सही नहीं लगी तो दूसरी जगह भी तैयार रहेगी।
इस बीच इसरो ने कहा कि पहले विक्रम लैंडर के लिए अनुकूल स्थितियों को पहचाना जाएगा। लैंडिंग के लिए निर्धारित समय से ठीक दो घंटे पहले यान को उतारने या न उतारने पर अंतिम निर्णय होगा। इसरो के वैज्ञानिक नीलेश एम देसाई के मुताबिक, अगर चंद्रयान-3 को 23 अगस्त को लैंड नहीं कराया जाता है, तो फिर इसे 27 अगस्त को भी चांद पर उतारा जा सकता है।
इसरो के पूर्व निदेशक डॉ. के सिवन के अनुसार, पिछली बार लैंडिंग प्रक्रिया के बाद हमने डाटा देखा था। उसके आधार पर सुधारात्मक उपाय किए गए हैं। जहां भी मार्जिन कम है, हमने उन मार्जिन को बढ़ाया है। चंद्रयान-2 से हमने जो सबक सीखा है, उसके आधार पर चंद्रयान-3 के सिस्टम को अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ाया है।
चंद्रयान-3 को टारगेट स्थल से आगे-पीछे ले जाने की व्यवस्था है। एक किलोमीटर के दायरे में उसकी सुरक्षित लैंडिंग हो सकती है। अगर एक जगह ठीक नहीं है तो दूसरे स्थान पर लैंडिंग हो जाएगी। चंद्रयान-2 में पांच इंजन लगे थे, इस बार चार इंजन रखे गए हैं। ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि चंद्रयान-3 का वजन कम रहे।
इसरो ने चंद्रयान-2 से सबक लेकर चंद्रयान-3 में व्यापक बदलाव किए हैं। चंद्रयान-2 के उतरने के लिए जितना क्षेत्र निर्धारित किया गया था, अब उसमें काफी इजाफा किया गया है। लैंडिंग के लिए लगभग 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तय किया गया है। अगर लैंडिंग के लिए एक जगह सही नहीं लगी तो दूसरी जगह भी तैयार रहेगी।
इस बीच इसरो ने कहा कि पहले विक्रम लैंडर के लिए अनुकूल स्थितियों को पहचाना जाएगा। लैंडिंग के लिए निर्धारित समय से ठीक दो घंटे पहले यान को उतारने या न उतारने पर अंतिम निर्णय होगा। इसरो के वैज्ञानिक नीलेश एम देसाई के मुताबिक, अगर चंद्रयान-3 को 23 अगस्त को लैंड नहीं कराया जाता है, तो फिर इसे 27 अगस्त को भी चांद पर उतारा जा सकता है।
इसरो के पूर्व निदेशक डॉ. के सिवन के अनुसार, पिछली बार लैंडिंग प्रक्रिया के बाद हमने डाटा देखा था। उसके आधार पर सुधारात्मक उपाय किए गए हैं। जहां भी मार्जिन कम है, हमने उन मार्जिन को बढ़ाया है। चंद्रयान-2 से हमने जो सबक सीखा है, उसके आधार पर चंद्रयान-3 के सिस्टम को अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ाया है।
चंद्रयान-3 को टारगेट स्थल से आगे-पीछे ले जाने की व्यवस्था है। एक किलोमीटर के दायरे में उसकी सुरक्षित लैंडिंग हो सकती है। अगर एक जगह ठीक नहीं है तो दूसरे स्थान पर लैंडिंग हो जाएगी। चंद्रयान-2 में पांच इंजन लगे थे, इस बार चार इंजन रखे गए हैं। ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि चंद्रयान-3 का वजन कम रहे।
लैंडर
- फोटो :
ISRO
इस बार कैसी लोकेशन का चुनाव किया गया है?
चंद्रमा की सतह पर पर्यावरण स्वच्छ होता है। वहां प्रदूषण की कोई गुंजाइश नहीं है। अगर ऐसा कोई कण होता है तो वह हवा में जल जाता है। इस वजह से वहां जो भी वस्तु आती है, वह सीधे ही चंद्रमा की सतह से टकराती है। जब सीधे ही कोई वस्तु टकराती है तो वह इधर-उधर छिटक भी सकती है। वहां पर पहले से धंसी हुई मिट्टी से चट्टान बाहर आ जाती है। चंद्रमा पर बहता हुआ पानी तो है नहीं, इसलिए वहां मौजूद गड्ढे भरते नहीं हैं। चट्टान या क्रेटर, सब वैसे ही रहते हैं। चंद्रयान-3 के लिए समतल जगह का चयन किया गया है। अगर उस वक्त कोई पदार्थ बीच राह में आया तो भी चंद्रयान का संतुलन नहीं बिगड़ने दिया जाएगा। उस वक्त की फोटोग्राफी होती रहेगी। इससे भी अधिक कोई बाधा आती है तो चंद्रयान-3 की दिशा बदली जाएगी।
चंद्रमा की सतह पर पर्यावरण स्वच्छ होता है। वहां प्रदूषण की कोई गुंजाइश नहीं है। अगर ऐसा कोई कण होता है तो वह हवा में जल जाता है। इस वजह से वहां जो भी वस्तु आती है, वह सीधे ही चंद्रमा की सतह से टकराती है। जब सीधे ही कोई वस्तु टकराती है तो वह इधर-उधर छिटक भी सकती है। वहां पर पहले से धंसी हुई मिट्टी से चट्टान बाहर आ जाती है। चंद्रमा पर बहता हुआ पानी तो है नहीं, इसलिए वहां मौजूद गड्ढे भरते नहीं हैं। चट्टान या क्रेटर, सब वैसे ही रहते हैं। चंद्रयान-3 के लिए समतल जगह का चयन किया गया है। अगर उस वक्त कोई पदार्थ बीच राह में आया तो भी चंद्रयान का संतुलन नहीं बिगड़ने दिया जाएगा। उस वक्त की फोटोग्राफी होती रहेगी। इससे भी अधिक कोई बाधा आती है तो चंद्रयान-3 की दिशा बदली जाएगी।