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दासता से मुक्ति दिलाने के नाम पर तिब्बत आई थी चीन की सेना, गांववालों ने याद किए दहशत के पल

Sat, 22 Sep 2018 09:52 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, केसोंग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, केसोंग Updated Sat, 22 Sep 2018 09:52 AM IST
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when Peoples Liberation Army marched into Kesong village thousand of villagers fled to India
केसोंग प्रताड़ना कमरा

अरुणाचल प्रदेश से 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है केसोंग गांव। यह तिब्बत का वह पहला गांव था जिसमें 23 मई 1959 को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) घुस आई थी। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के अनुसार उसकी सेना उन लोगों को दासता से मुक्ति दिलाने के लिए गई थी। जब केसोंग गांव के लोगों ने 60 साल बाद इस दिन पर एक नाटक का आयोजन किया तो उन्हें मालूम था कि असल में उनका विलेन कौन है।

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केसोंग गांव की उस समय प्रमुख रही को अपनी जान गंवाने का खतरा था इसलिए वह 14वें दलाई लामा के साथ भारत आ गई थीं। दलाई लामा के साथ हजारों तिब्बती नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी के जरिए भारत आ गए थे। जो 1972 में अरुणाचल प्रदेश का संघ शासित प्रदेश बन गया। देशभक्ति शिक्षा केंद्र, एक संग्रहालय जिसमें कि केसोंग गांव की पिछली जिंदगी को दर्शाया गया है। उसमें गांव की प्रमुख सुओकांग वांगकिंग गेली को एक अपराधी की तरह गायब होते हुए दिखाया गया है।
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वांग, स्थानीय सरकार द्वारा नियुक्त गाइड ने 1959 से पहले के अपने सदियों पुराने डर को याद किया। उन्होंने बताया कि सालों तक केसोंग के वासियों के पास अपनी जमीन, अधिकार नहीं थे और उनके पास खाने को बहुत कम होता था। गेली और उसकी पसंद के लोगों के पास जमीन थीं। जो गांववाले कर नहीं दे पाते थे उन्हें प्रताड़ना दी जाती थी। संग्रहालय में प्रताड़ना के मॉडल वाला एक कमरा बना हुआ है। जिसमें प्रताड़ना देने वाले उपकरण जैसे कि चेन, हथकड़ी, बेल्ट और चाबुक प्रदर्शन के लिए रखे गए हैं।
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गाइड ने बताया कि गांवावालों के पास उत्पादन की कोई पहुंच नहीं थी और ना ही अपनी जिंदगी पर कोई नियंत्रण था। केसोंग के समाजवाद प्रयास ने उसकी नियति बदल दी। तिब्बत को 1951 में चीन में शामिल किया गया था लेकिन आधिकारियों के अनुसार चीनी विशेषताओं वाले लोकतंत्र सुधार के तहत केसोंग जैसे गांवों को 1959 में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में शामिल किया गया। हालांकि परिवार के साथ भारत आने के बाद गेली के साथ क्या हुआ इसके बारे में कोई नहीं जानता।

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