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Rat Hole Mining: सुरंग में फंसे मजदूरों के लिए वरदान बनी रैट होल माइनिंग, क्यों लगा था इस पर प्रतिबंध?

Tue, 28 Nov 2023 02:15 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Tue, 28 Nov 2023 02:15 PM IST
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सार
Rat Hole Mining: रैट-होल माइनिंग एक ऐसी पद्धति है जिसमें कुछ खनिक कोयला निकालने के लिए संकरे बिलों में जाते हैं। हालांकि, यह पद्धति विवादित और गैर-कानूनी भी है। 
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What is Rat hole Mining and its use to rescue workers in Silkyara tunnel
सिलक्यारा सुरंग हादसा - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

उत्तरकाशी की निर्माणाधीन सिलक्यारा सुरंग में 17 दिन से फंसे 41 श्रमिकों के लिए मंगलवार का दिन अहम साबित हुआ। बचाव अभियान में लगी टीम को आज सफलता मिल गई है। फंसे मजदूरों को निकालने के लिए रैट माइनिंग पद्धति द्वारा सुरंग के अंदर मैन्युअल ड्रिलिंग की गई। रैट माइनर्स द्वारा यह ड्रिलिंग 57 मीटर तक की गई।




आइये जानते हैं क्या है रैट होल माइनिंग? रैट माइनर्स कैसे काम करते हैं? 

सिलक्यारा सुरंग हादसा
सिलक्यारा सुरंग हादसा - फोटो : amar ujala
पहले जानते हैं घटना कैसे हुई थी?
दरअसल, 12 नवंबर 2023 की अल सुबह 05.30 बजे सिलक्यारा से बड़कोट के बीच बन रही निर्माणाधीन सुरंग में धंसाव हो गया। सुरंग के सिल्क्यारा हिस्से में 60 मीटर की दूरी में मलबा गिरने के कारण यह घटना हुई।

41 श्रमिक सुरंग के अंदर सिलक्यारा पोर्टल से 260 मीटर से 265 मीटर अंदर रिप्रोफाइलिंग का काम कर रहे थे, तभी सिलक्यारा पोर्टल से 205 मीटर से 260 मीटर की दूरी पर मिट्टी का धंसाव हुआ और सभी 41 श्रमिक अंदर फंस गए।

घटना की सूचना तुरंत राज्य और केंद्र सरकार की सभी संबंधित एजेंसियों को दी गई और उपलब्ध पाइपों के जरिए सुरंग में फंसे हुए श्रमिकों को ऑक्सीजन, पानी, बिजली, पैक भोजन की आपूर्ति के साथ बचाव कार्य शुरू किया गया। फंसे हुए श्रमिकों से वॉकी-टॉकी के माध्यम से भी संचार स्थापित किया गया है। श्रमिकों को शीघ्र बचाव के लिए कई बीते 16 दिनों में कई उपाय किए गए हैं। 

रैट माइनर्स
रैट माइनर्स - फोटो : अमर उजाला
क्या है रैट होल माइनिंग?
रैट-होल माइनिंग एक ऐसी पद्धति है जिसमें कुछ खनिक कोयला निकालने के लिए संकरे बिलों में जाते हैं। हालांकि, यह पद्धति विवादित और गैर-कानूनी भी है। दरअसल, यह प्रथा पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में प्रचलित थी। खनिक गड्ढे खोदकर चार फीट चौड़ाई वाले उन संकरे गड्ढों में उतरते थे जो, जहां केवल एक व्यक्ति की जगह होती है। वे बांस की सीढ़ियों और रस्सियों का इस्तेमाल करके नीचे उतरते थे, फिर गैंती, फावड़े और टोकरियों आदि का उपयोग करके मैन्युअल रूप से कोयला निकालते थे।

एनजीटी
एनजीटी - फोटो : सोशल मीडिया
विवादित क्यों है यह पद्धति?
इस तरीके से होने वाली खुदाई से सुरक्षा खतरे उत्पन्न हो गए। ऐसा इसलिए क्योंकि खनिक सुरक्षा उपाय किए बिना गड्ढे में उतर जाते थे और कई बार हादसों का शिकार हो जाते थे। ऐसे कई मामले भी आए जहां बरसात में रैट होल माइनिंग के कारण खनन क्षेत्रों में पानी भर गया, जिसके चलते श्रमिकों की जानें गईं। यही कारण है कि साल 2014 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने मेघालय में इस पद्धति से होने वाली खुदाई पर पाबंदी लगा दिया।

रैट माइनर्स की टीम
रैट माइनर्स की टीम - फोटो : अमर उजाला
सिलक्यारा में रैट माइनर्स कैसे काम कर रहे हैं? 
सिलक्यारा बचाव अभियान में लगातार विफल होते विकल्पों के बीच सोमवार को छह सदस्यीय रैट माइनर्स की टीम  को तैनात किया गया। ऑगर मशीन के फेल होने के बाद हाथ से खोदाई कराने का फैसला किया गया। श्रमिकों की कुशल टीम रैट होल माइनिंग पद्धति का इस्तेमाल करके हाथ से मलबा हटाने का काम किया। 

एक विशेषज्ञ ने बताया कि एक आदमी खुदाई करता है, दूसरा मलबा इकट्ठा करता है और तीसरा उसे बाहर निकालने के लिए ट्रॉली पर रखता है। विशेषज्ञ मैन्युअली मलबे को हटाने के लिए 800 मिमी पाइप के अंदर काम कर रहे हैं। कहा गया कि इस दौरान एक फावड़ा और अन्य विशेष उपकरण का उपयोग किया जा रहा है। ऑक्सीजन के लिए एक ब्लोअर भी लगा है।

इस प्रकार की ड्रिलिंग काफी मेहनत वाला काम है और खुदाई करने वालों को बारी-बारी से खुदाई करनी पड़ती है। हालांकि, ये खनिक ऐसे कामों के लिए कुशल हैं।
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