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Supreme Court: 'आत्मा की आवाज नहीं सुनते हैं तो हम यहां क्यों हैं?', पढ़ें, सीजेआई ने क्यों कही यह बात

Fri, 16 Dec 2022 02:47 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Fri, 16 Dec 2022 02:47 PM IST
सार

पीठ ने यह सवाल विद्युत अधिनियम के तहत नौ मामलों में 18 साल की जेल की सजा भुगतने वाले एक व्यक्ति की याचिका पर उठाया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और पीड़ित को रिहा करने का आदेश दे दिया।  

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What for are we here if we do not listen to our conscience, asks CJI
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसले में 'व्यक्तिग आजादी' (personal liberty) को लेकर बड़ी बात कही। इसका महत्व बताते हुए शीर्ष कोर्ट ने कहा कि यदि वह नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के मामलों में उसे मिले विशेष संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं करती है तो यह एक अवहेलना होगी। 

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सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल खड़ा किया कि 'हम यहां क्यों हैं, यदि हम अपनी आत्मा की आवाज नहीं सुनते? पीठ ने यह सवाल विद्युत अधिनियम के तहत नौ मामलों में 18 साल की जेल की सजा भुगतने वाले एक व्यक्ति की याचिका पर उठाया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और पीड़ित को रिहा करने का आदेश दे दिया।  

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सुप्रीम केस के लिए कोई केस छोटा या बड़ा नहीं
पीठ ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के लिए कोई केस छोटा या बड़ा नहीं है। यदि हम व्यक्तिगत आजादी के मामलों में कार्रवाई नहीं करते और राहत प्रदान नहीं करते तो हम यहां क्यों हैं? पीठ में सीजेआई के साथ जस्टिस नरसिम्हा भी मौजूद थे। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि यदि हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में कार्रवाई नहीं करते हैं तो हम अनुच्छेद 136 (संविधान के तहत राहत देने की विशेष शक्तियां) का उल्लंघन करेंगे।
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रिजिजू ने की थी टिप्पणी
सीजेआई चंद्रचूड़ की ये टिप्पणियां कि कोई मामला छोटा बड़ा नहीं होता, अहम हैं, क्योंकि केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने हाल ही में संसद में कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय को जमानत याचिकाओं और तुच्छ जनहित याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए, जबकि लंबित मामलों की संख्या इतनी अधिक है।

हापुड़ की कोर्ट ने सुनाई थी नौ मामलों में दो साल की सजा
सुप्रीम कोर्ट ने उक्त टिप्पणियों के साथ यूपी के याचिकाकर्ता इकराम को राहत दे दी। इकराम को उत्तर प्रदेश के हापुड़ की निचली अदालत ने नौ आपराधिक मामलों में दोषी ठहराया था और प्रत्येक मामले में जुर्माने के अलावा दो साल की जेल की सजा सुनाई थी। इकराम लगभग तीन साल से जेल में है।

उसकी सजा का जेल अधिकारियों ने गलत आकलन किया और उसकी सारी सजा एक साथ चलाने की बजाए बारी बारी से चलाने की बात कही। इस कारण उसकी जेल की कुल सजा 18 साल की हो जाती। हाईकोर्ट ने भी दोषी को राहत देने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सारी सजा साथ-साथ चलेगी। इससे उसकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया, क्योंकि वह तीन साल की सजा काट चुका है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट न्याय के इस गर्भपात को रोक सकती थी। 
 

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