Sri Lanka: श्रीलंका को कौन-सी दिशा देंगे दिसानायके, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती
लंबे समय से चल रहे आर्थिक संकट से जूझते मतदाताओं ने वामपंथी दिसानायके को आर्थिक सुधार के वादे के लिए चुना है। पर भारत की चिंता हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर है। उम्मीद है कि श्रीलंका के नए राष्ट्रपति वैश्विक शक्तियों के बीच सत्ता के खेल में शामिल नहीं होंगे।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में वामपंथी नेता अनुरा कुमारा दिसानायके ने जीत दर्ज की है, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि श्रीलंका के लोगों ने पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को नकार दिया है। लंबे समय से चल रहे आर्थिक संकट से जूझते मतदाताओं ने दिसानायके को न सिर्फ आर्थिक सुधार के वादे के लिए चुना है, बल्कि आम नागरिकों की परेशानी कम करने की प्रतिबद्धता के लिए भी चुना है। श्रीलंका की राजनीति, जो 2005 में महिंदा राजपक्षे के उदय के बाद दक्षिणपंथी हो गई थी, 2015 तक उनके प्रभाव में रही। लेकिन यह चुनाव इस बात का प्रतीक है कि वामपंथी गठबंधन में लोगों का विश्वास बढ़ा है, क्योंकि जनता देश की चुनौतियों से निपटने के लिए नए नेतृत्व की तलाश कर रही है।
श्रीलंका को 2022 में गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, जब वह विदेशी ऋण नहीं चुकता कर पाने की वजह से वित्तीय संकट में डूब गया था। इस संकट के लिए मुख्यतः राजनीतिक नेतृत्व द्वारा वित्त के कुप्रबंधन और व्यापक भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराया गया था। स्वाभाविक रूप से 2024 के चुनाव में आर्थिक मुद्दे खासकर 2022 का विदेशी मुद्रा संकट हावी रहा, जिसके कारण आवश्यक वस्तुओं की कमी, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे का इस्तीफा भी हुआ। उनके उत्तराधिकारी रानिल विक्रमसिंघे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से तीन अरब डॉलर का ऋण लेकर अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में कामयाब रहे। लेकिन राहत पैकेज के साथ किए गए मितव्ययिता उपायों और करों में बढ़ोतरी ने उन्हें तेजी से अलोकप्रिय बना दिया।
हालांकि आईएमएफ के ऋण से दीर्घकालिक आर्थिक सुधार को समर्थन मिलने की उम्मीद है, लेकिन इससे मुद्रास्फीति में भारी उछाल और जीवन-यापन की लागत का संकट भी पैदा हुआ है। विक्रमसिंघे के प्रयासों से स्थिरता तो आई है, लेकिन जनता की तत्कालिक वित्तीय पीड़ा कम नहीं हुई है, जिससे कई श्रीलंकाई निराश होकर नेतृत्व में बदलाव के लिए उत्सुक हुए। श्रीलंकाई राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं ने भारी मतदान किया। लगभग 75 फीसदी मतदाताओं द्वारा मतदान किया जाना, मौजूदा आर्थिक चुनौतियों के बीच जनता की गहरी दिलचस्पी को दर्शाता है। इस चुनाव में रिकॉर्ड 38 उम्मीदवार थे, हालांकि केवल चार को ही मुख्य दावेदार माना गया।
मौजूदा राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के प्रयास के बाद फिर से चुनाव की मांग की। उन्हें वामपंथी नेता अनुरा कुमारा दिसानायके, सजित प्रेमदासा और नमल राजपक्षे से चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जो पूर्व राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के सबसे बड़े बेटे हैं। नमल राजपक्षे का लक्ष्य बदलाव लाना था, लेकिन 2022 के आर्थिक पतन के कारण राजपक्षे परिवार के लिए समर्थन कम हो गया था।
प्रत्येक प्रमुख उम्मीदवारों ने श्रीलंका के आर्थिक सुधार के लिए प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण पेश किया। दिसानायके ने भ्रष्टाचार खत्म करने और विवादास्पद आईएमएफ सौदे में संशोधन का वादा किया, भले ही इस पर फिर से बात करना मुश्किल हो। उन्होंने और प्रेमदासा ने आईएमएफ से जुड़े मितव्ययिता उपायों को कम करने की कसम खाई, जो तेजी से जनता के बीच अलोकप्रिय हो रहे हैं। हालांकि दिसानायके के गठबंधन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आश्वस्त किया कि वे आईएमएफ समझौते के दायरे में ही काम करेंगे और इसे रद्द करने के बजाय इसमें संशोधन की मांग करेंगे। उनके नेशनल पीपुल्स पावर (एनपीपी) ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने और विदेशी ऋण समझौतों और चीन के साथ हुए समझौतों की समीक्षा करने की प्रतिबद्धता जताई। दिसानायके जड़ जमाए राजनीतिक अभिजात वर्ग के प्रति लोगों की हताशा का स्वर बन गए।
दूसरी तरफ, विक्रमसिंघे को मितव्ययिता नीतियों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा, जिसने अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के बावजूद मुद्रास्फीति और जीवन-यापन की लागत को बढ़ाया। उन्होंने चेतावनी दी कि आईएमएफ सौदे पर फिर से बातचीत करने से महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता में देरी हो सकती है, लेकिन वह आर्थिक तनाव से जूझ रहे मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर पाए।
श्रीलंका की चुनाव प्रणाली मतदाताओं को अपने शीर्ष तीन उम्मीदवारों को चुनने की अनुमति देती है। यदि पहले दौर में कोई भी उम्मीदवार बहुमत हासिल नहीं करता है, तो पहले शीर्ष दो उम्मीदवार अंतिम दौड़ में पहुंच जाते हैं। फिर बाहर किए गए उम्मीदवारों के मतपत्रों की दूसरी वरीयता के वोटों की जांच की जाती है, जिन्हें इन दोनों शीर्ष उम्मीदवारों में फिर से वितरित किया जाता है। इस चुनाव में अनुरा कुमारा दिसानायके और सजित प्रेमदासा दो शीर्ष उम्मीदवार बनकर उभरे, जिसमें दिसानायके ने अंततः राष्ट्रपति पद जीता। उनकी जीत बदलाव की मांग का संकेत देती है, क्योंकि श्रीलंकाई लोग मौजूदा आर्थिक संकट के प्रभावों से जूझ रहे हैं।
जहां तक भारत से रिश्ते की बात है, उम्मीद करनी चाहिए श्रीलंका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति द्विपक्षीय संबंधों में हाल में हुए सकारात्मक विकास को जारी रखेंगे। आर्थिक संकट ने श्रीलंका को अपने पड़ोसी भारत से सहायता मांगने पर मजबूर कर दिया था। और भारत ने ‘पड़ोसी पहले’ की अपनी नीति के तहत वित्तीय संकट से उबरने के लिए श्रीलंका को चार अरब डॉलर की सहायता दी थी। दोनों देशों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और बाहरी हस्तक्षेप को कम करने के लिए भी मिलकर काम किया है।
एक तरह से आर्थिक संकट ने श्रीलंका और भारत को करीब लाने का काम किया। हालांकि भारत हिंद महासागर में सुरक्षा को लेकर चिंतित है, जहां चीन तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। दिसानायके की पार्टी ने वचन दिया है कि उनके नेतृत्व में, श्रीलंका वैश्विक शक्तियों के बीच सत्ता के खेल में शामिल नहीं होगा और यह सुनिश्चित करेगा कि उसके क्षेत्र का उपयोग किसी अन्य देश के खिलाफ न किया जाए। यदि श्रीलंका आर्थिक स्थिरता प्राप्त कर सकता है और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति बनाए रख सकता है, तो यह दोनों देशों के लिए जीत वाली स्थिति होगी, जिससे सुरक्षा और सहयोग के संदर्भ में दोनों देशों को परस्पर लाभ होगा।