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Murshidabad Violence: 'आज भी रात को नींद नहीं आती, कानों में गूंजती है चीख-पुकार'; पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट

Wed, 16 Apr 2025 02:22 PM IST
N Arjun एन अर्जुन
Updated Wed, 16 Apr 2025 02:22 PM IST
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West Bengal ground report: Even today peole cant sleep at night screams and cries echo in ears
हिंसा के बाद महिलाओं का छलका दर्द - फोटो : Amar Ujala

उस रात का दर्द सुनाने को आज मेरे पास न तो हिम्मत है, और न ही कलेजा। दिल धक्क से बैठ जाता है। आज भी रात को नींद नहीं आती। कानों में चीख पुकार गूंजती है। एक साथ ही रहने वाले कैसे हैवान बन सकते हैं। कैसे हमारे कपड़ों को खींच सकते हैं। कैसे हमारे साथ उत्पीड़ करने की सोच सकते हैं। इनसान को जानवर बनते देर नहीं लगती, सुना तो था लेकिन उस रात हकीकत में देखा। धूं-धूं कर घर जल रहे थे। हर कोई अपनी जान बचाने के लिए इधर से उधर भाग रहा था। मां के साथ चार दिन के बच्चे को लेकर कैसे नदी पार की होगी, जब पति भी घर पर नहीं थे। कैसे तो इतनी हिम्मत आई होगी। अपने नौ दिन के बच्चे को गोदी में लेकर दुलारते हुए सुबक पड़ती हैं बेदवना गांव की सप्तमी मंडल...। भींखी आंखों के साथ यह बात मंगलवार सप्तमी ने अमर उजाला को बताई। 

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वे मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा के बाद किसी तरह गंगा पार करके मालदा के पारलालपुर में बने हाईस्कूल राहत शिविर में रह रही हैं। ऐसी दर्द भरी कहानी केवल सप्तमी मंडल की नहीं है। ऐसी सैकड़ों महिलाएं इस राहत शिविर में हैं, जिनकी कहानी लगभग एक जैसी है। जो दर्द और हैवानियत की कहानी बयां करती हैं। सप्तमी कहती हैं, बच्चा बीमार था, लेकिन मैं दवा तक नहीं उठा पाई। उल्लेखनीय है कि इस राहत में शिविर में करीब 150 से अधिक परिवार और करीब सात सौ लोग रह रहे हैं। मंगलवार को राहत शिविर के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात थी।
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काश मैं हिंदू न होकर मुस्लिम होती
राहत शिविर में रह रहीं, एक पीड़िता ने कहा, मैं हिंदू हूं, इसलिए मरे साथ यह हुआ। मेरा घर जला दिया गया। मैं दो बच्चियों के साथ किसी तरह से भाग कर यहां पहुंची। मेरा कसूर केवल इतना है कि मैं हिंदू घर में जन्मी। आज ऐसा लगता है कि अगर मुस्लिम घर में जन्मी होती तो मैं भी सुरक्षित होती। अपने घर में धुलियान में होती। जो तन पर कपड़े हैं, वहीं लेकर मैं बच्चों के साथ हूं। आज लोग कपड़े दे रहे हैं तो पहन पा रही हूं।
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एक तरफ घर जल रहे थे, दूसरी ओर वे...
धुलियान की ही एक अन्य पीड़िता ने कहा, उस दिन मुस्लिम बहुत हैवान हो गए थे। घरों को पेट्रोल डाल कर आग लगा रहे थे। घर धूं-धूं कर जल रहे थे। अपनी आंखों के सामने ही, सब कुछ नष्ट होते देख रहे थे लेकिन कुछ कर नहीं पा रहे थे। एक तरफ घर जल रहे थे और दूसरी ओर जिन्हें हम आज तक अपना मानते थे, वे ही हमें खींच रहे थे। हमारे साथ गलत व्यवहार कर रहे थे। कैसे जाएं अब अपने घर। हम अंदर तक हिल गए हैं। आज हमारे साथ वे ऐसा कर रहे हैं, कल हमारे बच्चों के साथ नहीं करेंगे, क्या गारंटी है।

पुलिस वाले मूकदर्शक बने तमाशा देखते रहे
वार्ड नंबर पांच की एक अन्य महिला ने कहा, जब ये सब कुछ हो रहा था तो पुलिस मूकदर्शक बन कर तमाशा देख रही थी। हमने गुहार लगाई, लेकिन किसी तरह का कोई सहायता हमें नहीं मिली। घर जल रहे थे, सामान को आल लगाई जा रही थी, पुलिस से विनती की, हमारी मदद करो। पुलिस वालों ने कहा, जाओ, हम आते हैं। अब हमें पुलिस पर कोई भरोसा नहीं है। बीएसएफ पर भरोसा है, जब तक वहां पर बीसीएसएफ कैंप और हमारे घर और रोजगार का कोई जरिया नहीं दिया जाता, हम वहां जाकर क्या करेंगे।

केंद्र को करूंगा अवगत, सख्त कदम उठाने को कहूंगाः मुर्मू
उत्तर मालदा के सांसद खगेन मुर्मू ने मंगलवार को राहत शिविर का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कहा, यह बहुत ही दुखद घटना है। इस तरह से बंगाल का माहौल खराब किया जा रहा है। यह एक सोची समझी साजिश के तहत हुई है। हिंदुओं पर यह अत्याचार राजनीतिक साजिश का हिस्सा है। खगेन ने कहा, मैं इसकी पूरी रिपोर्ट केंद्र सरकार को दूंगा। इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाने के लिए कहूंगा।

मेरे क्षेत्र में ऐसा हुआ, मुझे दुख हैः ईशा खान
मंगलवार को मालदा दक्षिण के सांसद ईशा खान चौधरी भी राहत शिविर मे लोगों से मिलने पहुंचे थे, लेकिन गुस्साए लोगों ने उन्हें गाड़ी से उतरने तक नहीं दिया। ईशा खान चौधरी गो बैक के नारे लगाए। काफी देर तक वे राहत शिविर में जाने का इंतजार करते रहे, लेकिन लोगों के गुस्से को देखते हुए, वे वापस चले गए। उन्होंने कहा, जहां घटना हुई वह भी मेरा क्षेत्र है और जहां पर राहत शिविर में लोग रहे हैं, वह भी मेरा ही क्षेत्र है। मुझे इसका बेहत अफसोस है कि मेरे क्षेत्र में यह हुआ। सदियों से एक साथ रहने वालों में यह दरार पैदा हुआ। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि जल्द से जल्द हालत सुधरे और लोग वापस अपने घरों को लौटें।


आज नववर्ष है, चॉकलेट लेकर आई हूं
मंगलवार को बांग्ला नववर्ष था। पश्चिम बंगाल में पोइला बैसाक को नववर्ष का त्योहार मनाया जाता है। राहत शिविर के बाहर भारी संख्या में पुलिसबल तैनात थी। राहत शिविर का दरवाजा बंद कर दिया गया था। किसी को भी अंदर जाने को नहीं दिया जा रहा था। इस बीच, पेड़ के नीचे एक बुजुर्ग महिला हाथ में एक बैग लेकर खड़ीं थीं। पूछा कि इसमें क्या है तो बोलीं-इसमें चॉकलेट है। आज बांग्ला नववर्ष है न। अंदर बहुत से बच्चे हैं, उनको ये चॉकलेट देने आई हूं। बच्चे तो बच्चे हैं, वे अगर आज घर में होते तो बहुत कुछ खाते, पीते। नए कपड़े पहनते। लेकिन वे आज राहत शिविर में हैं। सोचा-बच्चों को अपनी तरफ से जो हो सकेगे वही दे आऊं। यही सोचकर चॉकलेट लेकर आई हूं। पता नहीं दे भी पाऊंगी या नहीं।

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