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पश्चिम बंगाल चुनाव-2021 : आजादी के बाद पहली बार बदला नजारा, सांप्रदायिकता व पहचान आधारित राजनीति पर जोर

Tue, 02 Mar 2021 05:42 PM IST
सुरेंद्र जोशी पीटीआई, कोलकाता
पीटीआई, कोलकाता Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Tue, 02 Mar 2021 05:42 PM IST
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West Bengal Election-2021: first time after independence, change was visible, emphasis on communalism and identity-based politics
विधानसभा चुनाव 2021 - फोटो : Amar Ujala

पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के बारे में विभिन्न दलों के नेताओं का मानना है कि इस बार चुनाव में सांप्रदायिकता और पहचान आधारित राजनीति पर खासा जोर रहेगा। राज्य में आजादी के बाद पहली बार इस तरह का चुनावी नजारा देखने को मिल रहा है। बंगाल में आमतौर पर चुनावी विमर्श विभाजनकारी एजेंडे से परे रहा है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा द्वारा चुनाव से पहले एक-दूसरे पर सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने के आरोप लगाते दिख रहे हैं। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में अभी तक के सबसे कड़ा मुकाबले का सामना कर रही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘भीतरी-बनाम बाहरी’ बहस को शुरू किया। वह भाजपा को गुजरात की पार्टी बता ‘बंगाली गौरव’ पर जोर दे रही हैं।

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सिद्दीकी की सियासत से बदल गए कई समीकरण
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आने वाले पहले धार्मिक नेता अब्बास सिद्दीकी की अगुवाई में नवगठित इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के चुनावी मैदान में उतरने के साथ ही कई राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं और राज्य में धार्मिक पहचान आधारित सियासत की शुरुआत हो चुकी है।
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सौगत राय बोले - इस बार के चुनाव अलग

तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सांसद सौगत रॉय ने कहा कि आजादी के बाद से जितने भी विधानसभा चुनाव हुए, उनके मुकाबले इस बार के चुनाव अलग होंगे। भाजपा की समुदायों के बीच विभाजन की लंबे समय से कोशिश कर रही है, लेकिन हम इसके खिलाफ लड़ेंगे और लोगों को एकजुट करने के लिए काम करेंगे।

दिलीप घोष ने कहा - तृणमूल की तुष्टिकरण की राजनीति दोषी
भाजपा नेतृत्व ने भी यह स्वीकार किया कि राज्य में सांप्रदायिक धुव्रीकरण बढ़ रहा है, लेकिन उन्होंने इसके लिए तृणमूल और उसकी तुष्टिकरण की राजनीतिक को दोषी ठहराया। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा, कि हमारे लिए तो चुनाव का मुद्दा ‘सभी के लिए विकास’ है। तृणमूल कांग्रेस सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति और राज्य के बहुसंख्यक समुदाय के प्रति उसके द्वारा किया जा रहे अन्याय से बंगाल में निश्चित ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ है। भाजपा नेता तथागत रॉय ने कहा कि बंटवारे के दाग और बंगाल में मुस्लिम पहचान वाली राजनीति के बढ़ने से सांप्रदायिक विभाजन गहरा गया है। विपक्षी कांग्रेस विभाजनकारी राजनीति के लिए भाजपा एवं तृणमूल कांग्रेस दोनों, को जिम्मेदार ठहरा रही है। उसका कहना है कि राज्य की राजनीति के लिए यह लगभग अनजान रहा है।


 

माकपा नेता सलीम बोले - महंगाई का भी रहेगा प्रभाव

माकपा के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने कहा कि पहले (माकपा शासन के दौरान) यदि सांप्रदायिक विमर्श हावी होता तो भगवा दलों और अन्य चरमपंथी दलों ने अपना आधार बना लिया होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह सच है कि इस बार दल सांप्रदायिक कार्ड खेल रहे हैं लेकिन आम लोगों से जुड़े विषय जैसे कि ईंधन की कीमतों में बढोतरी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी आदि का भी बहुत हद तक प्रभाव रहेगा।

सत्तारूढ़ तृणमूल व भाजपा में कड़ी टक्कर
बंगाल में 27 मार्च से आठ चरणों में चुनाव शुरू हो रहा है। माना जा रहा है कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में इस बार कड़ा मुकाबला होगा। चुनाव के नतीजे दो मई को आएंगे। भाजपा सूत्रों का कहना है कि बीते छह साल में तृणमूल की सरकार सांप्रदायिक दंगों पर काबू पाने में विफल रही है, जिससे न केवल अल्पसंख्यकों का एक वर्ग नाराज है बल्कि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों में भी रोष है।

2015 से बढ़ी सांप्रदायिक हिंसा
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 2018 में जारी आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 2015 से सांप्रदायिक हिंसा तेजी से बढ़ी है, जहां वर्ष 2015 में सांप्रदायिक हिंसा की 27 घटनाएं हुई,  वहीं वर्ष 2017 में इनकी संख्या 58 हो गई।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अब्दुल मन्नान ने कहा कि सत्तर के दशक तक आईयूएमएल, पीएमएल और भारतीय जन संघ जैसे दल कुछ सीटें जीतने में कामयाब रहे, लेकिन चुनावी अभियान सांप्रदायिक विमर्श पर केंद्रित नहीं थे। विकास संबंधी मुद्दे, राज्य और केंद्र सरकार विरोधी मुद्दे ही हावी रहे।

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1960 में बांग्लादेश के शरणार्थी मुद्दे पर वामदलों का उदय 

पश्चिम बंगाल में 1960 के दशक में वाम दलों का उदय हुआ जिन्होंने बांग्लादेशी शरणार्थियों के अधिकारों के मुद्दे पर चुनाव लड़ा और इसके साथ ही राज्य में दक्षिण पंथी ताकतों का प्रभाव समाप्त हो गया।

प्रख्यात इतिहासकार एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय में गार्डिनर प्रोफेसर सौगत बोस ने कहा कि बांग्लादेश से आए शरणार्थी और बंगाली मुस्लिम का झुकाव वाम के प्रति अधिक था। इसलिए सांप्रदायिकता यहां कभी गति नहीं पकड़ सकी। राज्य ने कभी ऐसी विभाजनकारी राजनीति नहीं देखी जैसी अब हो रही है। चुनाव पर्यवेक्षकों का मानना है कि वाम दल समुदायों के बीच संतुलन स्थापित करने में कामयाब रहे जो तृणमूल कांग्रेस नहीं कर पाई। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि बंगाल में समाज के ध्रुवीकरण के लिए हमेशा से अनुकूल सामग्री रही है। राज्य में न केवल अधिक अल्पसंख्यक आबादी है बल्कि बांग्लादेश से शरणार्थियों की वर्ष 1947 एवं 1971 मे बाढ़ आई, जो प्रमुख कारण है।


सिद्दीकी की पार्टी बांटेगी मुस्लिम वोट
तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट के बंगाल के चुनाव में प्रवेश से खाई बढ़ेगी और मुस्लिम मतों के विभाजन से भाजपा को फायदा होगा। भाजपा नेता तथागत रॉय ने कहा कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम पहचान पर जोर नई परिपाटी है और इससे हिंदू मत और एकजुट होंगे।
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