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हिंदी दिवस: 'भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद' विषय पर आईआईएमसी में हुई वेबिनार

Mon, 14 Sep 2020 08:39 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Mon, 14 Sep 2020 08:39 PM IST
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Webinar in IIMC on Interaction in Indian languages on Hindi Diwas
भारतीय जन संचार संस्थान

दिल्ली में स्थित भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) में सोमवार को 'भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद' विषय पर वेबिनार का आयोजन किया गया। इस वेबिनार का आयोजन हिंदी पखवाड़े के शुभारंभ के मौके पर किया गया। यहां मौजूद माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि भाषा का संबंध इतिहास, संस्कृति और परंपराओं से है। 

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उन्होंने कहा, 'भारतीय भाषाओं में अंतर-संवाद की परंपरा पुरानी है और ऐसा सैकड़ों वर्षों से होता आ रहा है। यह उस दौर में भी हो रहा था, जब वर्तमान समय में प्रचलित भाषाएं अपने बेहद मूल रूप में थीं। श्रीमद्भगवत गीता में समाहित श्रीकृष्ण का संदेश दुनिया के कोने-कोने में केवल अनेक भाषाओं में हुए उसके अनुवाद की बदौलत ही पहुंचा। उन दिनों अंतर-संवाद की भाषा संस्कृत थी, तो अब यह जिम्मेदारी हिंदी की है।'
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मिश्र ने कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच अंतर-संवाद में रुकावट अंग्रेजी के कारण आई और इसकी वजह हम भारतीय ही थे, जिन्होंने हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी को अंतर-संवाद का माध्यम बना लिया। उन्होंने कहा कि हिंदी के विद्वानों, पत्रकारों और संस्थाओं को इस दिशा में कार्य करना चाहिए था लेकिन उन्होंने यह जिम्मेदारी नहीं निभाई। 
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उन्होंने कहा कि जब डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 'अंग्रेजी हटाओ' अभियान शुरू किया, तो उसका आशय 'हिंदी लाओ' कतई नहीं था, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा प्रचारित किया गया। इसका निराकरण हिंदी के विद्वानों, पत्रकारों और संस्थाओं को करना चाहिए था। अन्य भारतीय भाषाओं के हिंदी के करीब आने का कारण मनोरंजन, पर्यटन और प्रकाशन क्षेत्र है। हिंदी की लोकप्रियता का श्रेय हिंदी के बुद्धिजीवियों को नहीं अपितु इन क्षेत्रों को दिया जाना चाहिए।

अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि वर्तमान सरकार की ओर से घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देखते हुए उससे कुछ अपेक्षाएं हैं। इसमें मातृभाषा में शिक्षा और भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन की बात हो रही है, अनुवाद की बात हो रही है। ऐसे में हिंदी से जुड़ी संस्थाएं यदि पहल करें तो हिंदी परस्पर आदान-प्रदान का व्यापक माध्यम बन सकती है।

जहां भाषा खत्म होती है, वहां संस्कृति भी दम तोड़ देती है : अद्वैता काला

वेबिनार की मुख्य वक्ता, पटकथा लेखक और स्तम्भकार अद्वैता काला ने कहा कि जहां भाषा खत्म होती है, वहां संस्कृति भी उसके साथ दम तोड़ देती है। हमें सभी भाषाओं को महत्व देना चाहिए, उन्हें समझना चाहिए और उनका सम्पर्क का माध्यम हिंदी है, इसे स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैसे भाषा बहुत निजी मामला है। इसके माध्यम से हम केवल दुनिया से ही नहीं बल्कि स्वयं से भी संवाद करते हैं।

हिंदी की स्थिति पर उन्होंने कहा कि फिल्मों की पटकथा और संवाद रोमन में लिखे जाते हैं, क्योंकि लोग हिंदी की लिपि नहीं पढ़ पाते, जबकि हिंदी मीडिया की पहुंच बहुत व्यापक है। काला ने बताया कि उनकी खुद की हिंदी भी हिंदी लेखन से जुड़ने के बाद ही बेहतर हुई और उन्हें लगता है कि शिक्षा प्रणाली यदि सही रही होती, तो ऐसा नहीं होता। उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चों को अंग्रेजी और हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषा भी पढ़ाई जानी चाहिए।

भाषाओं में अंतर-संवाद कोई नई बात नहीं : मुकेश शाह

गुजराती भाषा के 'साप्ताहिक साधना' के प्रबंध संपादक मुकेश शाह ने कहा कि शब्दों को हमने ब्रह्म माना है और भाषाओं में अंतर-संवाद कोई नई बात नहीं है। उन्होंने महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि बापू ने अंग्रेजी में 'हरिजन' प्रकाशित किया, लेकिन उसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने उसे गुजराती और हिंदी में भी स्थापित किया। 

उन्होंने गुजराती में 70 पुस्तकों की रचना करने वाले फादर वॉलेस और गुजरात में विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले सयाजीराव गायकवाड़ के योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उत्तर-दक्षिण भारत की भाषाओं में व्यापक अंतर होने के बावजूद उनमें अंतर-संवाद और अनुवाद होता आया है। उन्होंने कहा कि भाषाओं का राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में योगदान होता है।

परस्पर आदान-प्रदान से ही भाषाएं समृद्ध होती हैं : स्नेहशीष सुर

कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष स्नेहशीष सुर ने कहा कि सभी भाषाओं के बीच संवाद, संपर्क, उनके कल्याण और विकास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के पास बहुत विशाल विरासत और व्यवसायिक कौशल है लेकिन यह कौशल अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। समस्त भाषाएं आगे बढ़ें और उनकी पत्रकारिता आगे बढ़े यह प्रयास होना चाहिए। 
 
भाषा ही मेल-मिलाप कराती है : अमीर अली खान
हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक 'डेली सियासत के संपादक अमीर अली खान ने कहा कि पाकिस्तान ने जब उर्दू को अपनी राजभाषा बनाया, तो यहां हिंदी और उर्दू में अंतर आ गया। खान ने कहा कि भारत एक छोटे यूरोप की तरह है, इसको एक ही दिशा में नहीं ले जा सकते। यहां विविध भाषाएं हैं और भाषा ही मेल-मिलाप कराती है। उन्होंने कहा कि हिंदी की किताबों का तो उर्दू में अनुवाद कराया ही जाना चाहिए, अन्य भाषाओं की पुस्तकें भी हिंदी में अनुवादित होनी चाहिए। इससे अंतर-संवाद को बढ़ावा मिलेगा। 

समस्त भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं : प्रो. संजय द्विवेदी

इस विमर्श के अध्यक्ष और आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने अपने भाषण में कहा कि सरकार की ओर से घोषित नई राष्ट्रीय नीति में सभी भारतीय भाषाओं को महत्व दिया गया है। हिंदी अकेली राष्ट्र भाषा नहीं है। सभी भाषाएं इसी राष्ट्र के लोगों द्वारा बोली जाती हैं, लिहाजा वे सभी राष्ट्रीय भाषाएं ही हैं। हर जगह संपर्क का माध्यम अंग्रेजी बन जाने से नुकसान पहुंचा है, क्योंकि बहुत कम लोग हैं, जो अंग्रेजी बोलते हैं। 

प्रो. द्विवेदी ने ऐसे अनेक विद्वानों का उल्लेख किया जिन्होंने  हिंदी और भाषायी पत्रकारिता में अभूतपूर्व योगदान दिया है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की विशेषताएं गिनाते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में अंतर संवाद से वे एक दूसरे के गुण अपनाएंगी और अंतत: सर्वव्यापी, सर्वग्राह्य बनेंगी। इससे भाषायी विद्वेष की भावना का अंत होगा, परम्पराओं का समन्वय होगा और सभी को सामाजिक न्याय तथा आर्थिक न्याय प्राप्त होगा।

भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को मिले प्रोत्साहन: प्रो. आनंद प्रधान

भारतीय जन संचार संस्थान के भारतीय भाषायी पत्रकारिता विभाग के प्रो. आनंद प्रधान ने कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को व्यापक रूप से प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में बीच संवाद सैकड़ों वर्षों से जारी है और इनका विकास भी साथ-साथ ही हुआ है। मसलन बांग्ला और मैथिली में इतनी समानता है कि उनमें अंतर करना मुश्किल है। 

इसी तरह अवधी और ब्रज भाषा तथा हिंदी और उर्दू में भी ऐसा ही है। इस संबंध में उन्होंने एक शोध का हवाला दिया। प्रो. प्रधान ने बताया कि हिंदी और उर्दू दैनिकों की भाषा पर हुए एक शोध में देखा गया कि उनमें केवल 23 फीसदी शब्द ही अलग थे। उन्होंने कहा कि वैसे ही हिंदी पत्रकारिता के विकास में मराठी, बांग्ला और दक्षिण भारतीय भाषाओं के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती।

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