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हम हमेशा गुस्से में रहते हैं, हमारे गुस्से का कोई मतलब नहीं है : जस्टिस गोगोई
Thu, 14 Feb 2019 06:08 AM IST
Gaurav Pandey
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Gaurav Pandey
Updated Thu, 14 Feb 2019 06:08 AM IST
सार
- पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार की याचिका पर पूरे दिन हुई सुनवाई
- याचिका में हिरासत में यातना के खिलाफ कानून बनाने की मांग की गई है
- वरिष्ठ वकील कुमार की एक टिप्पणी पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई कही यह बात
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जस्टिस रंजन गोगोई (फाइल फोटो)
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार की जनहित याचिका पर पूरे दिन सुनवाई की। इसमें हिरासत में यातना के खिलाफ कानून की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कुमार की एक टिप्पणी पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि हम हमेशा गुस्से में रहते हैं। हमारे गुस्से का कोई मतलब नहीं है।
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दरअसल कुमार ने शिकायत की है कि भारत ने 1997 में अत्याचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किया था लेकिन सरकार ने अभी भी इसकी पुष्टि नहीं की है, जो यातना को एक अपराध के रूप में परिभाषित करता है। उन्होंने तीन सदस्यीय पीठ से कहा कि उन्होंने 2016 में याचिका दायर की थी और 27 नवंबर 2017 को इसका निपटारा कर दिया गया। इसके बाद से इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई। इसके चलते उन्हें कोर्ट में दोबारा आना पड़ा।
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इस दौरान उन्होंने कहा कि यदि पीठ नाराज नहीं हो तो वह इसे आगे बढ़ाएं। इस पर सीजेआई गोगोई ने उक्त टिप्पणी की। सीजेआई ने कहा कि हम आज या कल यहां तक शुक्रवार को भी किसी अन्य मामले की सुनवाई नहीं करेंगे। आपकी शिकायत है कि आप जैसे वरिष्ठ वकील की आवाज नहीं सुनी गई, हम अब आपकी बात सुनेंगे। इसके बाद पीठ ने पूरा दिन इसी मामले की सुनवाई की।
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पीठ में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना भी शामिल हैं। हालांकि पीठ ने कुमार की याचिका पर सुनवाई शुरू करते हुए याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट 130 करोड़ लोगों की शिकायतों का निपटारा करने के लिए है जोकि दुनिया की जनसंख्या की आधी आबादी है। हर व्यक्ति यह कहता दिखता है कि उसकी सुनवाई नहीं हो रही है।
साथ ही पीठ ने यह भी बताने की कोशिश की कि कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत संसद को निर्देशित नहीं कर सकता है क्योंकि संसद अपने क्षेत्र में संप्रभु है और सुप्रीम कोर्ट अपने क्षेत्र में ही संप्रभु है। पीठ ने कहा कि कोर्ट केंद्र सरकार को मानवीय गरिमा को बनाए रखने के अपने संवैधानिक वादे का सम्मान करने के लिए एक रिट जारी नहीं कर सकती है।