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पानी को तरसा बुंदेलखंड, बेटियों के नहीं हो रहे हाथ पीले
विकास सनाड्य, ब्यूरो/अमर उजाला, झांसी
Updated Fri, 08 Apr 2016 05:58 AM IST
सार
- फसल नहीं हुई हाथ खाली, कैसे करें बेटियों की शादी
- पढ़ाई छोड़कर पानी के इंतजाम में जुटे रहते हैं बच्चे
- पानी के लिए कुआं खोदने में जुटा है पूरा परिवार
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कुदरत के कोप से बेहाल बुंदेलखंड
- फोटो : amar ujala bureau
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विस्तार
कुदरत के कोप के चलते बुंदेलखंड की बेटियों की शादियां तक रुक गईं हैं। शादी तय होने के बाद भी लड़कियों के हाथ पीले नहीं हो पा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में शादियां रबी की फसल की कटाई के बाद होती हैं, लेकिन इस बार फसल हुई नहीं, जिससे हाथ खाली हैं। पैसा न होने से ग्रामीण बेटियों की शादियां भी नहीं कर पा रहे हैं।
ग्राम खजराहा बुजुर्ग निवासी दो एकड़ के कास्तकार रामरतन विश्वकर्मा के चार बच्चे हैं। इनमें एक लड़का व एक लड़की की शादी पहले हो चुकी है। जबकि, दूसरी लड़की मोहिनी की शादी वह पिछले साल तय कर चुके हैं। गेहूं की फसल के बाद शादी की तैयारी थी। लेकिन, फसल न होने से शादी टाल दी है। उनकी पत्नी शांती देवी कहती हैं कि जब हाथ में पैसा ही नहीं है, तो शादी कैसे करें। अब शादी कब होगी? यह अभी पता नहीं है।
पानी के लिए छोड़ दी पढ़ाई
बुंदेलखंड में पानी की कमी बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित करने लगी है। बच्चे पढ़ाई छोड़कर घर के लिए पानी के इंतजाम में जुटे रहते हैं। खासतौर पर लड़कियां इस काम में लगी रहती हैं। पीने व अन्य घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पानी का इंतजाम ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी चुनौती है। पानी के लिए लोगों को मीलों चलकर भी जाना पड़ता है। यह काम बच्चों से लिया जा रहा है।
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गांवों में साइकिल पर दोनों ओर पानी के बर्तन टांगकर बच्चों का आवागमन आम बात हो गया है। ग्राम चंद्रनगर की मुस्कान व रोशनी ने बताया कि वह गांव के स्कूल में पढ़ती हैं। लेकिन, आजकल स्कूल नहीं जा पा रही हैं। क्योंकि, सुबह से ही उन्हें गांव के उस ओर लगे हैंडपंप पर पानी भरने जाना पड़ता है। दिन में 14-15 चक्कर लगाने पड़ जाते हैं।
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ग्राम खजराहा बुजुर्ग निवासी दो एकड़ के कास्तकार रामरतन विश्वकर्मा के चार बच्चे हैं। इनमें एक लड़का व एक लड़की की शादी पहले हो चुकी है। जबकि, दूसरी लड़की मोहिनी की शादी वह पिछले साल तय कर चुके हैं। गेहूं की फसल के बाद शादी की तैयारी थी। लेकिन, फसल न होने से शादी टाल दी है। उनकी पत्नी शांती देवी कहती हैं कि जब हाथ में पैसा ही नहीं है, तो शादी कैसे करें। अब शादी कब होगी? यह अभी पता नहीं है।
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पानी के लिए छोड़ दी पढ़ाई
बुंदेलखंड में पानी की कमी बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित करने लगी है। बच्चे पढ़ाई छोड़कर घर के लिए पानी के इंतजाम में जुटे रहते हैं। खासतौर पर लड़कियां इस काम में लगी रहती हैं। पीने व अन्य घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पानी का इंतजाम ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी चुनौती है। पानी के लिए लोगों को मीलों चलकर भी जाना पड़ता है। यह काम बच्चों से लिया जा रहा है।
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गांवों में साइकिल पर दोनों ओर पानी के बर्तन टांगकर बच्चों का आवागमन आम बात हो गया है। ग्राम चंद्रनगर की मुस्कान व रोशनी ने बताया कि वह गांव के स्कूल में पढ़ती हैं। लेकिन, आजकल स्कूल नहीं जा पा रही हैं। क्योंकि, सुबह से ही उन्हें गांव के उस ओर लगे हैंडपंप पर पानी भरने जाना पड़ता है। दिन में 14-15 चक्कर लगाने पड़ जाते हैं।
बुंदेलखंड पानी को तरसा, रोटी के लाले
पूरा परिवार कुआं खोदने में जुटा
- फोटो : amar ujala bureau
पिछले साल फसल न के बराबर हुई थी। इस साल तो मुट्ठी भर भी अनाज नहीं हुआ। तीन एकड़ जमीन सूनी पड़ी हुई है। पहले खेत के एक छोर पर कुआं था, जो सूख चुका है। आमदनी का और कोई जरिया नहीं है, करनी खेती ही है। इसके लिए जमीन में पानी तलाश रहे हैं।
यह बात चंद्रनगर के किसान राजाराम ने कही। वह 15 फुट गहरे गड्ढे में खड़े होकर पत्थर तोड़ रहे थे। उन्होंने बताया कि करीब साठ-सत्तर फुट खुदाई और होनी है। हाथ में पैसे तो हैं नहीं, ऐसे में पूरा परिवार कुआं खोदने में जुटा है। राजाराम नीचे कुएं के लिए पत्थर तोड़ रहे थे। जबकि, उनका परिवार नीचे के पत्थर ऊपर खींच रहा था।
बुंदेलखंड में गेहूं की फसल चौपट होने के साथ गर्मी की शुरूआत में ही अकाल अब विकराल रूप लेता नजर आ रहा है। पानी, अनाज के लिए किसान और मवेशी तड़प रहे हैं। भूगर्भ जल सूखने से कुएं-हैंडपंप जवाब दे रहे हैं। गेहूं की फसल चौपट होने से किसानों के चेहरों पर मायूसी साफ झलक रही है। सरकारी योजनाएं केवल सपा की चुनावी तैयारी का तमाशा साबित हो रही हैँ, इसकी तस्दीक के लिए किसी सुदूर ग्रामीण इलाके में जाने की जरूरत नहीं है, बल्कि झांसी जिला मुख्यालय से सटे गांवों में ही यह नजारा देखने को मिल रहा है।
यह बात चंद्रनगर के किसान राजाराम ने कही। वह 15 फुट गहरे गड्ढे में खड़े होकर पत्थर तोड़ रहे थे। उन्होंने बताया कि करीब साठ-सत्तर फुट खुदाई और होनी है। हाथ में पैसे तो हैं नहीं, ऐसे में पूरा परिवार कुआं खोदने में जुटा है। राजाराम नीचे कुएं के लिए पत्थर तोड़ रहे थे। जबकि, उनका परिवार नीचे के पत्थर ऊपर खींच रहा था।
बुंदेलखंड में गेहूं की फसल चौपट होने के साथ गर्मी की शुरूआत में ही अकाल अब विकराल रूप लेता नजर आ रहा है। पानी, अनाज के लिए किसान और मवेशी तड़प रहे हैं। भूगर्भ जल सूखने से कुएं-हैंडपंप जवाब दे रहे हैं। गेहूं की फसल चौपट होने से किसानों के चेहरों पर मायूसी साफ झलक रही है। सरकारी योजनाएं केवल सपा की चुनावी तैयारी का तमाशा साबित हो रही हैँ, इसकी तस्दीक के लिए किसी सुदूर ग्रामीण इलाके में जाने की जरूरत नहीं है, बल्कि झांसी जिला मुख्यालय से सटे गांवों में ही यह नजारा देखने को मिल रहा है।
नहीं है तो सिर्फ पानी और खाने का इंतजाम
दो-तीन बाल्टी खींचने के बाद आधा घंटे इंतजार
- फोटो : amar ujala bureau
बबीना विकासखंड के ग्राम खजराहा खुर्द जिला मुख्यालय से महज 29 किलोमीटर की दूरी पर है, जबकि झांसी-ललितपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से गांव की दूरी सिर्फ नौ किमी है। शहर से नजदीकी का गांव में असर भी है। मोबाइल और इंटरनेट नेटवर्क यहां धड़ल्ले से काम करता है। गलियां एपेक्स की बनी हुई एकदम सपाट हैं। गांव के कुछ हिस्से में 12-14 घंटे बिजली भी मिल जाती है।
प्राथमिक पाठशाला गांव में है और स्वास्थ्य केंद्र की भी सुविधा है। नहीं है तो सिर्फ पानी और खाने का इंतजाम। कुएं पिछली गर्मी में ही सूख गए थे। बारिश न होने से दुबारा नहीं भर पाए। कुओं में झांकने पर तली की सूखी मिट्टी नजर आती है। वैसे गांव में 59 हैंडपंप हैं, लेकिन इनमें से पानी सिर्फ आठ में ही कड़ी मशक्कत से निकलता है। दो-तीन बाल्टी खींचने के बाद कम से कम आधा घंटे इंतजार करना पड़ जाता है। इन्हीं हैंडपंपों के भरोसे है गांव की लगभग 10 हजार की मानव और दो हजार की पशु आबादी।
घर तक पानी लाने के लिए चार-पांच किलोमीटर चलना यहां आम बात हो चुकी है। पानी की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों के सामने गेहूं की कटाई के बाद अनाज का संकट भी पैदा हो गया है। सूखे के चलते पहले ही यहां केवल पच्चीस फीसदी खेतों में रबी की फसल बोई गई थी। कुछ किसानों ने ही विषम परिस्थितियों में यह हिम्मत जुटाई थी। लेकिन, नतीजा नाउम्मीदी लेकर आया। किसान वसंत ने बताया कि उसके पास पांच एकड़ जमीन है, लेकिन गेहूं की फसल सवा बीघा में ही बोई थी, ताकि घर के लिए अनाज का इंतजाम हो जाए।
50 किलो गेहूं बोया था और मिला सिर्फ तीन क्विंटल, वह भी पतले दाने का। किसान ने बताया कि उत्पादन की अपेक्षा लागत कहीं अधिक आई है और मेहनत का तो कोई मोल ही नहीं है। यह स्थिति केवल खजराहा खुर्द की ही नहीं, बल्कि आसपास के खजराहा बुजुर्ग, किल्चवारा, कोटि चमरऊआ, बैदोरा, सरवां, मुरारी आदि समेत दर्जनों गांवों की भी है। ग्रामीणों के पास पेट की आग और गले की प्यास बुझाने का कोई इंतजाम नहीं है। सूखे से निपटने को बनाई जा रहीं सरकारी योजनाएं धरातल पर सिफर साबित हो रही हैं।
प्राथमिक पाठशाला गांव में है और स्वास्थ्य केंद्र की भी सुविधा है। नहीं है तो सिर्फ पानी और खाने का इंतजाम। कुएं पिछली गर्मी में ही सूख गए थे। बारिश न होने से दुबारा नहीं भर पाए। कुओं में झांकने पर तली की सूखी मिट्टी नजर आती है। वैसे गांव में 59 हैंडपंप हैं, लेकिन इनमें से पानी सिर्फ आठ में ही कड़ी मशक्कत से निकलता है। दो-तीन बाल्टी खींचने के बाद कम से कम आधा घंटे इंतजार करना पड़ जाता है। इन्हीं हैंडपंपों के भरोसे है गांव की लगभग 10 हजार की मानव और दो हजार की पशु आबादी।
घर तक पानी लाने के लिए चार-पांच किलोमीटर चलना यहां आम बात हो चुकी है। पानी की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों के सामने गेहूं की कटाई के बाद अनाज का संकट भी पैदा हो गया है। सूखे के चलते पहले ही यहां केवल पच्चीस फीसदी खेतों में रबी की फसल बोई गई थी। कुछ किसानों ने ही विषम परिस्थितियों में यह हिम्मत जुटाई थी। लेकिन, नतीजा नाउम्मीदी लेकर आया। किसान वसंत ने बताया कि उसके पास पांच एकड़ जमीन है, लेकिन गेहूं की फसल सवा बीघा में ही बोई थी, ताकि घर के लिए अनाज का इंतजाम हो जाए।
50 किलो गेहूं बोया था और मिला सिर्फ तीन क्विंटल, वह भी पतले दाने का। किसान ने बताया कि उत्पादन की अपेक्षा लागत कहीं अधिक आई है और मेहनत का तो कोई मोल ही नहीं है। यह स्थिति केवल खजराहा खुर्द की ही नहीं, बल्कि आसपास के खजराहा बुजुर्ग, किल्चवारा, कोटि चमरऊआ, बैदोरा, सरवां, मुरारी आदि समेत दर्जनों गांवों की भी है। ग्रामीणों के पास पेट की आग और गले की प्यास बुझाने का कोई इंतजाम नहीं है। सूखे से निपटने को बनाई जा रहीं सरकारी योजनाएं धरातल पर सिफर साबित हो रही हैं।
खराब फसल का नहीं मिला मुआवजा
खराब फसल का नहीं मिला मुआवजा
- फोटो : amar ujala bureau
खजराहा बुजुर्ग के पूर्व प्रधान वीरेंद्र सिंह ने बताया कि गांव के दो सौ किसानों को अब तक पिछले वर्ष हुई अतिवृष्टि/ओलावृष्टि का मुआवजा नहीं मिला है। सूखे के मुआवजे की तो बात दूर है, जबकि इसके लिए ग्रामीण लगातार लेखपाल से संपर्क कर रहे हैं, परंतु हाथ कुछ नहीं आया है।
तीन माह से नहीं मिली मनरेगा मजदूरी
खजराहा खुर्द की प्रधान सीमा देवी ने बताया कि गांव में 365 लोगों के पास मनरेगा के जॉब कार्ड हैं, इनमें से सौ ने काम किया है। लेकिन, उन्हें तीन महीने से एक पाई भी नहीं मिली है। मजदूरी न मिलने से अब ग्रामीण मनरेगा से दूरी बनाने लगे हैं। इसके अलावा टैंकर से पानी की सप्लाई भी अब तक शुरू नहीं की गई है।
जिंदा रहने भरका पशुओं को मिल रहा पानी
खजराहा खुर्द के ग्रामीण रामकिशन राजपूत ने बताया कि गांव के अन्य जानवर तो भगवान भरोसे छुट्टा हैं, केवल भैंसें ही बंधी हैं। लेकिन, इनकी भी प्यास नहीं बुझा पा रहे हैं। जानवरों को केवल उतना ही पानी पिला पा रहे हैं, जितने में वह जिंदा रहें। फसल न होने से चारे का भी संकट है। आगे क्या होगा? पता नहीं।
शहर में भी नहीं मिल रही मजदूरी
खजराहा बुजुर्ग के किसान बलभद्र कहते हैं कि फसल न होने की वजह से गांव में सभी के हाथ खाली हैं। ज्यादातर लोग काम की तलाश में शहरों की ओर दौड़ रहे हैं, जिससे शहरों में भी मजदूरों की संख्या बढ़ गई है। जबकि, काम इतने हैं नहीं। ऐसे में अब मजदूरी का भी सहारा नहीं रहा है।
तीन माह से नहीं मिली मनरेगा मजदूरी
खजराहा खुर्द की प्रधान सीमा देवी ने बताया कि गांव में 365 लोगों के पास मनरेगा के जॉब कार्ड हैं, इनमें से सौ ने काम किया है। लेकिन, उन्हें तीन महीने से एक पाई भी नहीं मिली है। मजदूरी न मिलने से अब ग्रामीण मनरेगा से दूरी बनाने लगे हैं। इसके अलावा टैंकर से पानी की सप्लाई भी अब तक शुरू नहीं की गई है।
जिंदा रहने भरका पशुओं को मिल रहा पानी
खजराहा खुर्द के ग्रामीण रामकिशन राजपूत ने बताया कि गांव के अन्य जानवर तो भगवान भरोसे छुट्टा हैं, केवल भैंसें ही बंधी हैं। लेकिन, इनकी भी प्यास नहीं बुझा पा रहे हैं। जानवरों को केवल उतना ही पानी पिला पा रहे हैं, जितने में वह जिंदा रहें। फसल न होने से चारे का भी संकट है। आगे क्या होगा? पता नहीं।
शहर में भी नहीं मिल रही मजदूरी
खजराहा बुजुर्ग के किसान बलभद्र कहते हैं कि फसल न होने की वजह से गांव में सभी के हाथ खाली हैं। ज्यादातर लोग काम की तलाश में शहरों की ओर दौड़ रहे हैं, जिससे शहरों में भी मजदूरों की संख्या बढ़ गई है। जबकि, काम इतने हैं नहीं। ऐसे में अब मजदूरी का भी सहारा नहीं रहा है।