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UNESCO: 'कोर्ट की तरह केस लड़ा, मजबूती से तर्क रखा'; ऐसे वर्ल्ड हेरिटेज बना 'मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स'

Sat, 12 Jul 2025 06:23 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Sat, 12 Jul 2025 06:23 PM IST
सार

World Heritage Maratha Military Landscapes: भारत के इस नामांकन को शुरू में आगे के लिए टालने की सिफारिश की गई थी। लेकिन इसके बाद भारत की टीम ने विस्तार से अपना पक्ष रखा। यूनेस्को में भारत के स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी. शर्मा ने बताया कि यह लगभग कोर्ट केस जैसा था, जहां भारत ने मजबूती से अपने तर्क रखे - और जीत हासिल की।

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Wasn't easy to get Maratha Landscapes inscribed, so victory sweeter: India's envoy to UNESCO
वर्ल्ड हेरिटेज बना 'मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स' - फोटो : ANI

विस्तार

भारत ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। पेरिस में आयोजित यूनेस्को की 47वीं विश्व धरोहर समिति की बैठक में भारत के 'मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स' को विश्व धरोहर साइट्स की सूची में शामिल किया गया है। यह फैसला 12 जुलाई को लिया गया और इसे भारत के लिए और खास तौर पर दुनिया भर के मराठी समुदाय के लिए गौरव का क्षण बताया गया।
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क्या है 'मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स'?
यह भारत का एक सीरियल नॉमिनेशन था, जिसमें कुल12 किले शामिल हैं। ये किले 17वीं से 19वीं सदी के बीच बनाए गए थे और मराठा साम्राज्य की सैनिक रणनीति और किलाबंदी की अनूठी शैली को दर्शाते हैं। 'मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स' में शामिल किलों में महाराष्ट्र के 11 किले साल्हेर, शिवनेरी, लोहगढ़, खांदेरी, रायगढ़, राजगढ़, प्रतापगढ़, सुवर्णदुर्ग, पन्हाला, विजयदुर्ग, सिंधुदुर्ग शामिल हैं। वहीं तमिलनाडु का एक किला- जिन्जी भी शामिल था।
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आसान नहीं था भारत का यह सफर
भारत के यूनेस्को में स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी. शर्मा ने बताया कि यह काम आसान नहीं था। भारत के इस नामांकन को शुरू में आईसीओएमओएस (यूनेस्को की सलाहकार संस्था) की ओर से आस्थगन अनुशंसा मिला था, यानी इसे आगे के लिए टालने की सिफारिश की गई थी। लेकिन भारतीय टीम ने हार नहीं मानी। उन्होंने तकनीकी तौर पर सलाहकार संस्था की गलतियां उजागर कीं और 20 देशों के प्रतिनिधियों के साथ वीडियो कॉल में विस्तार से भारत का पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि यह लगभग कोर्ट केस जैसा था, जहां भारत ने मजबूती से अपने तर्क रखे - और जीत हासिल की।

मजबूत तैयारी और टीमवर्क
विशाल शर्मा ने कहा कि यह सफलता एक जीवन भर का नामांकन है। इस नामांकन की फाइल 1000-1500 पन्नों की थी, जो किसी पीएचडी थीसिस से कम नहीं है। इसमें महाराष्ट्र सरकार, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) ने मिलकर काम किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को61 बिंदुओं का एक एक्शन प्लान दिया था, जिसमें गांवों में स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता से लेकर कॉफी-टेबल बुक बनाने तक के सुझाव शामिल थे।

कॉफी-टेबल बुक और जागरूकता अभियान
महाराष्ट्र सरकार ने 'मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स' नाम की एक शानदार कॉफी-टेबल बुक तैयार की और कई देशों के प्रतिनिधियों को भेजी गई। इसमें मराठा साम्राज्य की किलों की भव्यता और उनके पीछे की रणनीति को विस्तार से दर्शाया गया। इसके साथ ही छत्रपति शिवाजी महाराज की राजमुद्रा (राजसी मुहर) को भी प्रचारित किया गया, ताकि मराठा शासन के दर्शन - जनकल्याण और राज्य का उत्थान- को अंतरराष्ट्रीय मंच पर समझाया जा सके।


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क्यों सिर्फ 12 किले?
कुछ देशों के प्रतिनिधियों ने यह सवाल भी उठाया कि महाराष्ट्र में 390 से अधिक किले हैं, फिर सिर्फ 12 ही क्यों चुने गए? इसका जवाब भारतीय टीम ने यह दिया कि मराठा शासन में किलों की श्रेणीबद्ध व्यवस्था थी - प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक किले। यह 12 किले वही हैं जो रणनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से सबसे अहम थे।

महाराष्ट्र को वैश्विक मंच पर पहचान
विशाल शर्मा ने कहा कि पश्चिम और दक्षिण भारत के किलों को लेकर वैश्विक स्तर पर जागरूकता कम है, जबकि राजस्थान के किले ज्यादा प्रसिद्ध हैं। इसलिए इस नामांकन के जरिए भारत ने महाराष्ट्र के पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रचारित किया। नामांकन के सफल होने के बाद विशाल वी. शर्मा ने कहा, 'यह सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि दुनियाभर के मराठी समुदाय के लिए भी ऐतिहासिक दिन है। मराठा विरासत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा सम्मान मिलना गर्व की बात है।' उन्होंने आगे कहा, 'जब किसी देश की सांस्कृतिक संपत्ति को वैश्विक मान्यता मिलती है, तो सिर्फ वही देश नहीं बल्कि पूरी दुनिया सांस्कृतिक एकता और विविधता का जश्न मनाती है।'
 
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