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तकनीकी बमबारी के बीच रंगमंच को बचाने का सही वक्त– वामन केन्द्रे

Tue, 27 Feb 2018 06:23 PM IST
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली 
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली  Updated Tue, 27 Feb 2018 06:23 PM IST
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Waman Kendre Said, Right Time to Save Theater
Waman Kendre

रंगकर्म संस्कृति का वो अहम हिस्सा है जो किसी न किसी रूप में आम आदमी से जुड़ता है - दिल्ली समेत देश के 17 शहरों में आयोजित हो रहे थिएटर ओलम्पिक की मूल आत्मा यही है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक और थिएटर ओलंपिक को पहली बार अपने देश में करवाने वाले मशहूर रंगकर्मी वामन केन्द्रे इसे एक ऐसी ही उपलब्धि मानते हैं। उनका कहना है कि थिएटर को मौजूदा वक्त में आम लोगों से जोड़ने, उसे एक नई ताकत देने और बदलती तकनीक के साथ तालमेल बिठाने में यह आयोजन बेहद मददगार साबित होगा। वामन केन्द्रे ने ‘अमर उजाला’ से थिएटर के तमाम पहलुओं के साथ मौजूदा चुनौतियों पर विस्तार से बात की। 

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क्या थिएटर ओलंपिक से भारतीय रंगमंच को नया आयाम मिलेगा?

अभी तक नाटक, भारतीय रंगमंच या अपनी संस्कृति के बारे में हम आपस में ही एक दूसरे से बात करते रहे हैं कि हमारी संस्कृति सबसे बेहतरीन है, हमारा रंगमंच विविधता से भरा है या दुनिया में सबसे ज्यादा कला रूप हमारे देश में हैं, लेकिन इसे पूरी दुनिया तक फैलाने और इस सच्चाई को बताने की इतने बड़े पैमाने पर पहली बार कोशिश हो रही है। ब्रेख्त, शेक्सपियर, गोर्की, चेखव जैसे नाटककारों को जिस तरह पूरी दुनिया में फैलाया गया, जिस तरह इनके नाटक पूरी दुनिया में खेले जाते हैं, ऐसा हमारी समृद्ध नाट्य परंपरा के साथ क्यों नहीं हो सकता। चाहे वो भरत मुनि हो अभिनव गुप्त हों, रविन्द्र नाथ टैगोर, हरिश्चंद्र से लेकर प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर या गिरीश कर्नाड हों या फिर दूर दराज़ के इलाकों के क्षेत्रीय रंगकर्म हों, उसे दुनिया भर में फैलाने की ज़रूरत हमें लगातार महसूस होती रही। थिएटर ओलंपिक से हमें बेशक ऐसा करने में कामयाबी मिलेगी।
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भारत रंग महोत्सव और थिएटर ओलंपिक में मूल फर्क क्या है?

हमने 19 सालों तक भारंगम किया, जिसका हमें गर्व है और जिससे ये आधार बना कि हम इतने बड़े पैमाने पर ये आयोजन कर पा रहे हैं। भारंगम में अंतर्राष्ट्रीय फलक नहीं था जबकि थिएटर ओलंपिक के ज़रिये हम अपने रंगकर्म को दुनिया भर में फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। हमें भरोसा है कि आने वाले सालों में भारंगम का स्वरूप बदलेगा और इसे भी एक अंतर्राष्ट्रीय फलक मिलेगा।
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ये सवाल बरसों से रंगकर्मियों को परेशान करता आया है कि फिल्म और टेलीविजन ने नाटकों या रंगकर्म के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.. क्या बदलती तकनीक के साथ इसकी विधा और सोच में कुछ बदलाव आ रहा है?

ये सच है कि आज सिनेमा, टीवी के साथ साथ इंटरनेट, मोबाइल, यू ट्यूब सबकुछ है, हर हाथ में ये तकनीकी क्रांति देखी जा सकती है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इस समय एक सांस्कृतिक अवकाश जैसा है। यानी एक समय जो रंगमंच मुख्य धारा के मनोरंजन का अहम माध्यम था, वो हाशिये पर गया तो है। ये एक बड़ी चुनौती है। भारंगम ने कुछ हद तक इसे फिर से लोकप्रिय बनाने की कोशिश की, कुछ कामयाबी भी मिली, अब ऐसे आयोजनों से कुछ फर्क तो ज़रूर पड़ेगा क्योंकि जीवंत माध्यम का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। हां, अब हम तकनीक के साथ खुद को जोड़कर एक तालमेल बिठाने की कोशिश ज़रूर कर रहे हैं इसलिए तमाम मुख्य कार्यक्रमों को हम वेबकास्ट कर रहे हैं ताकि देश के तमाम हिस्सों में लोग देख सकें कि थिएटर ओलंपिक में क्या हो रहा है। 

इन चुनौतियों के बीच रंगमंच का भविष्य क्या लगता है?

देखिए, ये बात तो सच है कि नेट, यू ट्यूब, टीवी घर घर में है, हर हाथ में है, आपकी ज़िंदगी को झकझोर रहा है, लेकिन केवल ये मानकर तो हम हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकते। क्योंकि कितनी भी कोशिश की जाए, हर बार नाटक वापस लौटता है। इतिहास में ऐसे कई मौके आए जब नाटक को किनारे करने की कोशिश की गई लेकिन नाटक वापस अपनी जगह बना लेता है। आज ये सही समय है कि इतनी बड़ी तकनीकी बमबारी के बाद आज आदमी उससे उकताने लगा है। लोग कितना टीवी या यू ट्यूब देख लेंगे। नाटक में जो बात होती है, मनोरंजन की जो जीवंतता होती है, वो कोई दूसरा माध्यम दे ही नहीं सकता। यही तो थिएटर ओलंपिक का उद्देश्य है कि भले ही 300 लोग नाटक देखें लेकिन इसके अनुभव को जीवनभर अपने साथ रखेंगे।

क्या संस्कृति मंत्रालय और सरकार रंगमंच को लेकर सचमुच गंभीर है और क्या वाकई इसे नौकरशाही के मकड़जाल से बाहर निकालना चाहती है?

अगर ऐसा न होता, तो इतना बड़ा आयोजन नहीं हो रहा होता। एनएसडी के विस्तार के लिए 180 करोड़ की सरकार ने मंजूरी दी। हम जहां जहां भी गए, हमें पूरा सहयोग मिला। हमें ऐसा कभी नहीं लगा कि सरकारी स्तर पर कहीं कोई लापरवाही है या इच्छाशक्ति की कमी है। दरअसल उन्हें भी एक सही विज़न की तलाश होती है और जब ऐसा कुछ दिखता है उनका पूरा सहयोग मिलता है।

अक्सर ऐसा लगता है कि नाटकों में कंटेंट का अभाव है। वही पुराने नाटक बार बार खेले जाते हैं। नए नाटक नहीं लिखे जा रहे। क्या इस दिशा में कोई कोशिश हो रही है?


देखिए, अच्छे नाटकों की ज़रूरत तो हर वक्त रहती है। हिन्दी में ये संकट ज़रूर है लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं में खूब नाटक लिखे जा रहे हैं चाहे वो मराठी हो, कन्नड़ हो, तेलुगु हो, उड़िया हो या बांग्ला – हां पहले जिस तरह इन्हें हिन्दी में भी रूपांतरित किया जाता था, वो अब बहुत कम होता है। हमारी कोशिश है कि नए नाटक लिखे जाएं, आज के संदर्भ में सामयिक और क्लासिक नाटक भी लिखे जाएं। हर निर्देशक को हमेशा अच्छी स्क्रिट की तलाश रहती है।  

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