केरल: 'जस्टिस वर्मा के घर मिली नकदी काला धन तो नहीं?', जज के घर से कैश मिलने पर उपराष्ट्रपति धनखड़ चिंतित
Kerala: उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक जज के आवास से भारी नकदी मिलने की घटना को न्यायपालिका के लिए ‘आइड्स ऑफ मार्च’ जैसी चेतावनी बताया और इसकी आपराधिक जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि इतने गंभीर मामले में अब तक प्राथमिकी दर्ज न होना चिंता का विषय है।
विस्तार
जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के मामले में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कुछ अहम सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि इतनी बड़ी रकम का स्रोत क्या था और यह एक जज के आवास पर कैसे पहुंची। उन्होंने कहा कि इस मामले में एफआईआर दर्ज होना जरूरी है और उम्मीद है कि जल्द ऐसा किया जाएगा। धनखड़ कोच्चि स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में छात्रों और संकाय सदस्यों को संबोधित कर रहे थे।
धनखड़ ने कहा, सांविधानिक प्रावधानों के तहत किसी जज के विरुद्ध कार्रवाई करना एक विकल्प हो सकता है लेकिन यह हल नहीं है। दुनिया हमें एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में देखती है, जहां कानून का शासन और कानून के समक्ष समानता होनी चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि हर अपराध की जांच होनी चाहिए। यदि धनराशि इतनी अधिक है, तो यह जानना जरूरी है कि यह काला धन तो नहीं और इसका स्रोत क्या है? आखिर यह धन किसका है और एक जज के सरकारी आवास में कैसे पहुंचा?
न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास अडिग, इस घटना से नींव डगमगाई
धनखड़ ने कहा, इस पूरे घटनाक्रम में कई दंडात्मक प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है। हमें इस मुद्दे की जड़ तक जाना होगा। हमारी न्यायपालिका, जिस पर लोगों का विश्वास अडिग है, आज इस घटना के कारण उसकी नींव डगमगा गई है। यह गढ़ हिल गया है।
14-15 मार्च की रात को बताया दुर्भाग्यपूर्ण समय
शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक जूलियस सीजर का उल्लेख करते हुए, धनखड़ ने कहा, इड्स ऑफ मार्च के बारे में सुना है, तो आप जानते होंगे कि कैसे एक ज्योतिषी ने सीजर को चेताया था। जब सीजर ने कहा कि इड्स ऑफ मार्च आ गया है, तो ज्योतिषी ने उत्तर दिया-हां, लेकिन गया नहीं और उसी दिन सीजर की हत्या हो गई। इसी तरह, हमारी न्यायपालिका के लिए 14-15 मार्च की रात एक दुर्भाग्यपूर्ण समय रहा।
उपराष्ट्रपति ने कहा, हाईकोर्ट जज के सरकारी आवास से भारी मात्रा में नकदी मिली। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की है। ऐसी स्थिति में, सबसे पहले इसे एक आपराधिक कृत्य मानकर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए थी। दोषियों की पहचान कर उन्हें न्याय के कटघरे में लाना चाहिए था लेकिन अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के 1990 के दशक के एक निर्णय के कारण विवश है।
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जस्टिस वर्मा ने सभी आरोपों से इनकार किया है और इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक समिति को अपना जवाब भी सौंपा है। हालांकि, इसके बावजूद उनके न्यायिक कार्यों पर रोक लगाई गई और बाद में उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने वहां के चीफ को निर्देश दिया है कि फिलहाल उन्हें कोई न्यायिक काम न सौंपा जाए। इस मामले की जांच कर रही समिति ने अब तक 50 से अधिक लोगों के बयान दर्ज किए हैं। इनमें दिल्ली पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा और दिल्ली दमकल सेवा के प्रमुख अतुल गर्ग भी शामिल हैं, जो घटना के समय सबसे पहले मौके पर पहुंचे थे।
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