{"_id":"62c95459f8f07405b25e9554","slug":"vice-president-shri-m-venkaiah-naidu-inaugurating-the-platinum-jubilee-celebrations-of-mount-carmel-college-in-bengaluru","type":"story","status":"publish","title_hn":"M. Venkaiah Naidu: उपराष्ट्रपति नायडू बोले- धर्मनिरपेक्षता हमारे खून में है, भारत में सभी वर्गों को मिलते हैं समान अवसर","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
M. Venkaiah Naidu: उपराष्ट्रपति नायडू बोले- धर्मनिरपेक्षता हमारे खून में है, भारत में सभी वर्गों को मिलते हैं समान अवसर
Sat, 09 Jul 2022 03:55 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 09 Jul 2022 03:55 PM IST
सार
उपराष्ट्रपति ने कहा, भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु देश है, इसे कोई भी मान सकता है। लोग धर्मनिरपेक्षता की चर्चा करते हैं, धर्मनिरपेक्षता सुरक्षित है इस सरकार या उस सरकार, इस पार्टी या उस पार्टी के कारण नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता खून में है।
विज्ञापन
उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू आज बेंगलुरु में माउंट कार्मेल कॉलेज के प्लेटिनम जुबली समारोह का उद्घाटन करते हुए
- फोटो : Twitter/Vice President of India
विस्तार
भारत को दुनिया का सबसे सहिष्णु देश बताते हुए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने शनिवार को कहा कि धर्मनिरपेक्षता देश में किसी सरकार या पार्टी की वजह से सुरक्षित नहीं बल्कि यह लोगों के खून में है और यहां रहने वाले हर व्यक्ति की नसों में है।
'भारत की प्रगति को नहीं पचा पा रहे कुछ लोग'
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि बुनियादी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। उपराष्ट्रपति ने कहा, "हमारा एक महान देश है, सौभाग्य से भारत फिर से आगे बढ़ रहा है, दुनिया अब एक बार फिर भारत को पहचान रही है और सम्मान कर रही है। कोई भी हमें अनदेखा नहीं कर सकता है। हालांकि कुछ लोग यहां-वहां छोटी-छोटी बातें लिख सकते हैं, इसके बारे में चिंता न करें। कुछ लोग भारत की प्रगति को पचा नहीं पा रहे हैं, वे अपच से पीड़ित हैं। हम इसमें मदद नहीं कर सकते।"
पश्चिमी मीडिया पर लगाया नकारात्मक छवि गढ़ने का आरोप
यहां माउंट कार्मेल इंस्टीट्यूशंस के प्लेटिनम जुबली समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने पश्चिमी मीडिया पर भारत के बारे में बहुत सारी नकारात्मक कहानियां गढ़ने का आरोप लगाया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि पश्चिमी मीडिया ने देश और उसके लोगों के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में की जा रही उपलब्धियों को भुला दिया गया।
विज्ञापन
'भारत ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया'
उपराष्ट्रपति नायडू ने यह भी स्वीकार किया कि देश के सामने सामाजिक असमानता, गरीबी, लैंगिग समानता जैसी कुछ चुनौतियां हैं जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है। उपराष्ट्रपति ने कहा, भारत औपनिवेशिक शासन में भरोसा नहीं करता है और खुद को अन्य देशों पर भी थोपना नहीं चाहता है और इसने अपने इतिहास में कभी किसी देश पर हमला नहीं किया है।
देश के शीर्ष पद पर पहुंच सकता है कोई भी व्यक्ति- उपराष्ट्रपति
उन्होंने आगे कहा, भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु देश है, इसे कोई भी मान सकता है। लोग धर्मनिरपेक्षता की चर्चा करते हैं, धर्मनिरपेक्षता सुरक्षित है इस सरकार या उस सरकार, इस पार्टी या उस पार्टी के कारण नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता खून में है। इसे सभी को समझना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में कोई भी देश के शीर्ष पदों पर पहुंच सकता है।
उन्होंने कहा, मुझे कोई अन्य देश दिखाओ जहां सभी वर्गों के लिए समान अवसर दिए जाते हैं। वे कुछ लोग हमें क्या सिखाने की कोशिश कर रहे हैं? देखें कि तथाकथित विकसित राष्ट्रों में आंतरिक रूप से क्या हो रहा है, मुझे किसी का नाम नहीं लेना चाहिए।"
शांति के लिए पहली शर्त अहिंसा
नायडू ने कहा कि हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, यह शांति प्रगति की पहली शर्त है। कार्यक्रम में कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, राजस्थान की पूर्व राज्यपाल मार्गरेट अल्वा भी मौजूद थीं। उपराष्ट्रपति ने अपनी भाषा, धर्म पर गर्व करने की सलाह दी।
"हम इधर-उधर देख रहे हैं कि कुछ लोगों में दूसरों को नीचा दिखाने और विकृत संतुष्टि प्राप्त करने की कमजोरी होती है, यह अच्छा नहीं है। हर धर्म अपने तरीके से महान है। हमें जो ध्यान देना है कि धर्म, पूजा का व्यक्तिगत तरीका है, हमें अपनी संस्कृति और विरासत पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जो जीवन जीने का तरीका है।"
नायडू ने कहा ककि उन्हें मातृभाषा के बारे में बात करने में खुशी होती है। उन्होंने कहा, "बुनियादी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, क्योंकि इसे समझना और संवाद करना आसान होगा।"
'मातृभाषा में हो प्राथमिक बुनियादी शिक्षा'
"मातृभाषा मां की तरह है। मुझे खुशी है कि हम फिर से जड़ों की ओर लौट आए हैं। प्राथमिक बुनियादी शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, इसके बाद आप भाई-बहन अन्य भाषा में जा सकते हैं, मुझे कोई समस्या नहीं है ... मातृभाषा आपकी आंखों की तरह है, अन्य भाषाएं चश्मे की तरह हैं, अगर आपके पास नजर है तो चश्मा काम करेगा।"
नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को महत्व देने पर खुशी जाहिर करते हुए नायडू ने आगे कहा कि वह अन्य भाषाओं के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने कहा, "जितनी भाषा हो सके सीखो, लेकिन पहले मातृभाषा सीखो। लोगों के मन में यह गलत धारणा है कि जब तक आपके पास अंग्रेजी की शिक्षा नहीं है, तब तक आप ऊपर नहीं जा सकते, यह सच नहीं है, अंग्रेजी सीखना एक अतिरिक्त ताकत है।"
उन्होंने बताया कि भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने गांव के स्कूल में पढ़ाई की और कॉन्वेंट शिक्षा प्राप्त नहीं की।
छात्रों से मातृभाषा को सीखने, उसका प्रचार करने और उसपर गर्व महसूस करने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा अन्य भाषाओं की उपेक्षा न करें।
महिलाओं की शिक्षा पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि 50 प्रतिशत आबादी महिलाएं हैं, उन्हें समान सम्मान, समान स्थान और अवसर दिया जाना चाहिए और उन्हें सशक्तिकरण प्रदान करना चाहिए।
विज्ञापन
'भारत की प्रगति को नहीं पचा पा रहे कुछ लोग'
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि बुनियादी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। उपराष्ट्रपति ने कहा, "हमारा एक महान देश है, सौभाग्य से भारत फिर से आगे बढ़ रहा है, दुनिया अब एक बार फिर भारत को पहचान रही है और सम्मान कर रही है। कोई भी हमें अनदेखा नहीं कर सकता है। हालांकि कुछ लोग यहां-वहां छोटी-छोटी बातें लिख सकते हैं, इसके बारे में चिंता न करें। कुछ लोग भारत की प्रगति को पचा नहीं पा रहे हैं, वे अपच से पीड़ित हैं। हम इसमें मदद नहीं कर सकते।"
विज्ञापन
पश्चिमी मीडिया पर लगाया नकारात्मक छवि गढ़ने का आरोप
यहां माउंट कार्मेल इंस्टीट्यूशंस के प्लेटिनम जुबली समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने पश्चिमी मीडिया पर भारत के बारे में बहुत सारी नकारात्मक कहानियां गढ़ने का आरोप लगाया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि पश्चिमी मीडिया ने देश और उसके लोगों के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में की जा रही उपलब्धियों को भुला दिया गया।
विज्ञापन
'भारत ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया'
उपराष्ट्रपति नायडू ने यह भी स्वीकार किया कि देश के सामने सामाजिक असमानता, गरीबी, लैंगिग समानता जैसी कुछ चुनौतियां हैं जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है। उपराष्ट्रपति ने कहा, भारत औपनिवेशिक शासन में भरोसा नहीं करता है और खुद को अन्य देशों पर भी थोपना नहीं चाहता है और इसने अपने इतिहास में कभी किसी देश पर हमला नहीं किया है।
देश के शीर्ष पद पर पहुंच सकता है कोई भी व्यक्ति- उपराष्ट्रपति
उन्होंने आगे कहा, भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु देश है, इसे कोई भी मान सकता है। लोग धर्मनिरपेक्षता की चर्चा करते हैं, धर्मनिरपेक्षता सुरक्षित है इस सरकार या उस सरकार, इस पार्टी या उस पार्टी के कारण नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता खून में है। इसे सभी को समझना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में कोई भी देश के शीर्ष पदों पर पहुंच सकता है।
उन्होंने कहा, मुझे कोई अन्य देश दिखाओ जहां सभी वर्गों के लिए समान अवसर दिए जाते हैं। वे कुछ लोग हमें क्या सिखाने की कोशिश कर रहे हैं? देखें कि तथाकथित विकसित राष्ट्रों में आंतरिक रूप से क्या हो रहा है, मुझे किसी का नाम नहीं लेना चाहिए।"
शांति के लिए पहली शर्त अहिंसा
नायडू ने कहा कि हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, यह शांति प्रगति की पहली शर्त है। कार्यक्रम में कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, राजस्थान की पूर्व राज्यपाल मार्गरेट अल्वा भी मौजूद थीं। उपराष्ट्रपति ने अपनी भाषा, धर्म पर गर्व करने की सलाह दी।
"हम इधर-उधर देख रहे हैं कि कुछ लोगों में दूसरों को नीचा दिखाने और विकृत संतुष्टि प्राप्त करने की कमजोरी होती है, यह अच्छा नहीं है। हर धर्म अपने तरीके से महान है। हमें जो ध्यान देना है कि धर्म, पूजा का व्यक्तिगत तरीका है, हमें अपनी संस्कृति और विरासत पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जो जीवन जीने का तरीका है।"
नायडू ने कहा ककि उन्हें मातृभाषा के बारे में बात करने में खुशी होती है। उन्होंने कहा, "बुनियादी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, क्योंकि इसे समझना और संवाद करना आसान होगा।"
'मातृभाषा में हो प्राथमिक बुनियादी शिक्षा'
"मातृभाषा मां की तरह है। मुझे खुशी है कि हम फिर से जड़ों की ओर लौट आए हैं। प्राथमिक बुनियादी शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, इसके बाद आप भाई-बहन अन्य भाषा में जा सकते हैं, मुझे कोई समस्या नहीं है ... मातृभाषा आपकी आंखों की तरह है, अन्य भाषाएं चश्मे की तरह हैं, अगर आपके पास नजर है तो चश्मा काम करेगा।"
नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को महत्व देने पर खुशी जाहिर करते हुए नायडू ने आगे कहा कि वह अन्य भाषाओं के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने कहा, "जितनी भाषा हो सके सीखो, लेकिन पहले मातृभाषा सीखो। लोगों के मन में यह गलत धारणा है कि जब तक आपके पास अंग्रेजी की शिक्षा नहीं है, तब तक आप ऊपर नहीं जा सकते, यह सच नहीं है, अंग्रेजी सीखना एक अतिरिक्त ताकत है।"
उन्होंने बताया कि भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने गांव के स्कूल में पढ़ाई की और कॉन्वेंट शिक्षा प्राप्त नहीं की।
छात्रों से मातृभाषा को सीखने, उसका प्रचार करने और उसपर गर्व महसूस करने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा अन्य भाषाओं की उपेक्षा न करें।
महिलाओं की शिक्षा पर जोर देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि 50 प्रतिशत आबादी महिलाएं हैं, उन्हें समान सम्मान, समान स्थान और अवसर दिया जाना चाहिए और उन्हें सशक्तिकरण प्रदान करना चाहिए।