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दिल्ली के ट्रैफिक जाम में फंसे वाहन चालकों को लग रही 50 करोड़ रुपये की चपत

Mon, 24 Dec 2018 07:53 PM IST
आसिम खान जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Mon, 24 Dec 2018 07:53 PM IST
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Vehicle drivers trapped in traffic jams of Delhi have a loss of Rs 50 crores in year

दिल्ली का ट्रैफिक जाम वाहन चालकों पर दोहरी मार कर रहा है। एक तरफ इसकी वजह से बढ़ने वाला प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य पर विपरित असर डाल रहा है तो वहीं दूसरी ओर जाम में फंसने के कारण 12-13 हजार लीटर पेट्रोल व 4-5 हजार लीटर डीजल रोजाना बर्बाद हो जाता है। अगर प्रतिदिन इस नुकसान को जोड़े तो वह 15 से 17 लाख रुपये तक पहुंच रहा है। सालभर में यह नुकसान 50 करोड़ रुपये से ज्यादा बैठता है। जाम में फंसने के कारण वाहन चालकों के समय की बर्बादी होती है, वह अलग है। दिल्ली में औसतन 100-125 बसें रोजाना खराब होती हैं। साथ ही 15-20 भारी वाहन, जैसे ट्रक-ट्राले आदि पलट जाते हैं या उनका इंजन जवाब दे जाता है। करीब डेढ़ सौ छोटे वाहन, जिनमें ज्यादातर डिलीवरी वैन शामिल होती हैं, प्रतिदिन खराब हो रहे हैं। 

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अमूमन यह स्थिति रोजाना ही रहती है। इंटरनेशनल रोड फेडरेशन (आईआरएफ) के चेयरमैन केके कपिला बताते हैं कि राष्ट्रीय राजधानी में भारी वाहनों के खराब होने का खामियाजा वाहन चालकों को रोजाना उठाना पड़ता है। बात सही है कि अगर 24 घंटे के दौरान इतने बड़े पैमाने पर ब्रेक डाउन होता है तो उससे जाम लगता है। जाम में फंसे वाहनों की रफ्तार बिल्कुल धीमी होती है। बडे ट्रैफिक इंटरसेक्शन जैसे आईटीओ, पंजाबी बाग, कश्मीरी गेट, पीरागढ़ी और एनएच-8 पर स्थित अनेक चौराहे हैं, जहां वाहनों की लंबी कतार लगी रहती है। इसके चलते करीब 15 हजार लीटर ईंधन व्यर्थ चला जाता है। यदि वाहन चालकों को समय पर जाम या रूट डायवर्ट करने की सूचना मिल जाए और खराब हुए वाहनों को आधे घंटे में ही वहां से हटा लिया जाए तो रोड जाम व गाड़ियों की लंबी कतार जैसी दिक्कतों से बचा जा सकता है।
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जाम में कितने वाहन फंसे और कितना ईंधन व्यर्थ गया, ऐसे समझें
 
पार्किंग एरिया के हिसाब से वाहनों की संख्या का अंदाजा लगाया जाता है।मान लीजिये, किसी तीन लेन वाली सड़क पर ब्रेकडाउन हुआ है। इससे एक-दो लेन बाधित हो गई हैं। ऐसे में पहली 15 मिनट में 200 मीटर तक 18-20 भारी वाहन और लगभग 118 कार या अन्य छोटे वाहन खड़े हो जाते हैं। इसी तरह 30 मिनट में 38-45 भारी वाहन और लगभग 250 कार जाम की लाइन में लग जाती हैं। अगर एक किलोमीटर लंबा जाम है तो 110 से अधिक भारी वाहन और करीब 630 छोटी गाडियां जाम में फंसती हैं। इस दौरान वाहन का इंजन चालू रहता है। वाहन 10 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आगे सरकता है तो 50 फीसदी अतिरिक्त ईंधन की खपत होती है। जाम में फंसने के कारण अतिरिक्त पैट्रोल-डीजल खर्च हुआ, लेकिन दूरी कुछ भी तय नहीं हो सकी। जो वाहन 15 किलोमीटर प्रति लीटर की औसत निकालता है, जाम में फंसे होने के कारण यह औसत 8 से 10 केएमपीएच प्रति लीटर रह जाती है। यानी एक वाहन जो कि 50-60 केएमपीएच की रफ्तार से एक लीटर में 15 किलोमीटर की औसत निकालता है , जाम में यह औसत घटकर आधी रह जाती है। 

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वाहन रेंगते हुए चलता है तो ईंधन ज्यादा खर्च होता है 

Vehicle drivers trapped in traffic jams of Delhi have a loss of Rs 50 crores in year

कोई भी वाहन उस वक्त बेहतर माइलेज देता है जब इंजन की रिवोल्यूशन प्रति मिनट (आरपीएम) और गेयर बॉक्स की आरपीएम बराबर होती है। अमूमन यह स्थिति उस वक्त होती है, जब गाड़ी पांचवें गीयर में चलती है। जाम में वाहन पहले या दूसरे गीयर में चलता है और लगातार क्लच दबता है तो माइलेज भी करीब आधी रह जाती है। 

डीटीसी की लो-फ्लोर बसें बनती हैं जाम की बड़ी वजह

पीकऑवर में यदि डीटीसी की लो फ्लोर बस खराब होती है तो वाहन चालकों को दो-तीन घंटे तक दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। रूट डायवर्ट के चलते उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जाम में खड़े रहते हैं या फिर वाहन रेंगते हुए चलते हैं। डीटीसी की सामान्य बसों को तो किसी तरह सड़क से हटा दिया जाता है, लेकिन लो-फ्लोर बस को हटाने के लिए ट्रैफिक पुलिस को खूब पसीना बहाना पड़ता है। इन बसों को हटाने के लिए ट्रैफिक पुलिस की रिक्वरी वैन भी काम नहीं आती। डीटीसी की विशेष रिक्वरी वैन ही इन बसों को सड़क से हटाती है। कई बार रिक्वरी वैन या मेकेनिक को मौके पर पहुंचने में कम से कम एक-दो घंटे लग जाते हैं।

पहले यह नियम था कि जिस डिपो की बस खराब हुई है, उसे ठीक करने के लिए वहीं से मेकेनिक आएगा। ऐसे में तीन-चार घंटे लगना लाजमी था, अब जगह-जगह पर कुछ वैन खड़ी की गई हैं। वहां से मेकेनिक आ जाता है। सूत्रों का कहना है कि ऐसी वैन की संख्या बहुत कम है। अधिकांश मामलों में मेकेनिक संबंधित बस डिपो से ही आता है। वैन पर अगर कोई मेकेनिक छुट्टी चला गया तो दूसरे इलाके से मेकेनिक बुलाना पड़ता है। इसमें कई घंटे लगते हैं। 

ट्रक-ट्राला पलटता है तो सात-आठ घंटे तक ट्रैफिक प्रभावित

अगर कोई सामान से भरा ट्रक-ट्राला पलटता है या खराब होता है तो सात-आठ घंटे तक ट्रैफिक बाधित रहता है। ट्रैफिक पुलिस के पास खुद की क्रेन हैं, लेकिन वाहन मल्टी-एक्सल है तो उसे उठाने के लिए मेट्रो या राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से भारी क्रेन मांगी जाती है। यदि ट्राले में लदा सामान रोड पर बिखर गया है तो उसे हटाने के लिए मजदूर लाए जाते हैं। घटना रात में या अल सुबह हुई तो पीकऑवर में जाम लगना तय है। वजह, उस वक्त मजदूर नहीं मिलते। 

चलने के लिहाज से वाहन फ़िट नहीं होते, मगर चलते हैं

Vehicle drivers trapped in traffic jams of Delhi have a loss of Rs 50 crores in year

अधिकांश कमर्शियल वाहनों की फिटनेस जांच सही तरीके से नहीं होती। आधे वाहन तो इतने पुराने हो जाते हैं कि वे सड़क पर चलने के क़ाबिल ही नहीं होते। इसके बावजूद उन वाहनों में तय क्षमता से कई गुना ज्यादा सामान भर दिया जाता है। ट्रैफिक पुलिस के पास न तो ओवरलोड वाहनों के खिलाफ कार्रवाई करने की पावर है और न ही उनका फिटनेस सर्टिफिकेट जांचने की। यह जिम्मेदारी परिवहन विभाग की है। रात के समय जो वाहन पलटते हैं, उनमें तय क्षमता से कहीं ज्यादा लोड रहता है। दिल्ली के सभी प्रवेश मार्गों पर ऐसे वाहनों की जांच की जानी अनिवार्य है, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। वजह, परिवहन विभाग के पास स्टाफ की कमी होना है। ट्रैफिक पुलिस अपने स्तर पर केवल स्थिति में फिटनेस सर्टिफिकेट की जांच करती है, जब कोई वाहन किसी दूसरे उल्लंघन में पकड़ा जाता है। 

ये वजह भी हैं, जो किसी को दिखाई नहीं पड़ती

-रात के समय जूनियर चालक के हाथ में स्टेयरिंग थमाना 
-कंटेनर और ऑयल टैंकर का लोड स्विफ्ट (असंतुलन की दशा में) होना 
-तेज मोड या अचानक ब्रेक लेने से लोड आगे की तरफ सरकता है, नतीजा वाहन पलट जाता है 
-माल की पैकिंग सही नहीं है तो ब्रेक और टर्निंग प्वाइंट पर सामान तेजी से आगे सरकता है, इससे हादसा होता है 
-वाहन की फिटनेस न होना और ओवरलोडिंग भी ब्रेकडाउन की एक वजह 

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