UP Politics: निकाय चुनावों में घटे मुस्लिम जनप्रतिनिधि, नगर पालिका और नगर पंचायतों में कम चुने गए अध्यक्ष
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विस्तार
उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनावों में इस बार सभी पार्टियों ने मुसलमान प्रत्याशियों पर खूब दांव लगाया। लेकिन तमाम दांव लगाने के बाद भी जब परिणाम सामने आए, तो उत्तर प्रदेश में नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों में मुस्लिम जनप्रतिनिधियों की हिस्सेदारी में भारी कमी रही। निकाय चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि 2017 की तुलना में इस बार हुए चुनावों में नगरपालिका के अध्यक्ष पद पर तकरीबन आठ फीसदी मुस्लिम जनप्रतिनिधि कम चुने गए। वहीं नगर पंचायतों में पिछले चुनावों की तुलना में इस बार छह फीसदी मुस्लिम जनप्रतिनिधि कम पहुंचे। राजनीतिक पार्टियों के अपने आंकलन में बिगड़े इस सियासी समीकरण को लेकर अब सियासी मंथन चल रहा है। माना यही जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में मुस्लिम वोटों में जमकर बिखराव हुआ और जनप्रतिनिधि के तौर पर हिस्सेदारी कम हो गई।
उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनावों के परिणाम 2017 की तुलना में इस बार बहुत बदले हुए हैं। निकाय चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश में नगर पालिका, नगर पंचायत और नगर निगम की संख्या बढ़ाई गई, लेकिन मुस्लिम जनप्रतिनिधियों की संख्या उसकी तुलना में कम हो गई। 2017 में उत्तर प्रदेश में 16 नगर निगम हुआ करते थे। इस बार यह संख्या बढ़कर 17 हो गई। पिछले चुनाव में एक मुस्लिम मेयर प्रत्याशी चुनाव जीतकर मेयर बने थे। लेकिन इस बार मेयर के चुनावों में यह संख्या शून्य हो गई। इसी तरह इस बार 199 नगर पालिका के अध्यक्ष पदों पर महज 54 मुस्लिम उम्मीदवार ही चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने हैं। जबकि 2017 में नगर पालिका की संख्या 198 थी और 198 नगरपालिका में 68 मुस्लिम प्रत्याशी जीतकर चेयरमैन बने थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश की इस बार 544 नगर पंचायतों में 135 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने हैं। जबकि 2017 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में 438 नगर पंचायतें थीं और उसमें 133 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने थे।
निकाय चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक इस बार उत्तर प्रदेश में 106 नगर पंचायतें नई बनी थीं। जबकि एक नगर निगम और एक नगर पालिका नई बनाई गई थी। यूपी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नगर पंचायतें ही बढ़ाई गई थीं, लेकिन 2017 की तुलना में मुस्लिम जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाई गई नगर पंचायतों की तुलना में कम हो गई। चुनाव के आंकड़े तस्दीक करते हैं कि 2017 के नगर पंचायतों में तकरीबन 31 फीसदी मुस्लिम प्रत्याशी अध्यक्ष बनकर जनप्रतिनिधि के तौर पर चुने गए थे। लेकिन इस बार यह संख्या घटकर 25 फीसदी से भी कम हो गई है। निकाय चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि 2017 की तुलना में इस बार हुए चुनावों में नगरपालिका के अध्यक्ष पद पर तकरीबन आठ फीसदी मुस्लिम जनप्रतिनिधि बतौर पालिका अध्यक्ष कम चुने गए।
इस बार भाजपा ने भी 399 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिए थे। इसमें उत्तर प्रदेश की 199 नगर पालिकाओं में भाजपा के पांच अध्यक्ष चुने गए हैं। जबकि उत्तर प्रदेश की 554 नगर पंचायतों में भाजपा के 39 मुस्लिम प्रत्याशियों को जनता ने अध्यक्ष के तौर पर चुना है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें, तो उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में मुस्लिम वोटों को किसी भी एक पार्टी को वोट ना देने की वजह से उनको प्रतिनिधित्व करने का मौका कम मिला है। राजनीतिक विश्लेषक हरिओम तंवर बताते हैं कि निकाय चुनाव के आंकड़े और वोट प्रतिशत बताते हैं कि 2017 की तुलना में इस बार मुस्लिम प्रत्याशियों के वोटों में भारी बिखराव रहा। इसमें बहुजन समाज पार्टी ने मुसलमानों को भारी तादाद में टिकट देकर समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की। जबकि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी से लेकर आम आदमी पार्टी ने मुस्लिमों में सेंध लगाने की पूरी जोर आजमाइश भी की।
भाजपा ने पश्चिमी यूपी की 18 नगर पंचायत अध्यक्ष के लिए मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। इसी तरह समाजवादी पार्टी और बसपा ने भी अपने इलाकाई समीकरणों को देखते हुए मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। राजनीतिक विश्लेषक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि मुस्लिमों पर लगाए गए दांव और बिगड़े सियासी समीकरणों के चलते ही मुस्लिमों के वोटों में बिखराव हुआ। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनाव से पहले हुए परिसीमन से भी बहुत हद तक मुस्लिम राजनीति का समीकरण बिगड़ गया। परिसीमन में कई जगहों की एकमुश्त मुस्लिम बाहुल्य आबादी अलग-अलग दो जगह शिफ्ट हो गईं। इस वजह से भी सियासी समीकरण बहुत हद तक प्रभावित हुए।