फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   UP elections 2022: Amit Shah is doing many experiments in politics of Uttar Pradesh, under this strategy he started the campaign from Kairana

उत्तर प्रदेश चुनाव: अमित शाह का यह सियासी दांव भाजपा को दिला पाएगा कितना फायदा?

Thu, 03 Feb 2022 10:27 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 03 Feb 2022 10:27 PM IST
सार

सूत्र बताते हैं कि अमित शाह ने भाजपा के नेताओं को वक्तव्य देने में भी बेहद सावधानी बरतने की हिदायत दी है। चुनाव में हवा बदलने के लिए अमित शाह एक के बाद एक कई प्रयोग कर रहे हैं। कैराना से प्रचार अभियान की उन्होंने शुरुआत की। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद से अब तक वह 10 बार से अधिक उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुके हैं...

विज्ञापन
UP elections 2022: Amit Shah is doing many experiments in politics of Uttar Pradesh, under this strategy he started the campaign from Kairana
अमित शाह - फोटो : Agency

विस्तार

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सोच समझ कर चुनावी बिसात पर मोहरे चल रहे हैं। राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनाव में साये की तरह उनके साथ हैं। यहां तक की मांट सीट पर भी जयंत ने अखिलेश की सुन ली। दूसरे, किसान आंदोलन के बाद से पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीति की हवा भी थोड़ी बदली हुई है। इसे भाजपा के पक्ष में लाने के लिए पार्टी के केंद्रीय रणनीतिकार अमित शाह ने एक के बाद एक कई चालें चली हैं। अब जब चुनाव प्रचार के केवल पांच दिन बचे हैं तो शाह ने आखिरी मोहरें भी बिछा दी हैं। देखना है, उनकी रणनीति कितना कमाल कर पाती है।

विज्ञापन


पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार की पूरी रणनीति अमित शाह के ही हाथ में है। पार्टी के आईटी सेल के प्रभारी अमित मालवीय की भी क्षेत्र पर लगातार नजर बनी हुई है। सूत्र बताते हैं कि अमित शाह ने भाजपा के नेताओं को वक्तव्य देने में भी बेहद सावधानी बरतने की हिदायत दी है। चुनाव में हवा बदलने के लिए अमित शाह एक के बाद एक कई प्रयोग कर रहे हैं। कैराना से प्रचार अभियान की उन्होंने शुरुआत की। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद से अब तक वह 10 बार से अधिक उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। उनकी रणनीति को ध्यान में रखकर योगी आदित्यनाथ ने भी कैंप करना शुरू कर दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेताओं की एक बड़ी फौज प्रचार में लगी हुई है। भाजपा के राज्यसभा सांसद सुरेंद्र नागर, डा. सत्यपाल सिंह, डा. महेश शर्मा बड़ी भूमिका में हैं। डा. संजीव बालियान, राजेंद्र अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर फोकस रखा है।

विज्ञापन

क्या ध्रुवीकरण का एजेंडा कम काम कर रहा है?

भारतीय किसान यूनियन (असली, अराजनैतिक) के नेता चौधरी हरपाल सिंह कहते हैं कि पश्चिम में किसान आंदोलन ने हिंदू और मुसलमान के बीच में खाई को कम किया है। इस समय सबसे बड़ा मुद्दा किसानों का हित ही है। किसान नेता पुष्पेंद्र सिंह भी कहते हैं कि 2014, 2017 और 2019 के चुनाव में जो किसान और खासकर जाट, गुर्जर भाजपा के साथ आंख मूदकर खड़ा था, वैसी स्थिति नहीं है। राजनीतिक रूप से सक्रिय पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि अमित शाह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रयोगशाला में कैराना का प्रयोग तो किया है, लेकिन इसका कोई बहुत प्रभावी असर पड़ता नहीं दिखाई दे रहा है। अमित शाह के अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 10 मार्च के बाद मुजफ्फरनगर, कैराना में लोगों की गर्मी शांत हो जाने, क्षेत्र को शिमला में बदल देने वाले बयान को भी इसी कोशिश से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि चुनाव प्रचार की रणनीति को जमीन पर उतारने वाले सूत्रों का मानना है कि आठ फरवरी तक बहुत कुछ भाजपा के पक्ष में आ जाएगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

अखिलेश को रोकने के लिए जयंत को भाजपा के साथ आने का ऑफर

केंद्रीय गृह मंत्री ने सांसद प्रवेश वर्मा के आवास पर 250 के करीब जाट नेताओं के साथ बैठक की। बैठक में प्रवेश वर्मा ने जयंत चौधरी को भाजपा के साथ आने का निमंत्रण दे डाला। हालांकि जयंत ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन भाजपा के नेताओं की मानें तो इसका मुख्य मकसद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक लाभ लेने से रोकना था। कैराना में सपा के प्रत्याशी चयन को मुद्दा बनाना और जयंत को ऑफर दोनों रणनीति इसी उद्देश्य से अपनाई गईं। समझा जा रहा है कि भाजपा नेताओं ने यहां जयंत को ऑफर देकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संख्या में सबसे अधिक 17 फीसदी जाटों में संदेह पैदा करने की चाल चली है। ताकि जाट समाज मोदी सरकार और भाजपा के प्रति सहानुभूति और लगाव दोनों को जारी रखे। राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशियों के बाद उसकी अगली पसंद भाजपा के ही प्रत्याशी रहें। मेरठ से इस बार टिकट के दावेदार एक भाजपा नेता ने कहा कि रालोद के तो केवल 32 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। जबकि सीटें कहीं अधिक हैं। वह कहते हैं कि समाजवादी का प्रत्याशी चयन का तरीका और यह रणनीति कहीं न कहीं भाजपा के पक्ष में काम करेगी और माहौल बदलेगा।

प्रधानमंत्री की छवि को संभलकर दांव पर लगा रही है भाजपा

भाजपा ने 2017 का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर लड़ा था। इस बार मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ आगे हैं। पार्टी ने उनके साथ उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य या अन्य की गुंजाइश भी छोड़ रखी है। बड़े प्रचारक और रणनीतिकार की भूमिका में गृह मंत्री अमित शाह हैं। भाजपा ने शीर्ष चेहरे के तौर पर सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री की छवि को इस बार अभी तक संभलकर दांव पर लगाया है। प्रधानमंत्री चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद डिजिटल जनसभा के माध्यम से सामने आए हैं। वह राष्ट्रहित को साधने वाले और सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास वाले नेता की थीम पर पांच फरवरी के बाद चुनाव प्रचार को मुख्य धार देंगे।

2017 का मॉडल ही सबसे भरोसेमंद, अगर चला तो बनेगी बात

भाजपा के नेता पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जेवर एयरपोर्ट से लेकर एक्सप्रेसवे और विकास के मॉडल का प्रचार कर रहे हैं। इसके साथ-साथ पार्टी गैर जाटव दलित, गैर यादव ओबीसी को साध रही है। सैनी समाज में पैठ बनाने की सभी रणनीति अपना रही है। बताते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और सैनी के पार्टी छोड़ने के बाद रणनीति में काफी बदलाव किया गया। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी का प्रचार अभियान भी एक रणनीति के तहत देर से शुरू किया गया है। इससे पहले जमीनी स्तर पर माहौल बनाने की कोशिश हुई है। भाजपा पहले, दूसरे और तीसरे चरण के अपने करीब 42 फीसदी मतों को सुनिश्चित करने की कोशिश में लगी है। हालांकि भाजपा की राह में सबसे बड़ी बाधा किसान ही हैं। पार्टी उन्हें मनाने में लगी है। गन्ना क्षेत्र को नकद भुगतान वाली फसल माना जाता है और इसके पिछले चुनाव प्रचार के दौरान 14 दिन के भीतर भुगतान के मुख्य वादे ने ही इस बार भाजपा नेताओं की सांसत बढ़ा रखी है।

क्या है पश्चिमी उत्तर प्रदेश का महत्व?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 16 जिले में 136 विधानसभा सीटें आती हैं। 2017 में भाजपा इनमें से केवल 27 सीटें हार गई थी। बागपत जिले की एक सीट छपरौली पर रालोद का प्रत्याशी जीता, लेकिन बाद में वह भी भाजपाई बन गया था। लेकिन इस बार किसान आंदोलन ने थोड़ी हवा बदल दी है। राष्ट्रीय लोकदल को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, शामली समेत तमाम जिलों में अपना जनाधार लौटता दिखाई दे रहा है। 17 फीसदी मतदाता वाले जाट बहुल क्षेत्र में मुस्लिम और जाट की राजनीतिक एकता भाजपा के समीकरण बिगाड़ सकती है। कई सीटों पर यह समीकरण सीधे चुनाव में जीत की पटकथा लिख देता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश दिल्ली से बिल्कुल सटा है। माना जा रहा है कि इधर जिस दल की हवा बनेगी, पूरब तक बात उसके पक्ष में जाने की उम्मीद बढ़ जाएगी।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed