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उत्तर प्रदेश चुनाव: हो हल्ला मच रहा है ब्राह्मणों पर, दांव चले जा रहे पिछड़ों और अति पिछड़ों पर

Wed, 12 Jan 2022 06:28 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Wed, 12 Jan 2022 06:28 PM IST
सार

बीते कुछ समय से समाजवादी पार्टी में नेताओं के शामिल होने के सिलसिले और राजनीतिक उठापटक को अगर बहुत बारीकी से समझा जाए तो यह बिल्कुल 2017 में बिछाई गई भाजपा की राजनीतिक चौसर जैसी ही दिख रही है। अखिलेश यादव ने इस बार अपने कोर वोट बैंक मुस्लिम और यादवों के अलावा सबसे ज्यादा जिस पर दांव लगाया उसे पिछड़े और अति पिछड़े समेत ब्राह्मण भी शामिल हैं...

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up election 2022: Political analysts believe that the key to power in Uttar Pradesh lies with the backward and most backward castes
केशव प्रसाद मौर्या और स्वामी प्रसाद मौर्या - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

विस्तार

आगामी विधानसभा के चुनावों के चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे ज्यादा हो हल्ला ब्राह्मणों को लेकर ही मचाया जा रहा है। सभी राजनीतिक दल इसी बात को लेकर अपना एजेंडा सेट कर रहे हैं कि प्रदेश का बड़ा ब्राह्मण तबका उनके साथ जुड़ रहा है और सत्ता की चाबी उसी ब्राह्मण के हाथ में है। इसके लिए ब्राह्मण कमेटियों से लेकर ब्राह्मण सम्मेलन तक हो रहे हैं। लेकिन हकीकत इससे अलग है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक दरअसल उत्तर प्रदेश में दांव तो ब्राह्मणों पर लगाया जा रहा है लेकिन असली निशाने पर पिछड़े और अति पिछड़े ही हैं। बीते कुछ समय में उत्तर प्रदेश की राजनैतिक उठा पटक में समाजवादी पार्टी ने पिछड़ों और अति पिछड़ों समेत बड़े जातीय संगठनों पर दांव लगाया है।

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उत्तर प्रदेश में 2012 और 2017 में हुए विधानसभा चुनावों के सत्ता पक्ष और विपक्ष की पर्टियों को मिले वोट का अगर विश्लेषण किया जाए तो उसका सार यही निकलता है कि पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग को जिसने साध लिया, उसकी सरकार बन गई और जिसे इस समुदाय ने छोड़ दिया वह सत्ता से बाहर हो गया। 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को 22 फ़ीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। जबकि 2012 में समाजवादी पार्टी की जब सरकार बनी थी, तो तकरीबन 30 फीसदी वोट सपा को मिला था। 2017 में जब समाजवादी पार्टी सत्ता से बाहर हुई, तो उसको 2012 में मिले कुल वोट का आठ फीसदी ही कम मिला लेकिन सीटों की संख्या तीन चौथाई से ज्यादा कम हो गयी थी।
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राजनीतिक विश्लेषक जयप्रसाद चतुर्वेदी कहते हैं कि 2017 में अखिलेश यादव अपने कोर वोट बैंक यादव और मुस्लिम को ही साध पाए थे। जबकि भाजपा ने अपने कोर वोट बैंक के साथ साथ पिछड़ा, अति पिछड़ा और गैर-यादव समेत गैर-जाटव वोटों को साध कर सत्ता हासिल कर ली। चतुर्वेदी कहते हैं कि एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग को साध लिया जाए, तो उत्तर प्रदेश में सत्ता की राह बहुत आसान हो जाती है। इसका उदाहरण 2012 और 2017 की सरकारें हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव इस बार वही फार्मूला अपना रहे हैं, जो 2017 में भाजपा ने अपनाया था। यानी पिछड़े और अति पिछड़ों को जोड़कर 2022 में सत्ता की राह तलाश रहे हैं।

अखिलेश चल रहे हैं जातिगत समीकरण को साधने का यह बड़ा दांव

बीते कुछ समय से समाजवादी पार्टी में नेताओं के शामिल होने के सिलसिले और राजनीतिक उठापटक को अगर बहुत बारीकी से समझा जाए तो यह बिल्कुल 2017 में बिछाई गई भाजपा की राजनीतिक चौसर जैसी ही दिख रही है। अखिलेश यादव ने इस बार अपने कोर वोट बैंक मुस्लिम और यादवों के अलावा सबसे ज्यादा जिस पर दांव लगाया उसे पिछड़े और अति पिछड़े समेत ब्राह्मण भी शामिल हैं। अखिलेश यादव ने जहां जनवादी पार्टी से समझौता कर संजय चौहान और उनके प्रभाव के इलाकों को साधने की कोशिश की, वहीं पश्चिम यूपी में राष्ट्रीय लोकदल के जरिए एक बड़ा जाट वोट बैंक भी साधा है। सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर को साथ में लेकर अखिलेश यादव ने अति पिछड़ा वर्ग को जोड़ने की कोशिश की तो कृष्णा पटेल के माध्यम से कुर्मियों के एक बड़े तबके पर भी राजनैतिक वोट बैंक के लिहाज से निशाना साधा।

इसके अलावा अखिलेश यादव ने बहुजन समाज पार्टी के राम अचल राजभर और लाल जी वर्मा को पार्टी में शामिल करा कर बहुजन समाज पार्टी में अधिपत्य रखने वाले इन दोनों नेताओं के कोर वोट बैंक को भी अपने साथ साधने की कोशिश की है। राजनीतिक विश्लेषक और कानपुर विश्वविद्यालय के रिटायर पॉलिटिकल साइंस के प्रवक्ता सरोजानंद सिंह कहते हैं कि अखिलेश यादव ने इस बार वही चाल चली है जो भारतीय जनता पार्टी ने 2017 में चली थी। यानी अपने कोर वोट बैंक के साथ पिछड़ों, अति पिछड़ों और कुछ इलाकाई ब्राह्मणों को शामिल किया है। सिंह कहते हैं कि इसी कड़ी में स्वामी प्रसाद मौर्य का समाजवादी पार्टी में शामिल होना राजनीतिक नजरिए से समाजवादी पार्टी के लिए तो फायदे का सौदा ही है।

ब्राह्मणों और कायस्थों को जोड़ने की कवायद

सरोजानंद सिंह कहते हैं कि अगर समाजवादी पार्टी की प्रदेश टीम को आप ढंग से देखें तो पाएंगे कि 47 फ़ीसदी से ज़्यादा जगह गैर यादव, पिछड़ा और अति पिछड़ा समाज को दी गई है। वह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि भाजपा इस राजनीति गुणा भाग में पीछे है। लेकिन चुनाव के एन वक्त पर जिस तरीके से समाजवादी पार्टी न सिर्फ छोटे संगठनों बल्कि जातीय समीकरणों को साधने वाले संगठनों के बड़े नेताओं को भी तवज्जो देकर चुनावी हवा अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में जिस तरीके से पूर्वांचल में प्रभावशाली ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी और उनके पूरे परिवार को समाजवादी पार्टी में शामिल कराया गया उसका बड़ा असर दिखेगा।



इसी तरीके से यूपी की राजनीति में कायस्थों की एक बड़ी भूमिका रहती है। इसके लिए समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कायस्थों के बड़े नेता सुरेंद्र श्रीवास्तव को न सिर्फ पार्टी में शामिल कराया बल्कि उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष जैसा अहम पद भी दिया। समाजवादी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि वे उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े तकरीबन सत्तर लाख कर्मचारियों के कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। अपने कर्मचारियों के माध्यम के साथ-साथ छिटके हुए कायस्थ समाज को जोड़ने के लिए नोएडा से लेकर झांसी और बलिया से लेकर आगरा तक बड़े कार्यक्रम और सम्मेलन कर चुके हैं। समाजवादी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि समाजवादी पार्टी की यही रणनीति जो छोटे-छोटे संगठनों और सभी जाति समुदाय के लोगों को जोड़कर आगे बढ़ रही है वही उनको 2022 में सत्ता में वापस लेकर आएगी।

वोटबैंक का जातिगत फॉर्मूला

समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सैनी, शाक्य और मौर्य बिरादरी के तकरीबन आठ से नौ फीसदी वोट माने जाते हैं। इनका प्रभुत्व पश्चिम से लेकर तराई अवध और पूर्वांचल तक है। क्योंकि स्वामी प्रसाद मौर्य का जनता दल से लेकर बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल तक में बड़ा प्रभाव रहा है। यही वजह है कि जब वह भाजपा में शामिल हुए तो पार्टी को स्वामी प्रसाद मौर्य के आने से इस समुदाय का वोट बैंक हासिल होने की उम्मीद जुड़ी थी। अब यही जातीय गणित समाजवादी पार्टी के साथ है। समाजवादी पार्टी के उक्त नेता का कहना है कि उनके साथ पहले से महान दल के अति पिछड़े समुदाय के नेता केशव देव मौर्य भी हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव हाल के दिनों में अपने राजनीतिक मंचों से इस बात की घोषणा भी कर चुके हैं कि उनकी सरकार उस हर समुदाय को लेकर आगे बढ़ रही है जो भाजपा सरकार में शोषित थे और उपेक्षित थे।

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