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उत्तर प्रदेश चुनाव: गन्ने के बाद अब आलू किसानों की चुनौती, क्या इस बेल्ट में भाजपा को मिलेगा फायदा?

Tue, 15 Feb 2022 04:55 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Tue, 15 Feb 2022 04:55 PM IST
सार

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. आशीष मित्तल ने अमर उजाला को बताया कि आलू का पॉउडर और पापड़ उद्योग बनाकर आलू उत्पादक किसानों की समस्या समाप्त करने का दावा किया गया था, लेकिन इस पूरी बेल्ट में अभी तक इस तरह का एक भी उद्योग स्थापित नहीं हुआ है। इससे किसानो की समस्या बढ़ती जा रही है...

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UP election 2022: Now the election is reaching the potato-wheat belt, farmers are angry on goverment policies, there demand for reducing production prices, new cold storages and promoting agro-product processing industries are unheard
आलू किसान - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

यूपी विधानसभा चुनाव के पहले दो चरणों में 113 सीटों पर मतदान हो चुका है। इन दोनों चरणों में किसानों की नाराजगी के कारण गन्ने की मिठास सरकार के लिए कड़वी साबित हुई है। इसके बाद अब उत्तर प्रदेश चुनाव आलू-गेहूं उत्पादन करने वाले क्षेत्रों में पहुंचने जा रहा है, जहां किसान खेती की बढ़ती लागत और उपज के बिक्री मूल्य की अनिश्चितता का शिकार रहे हैं। उत्पादन मूल्य घटाने, कोल्ड स्टोरेज बनाने और कृषि उत्पाद प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने की मांग लंबे समय से अनसुनी रह गई है। सरकार को यहां भी किसानों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

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दरअसल, यूपी चुनाव के तीसरे चरण में फिरोजाबाद, एटा, कन्नौज, कानपुर, ललितपुर और झांसी के क्षेत्रों में 20 फरवरी को मतदान होगा। चौथे चरण में पीलीभीत, लखीमपुर, सीतापुर, हरदोई, लखनऊ, रायबरेली, बांदा और फतेहपुर के क्षेत्रों में 23 फरवरी को मतदान होगा। इसका बाद पांचवें चरण में अमेठी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, बाराबंकी, अयोध्या, बहराइच, श्रावस्ती और गोंडा जिलों में 27 फरवरी को मतदान होगा।
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यह पूरी बेल्ट आलू-गेहूं की पैदावार के लिए जानी जाती है। परिवार बढ़ने के कारण इन क्षेत्रों में किसानों के खेतों का आकार बहुत छोटा हो गया है। लागत बढ़ जाने से किसान पर्याप्त उत्पादन भी नहीं कर पा रहे हैं और खेती का घाटा बढ़ता जा रहा है। लेकिन उनका परिवार अभी भी मूल रूप से इन्हीं फसलों के उत्पादन पर आश्रित है, लिहाजा पूरी उम्मीद कृषि पर ही आधारित है।  
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किसानों की समस्या तो बहुत पुरानी रही है, लेकिन नई सरकार ने उनके घावों पर मरहम लगाने का वादा किया था। कहा गया था कि आलू, प्याज और टमाटर उत्पादक किसानों के फसलों की खरीद करने के लिए एक तंत्र विकसित किया जाएगा। लागत मूल्य पर घाटा कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 500 करोड़ रुपये का एक फंड भी निर्धारित किया था, लेकिन आरोप है कि इस फंड से आलू-टमाटर-प्याज उत्पादक किसानों की कोई मदद नहीं की गई और फंड खत्म हो गया।

आलू के कम मूल्य मिलने के कारण किसानों का उत्पादन मूल्य भी नहीं निकल रहा था, इससे नाराज किसानों ने कारण 2017-18 में अपनी फसल को लखनऊ की सड़कों पर फेंक दिया था। किसानों की समस्याएं दूर करने की बजाय उन पर गुंडा एक्ट के अंतर्गत मुकदमे दर्ज कर दिए गए थे। किसानों की यह नाराजगी दूर नहीं हुई थी कि इसी बीच किसान आंदोलन ने उनकी उम्मीदों को और बढ़ा दिया था। अब किसानों की यह नाराजगी मतदान के रूप में निकल सकती है।

UP election 2022: Now the election is reaching the potato-wheat belt, farmers are angry on goverment policies, there demand for reducing production prices, new cold storages and promoting agro-product processing industries are unheard
प्रयागराज में कृषि के बढ़ते घाटे को लेकर किया गया प्रदर्शन - फोटो : Amar Ujala

अब भी लगातार घाटा

वर्तमान समय में भी आलू-गेहूं उत्पादक किसानों की समस्या खत्म नहीं हुई हैं। आलू की पैदावार लागत छह-सात रुपये के करीब आ रही है, जबकि खुले बाजार में आलू 10-12 रुपये के करीब बिक रहा है। आढ़तिया किसानों को उत्पादन मूल्य भी देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उनका आलू खरीद के बाद बाजारों में पहुंचाने और उसे बिक्री करने पर अतिरिक्त लागत आ रही है, जिसके बाद उन्हें बचत कम हो रही है। इससे एक बार फिर आलू उत्पादक किसानों की नाराजगी बढ़ रही है।  

कोल्ड स्टोरेज में रखकर आलू को बाद में बेचकर लाभ कमाया जा सकता है। लेकिन बढ़ते बिजली मूल्य के कारण कोल्ड स्टोरेज में रखना भी अब सामान्य किसानों की जेब से बाहर होता जा रहा है। कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने की कीमत दो रुपये से तीन रुपये किलो तक पहुंच गई है। इसे लाने-ले जाने और बाद में बेचने का खर्च इतना बढ़ जाता है कि वह सामान्य किसानों के बस की बात नहीं रह जाती। जिन किसानों को जल्द पैसा पाकर साहूकारों को चुकाना होता है, उनके लिए एक बार फिर मजबूरी में आढ़तियों का द्वार खटखटाना पड़ता है।  

पिछले वर्ष खाद सब्सिडी के रूप में 2.55 लाख करोड़ रुपये का फंड निर्धारित किया गया था, लेकिन सरकार ने इस वर्ष इसमें 50 हजार करोड़ रुपयों की कटौती कर दी है। दाम बढ़ने से रोकने के लिए दूसरा रास्ता तैयार कर लिया गया है। यूरिया की बोरी 50 किलो की होती थी, जिसे अब 45 किलो का कर दिया गया है। डीएपी खादों का मूल्य अब भी बढ़ रहा है। जिससे किसान अब इसे खरीद भी नहीं पा रहे हैं।   

सरकार ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के नाम पर खाद सब्सिडी कम करने को सही ठहरा रही है, गंगा नदी के किनारे इसके बढ़ावा देने की योजना भी बना दी गई है, लेकिन जिन आलू उत्पादक किसानों की खेती पूरी तरह यूरिया खाद पर निर्भर होती है, जिससे उनका घाटा बढ़ता जा रहा है। गेहूं-धान की फसल में डीएपी खादों की बहुत आवश्यकता होती है जो लगातार महंगा होता जा रहा है।   

कैसे हो समस्या का निदान

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. आशीष मित्तल ने अमर उजाला को बताया कि आलू का पॉउडर और पापड़ उद्योग बनाकर आलू उत्पादक किसानों की समस्या समाप्त करने का दावा किया गया था, लेकिन इस पूरी बेल्ट में अभी तक इस तरह का एक भी उद्योग स्थापित नहीं हुआ है। इससे किसानो की समस्या बढ़ती जा रही है।

इस नाराजगी का परिणाम हुआ है कि अब जगह-जगह सरकार विरोधी रैलियां निकलने लगी हैं और लोग खुलकर सरकार के विरोध में नारेबाजी कर रहे हैं। इन चुनावों में सरकार को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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