उत्तर प्रदेश चुनाव: आखिरी चरणों में इनकी ताकत तय करेगी किधर है हवा का रुख, क्या कहते हैं 2017 के आंकड़े?
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विस्तार
उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा के आखिरी दो चरण बहुत महत्वपूर्ण है। महत्वपूर्ण इस लिहाज से हैं कि इन दो चरणों में असली परीक्षा मुख्य दलों के साथ साथ उन छोटे दलों की है जिन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई कहानी लिखनी शुरू की। इन दलों में अपना दल, सुभाषपा और निषाद पार्टी तो शामिल हैं ही, बल्कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी आख़िरी चरणों में खुद की मजबूती साबित करने में लगी हैं। राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि आखिरी चरण का चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण से ज्यादा जातीयता की बिसात पर खेले जाएंगे।
जातियता पर निर्भर हैं अंतिम चरण
2022 में हो रहा सियासी संग्राम अब अपने अंतिम चरण की ओर है। तीन मार्च और सात मार्च को होने वाले विधानसभा चुनावों में सुई क्षेत्रीय दलों के करिश्माई नेटवर्क पर घूम गई है। राजनीतिक विश्लेषक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि पांचवें चरण से लेकर सातवें चरण तक के चुनावों में पूरी राजनीतिक बिसात ही जातीय समीकरणों के आधार पर बिछाई गई है। वह कहते हैं यहां पर धार्मिक ध्रुवीकरण से ज्यादा जातीयता की बिसात पर बिछाई गई चौसर में ही सब खेल होगा। सिंह कहते हैं छठे और सातवें चरण के चुनावों में भाजपा के साथ सहयोगी दल के तौर पर मैदान में लड़ रही निषाद पार्टी और अपना दल की भी असली परीक्षा है। कभी भाजपा की हितैषी रही ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभाषपा इस बार समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी मैदान में है। इस चरण में सुभाषपा की भी परीक्षा है। वह कहते हैं असली परीक्षा तो इन छोटे दलों की पांचवें चरण से ही शुरू हो गई थी। जिसमें संजय चौहान की जनवादी पार्टी और कृष्णा पटेल की अपना दल की सियासी ताकत की जोर आजमाइश भी हुई।
दरअसल छोटे दलों की ताकत पूर्वांचल में 2017 के चुनावों में खूब उभरकर सामने आई। 2017 में विधानसभा चुनावों के परिणाम तो कम से कम यही तस्दीक करते हैं। सातवें चरण की जिन 54 सीटों पर चुनाव होने हैं उनमें इस वक़्त अपना दल के पास चार, सुभाषपा के पास तीन, और निषाद पार्टी के पास एक सीट है। जबकि छठे चरण में 57 विधानसभा सीटों पर होने वाले मतदान में लड़ाई बिल्कुल दूसरी है। 2017 के विधानसभा चुनावों में इन 57 सीटों में से भाजपा के पास 46 सीटें आईं थीं। जबकि समाजपार्टी के पास दो, बहुजन समाज पार्टी के पास पांच सीटें और कांग्रेस को एक सीट मिली थी। जबकि एक सीट से भाजपा और एक सीट अपना दल के अलावा अन्य को भी एक सीट मिली थी।
भाजपा ने पूर्वांचल में क्यों झोंकी थी ताकत
राजनीतिक विश्लेषक दिनेश श्रीवास्तव कहते हैं कि अगर उत्तर प्रदेश के छठे और सातवें चरण की सीटों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि कुल 111 सीटों में भाजपा के पास 72 सीटें ही थीं। हालांकि इसके अलावा भाजपा की सहयोगी पार्टी रही है सुभाषपा के पास तीन सीटें और अपना दल के पास चार सीटें थीं। वे कहते हैं कि इस बार हालात थोड़े बदले हुए हैं। छोटे दलों में सुभाषपा इस बार समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में है। समाजवादी पार्टी ने पिछले चुनाव में सातवें चरण के मतदान में 11 सीटें जीती थीं। सातवें चरण में बसपा ने भी अच्छी खासी सेंधमारी की थी और उनके छह प्रत्याशी विधायक बने थे। विश्लेषकों की मानें तो आखरी चरण के चुनावों में सपा और बसपा के साथ-सथ राजभर, संजय, निषाद और अनुप्रिया की परीक्षा होनी है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें उत्तर प्रदेश में पांचवें चरण से ही चुनावी हवाएं बदलने लगती हैं। खासतौर से 2022 के चुनावों में जो मुद्दे पहले चरण से शुरू हुए वह पांचवें चरण तक आते-आते न सिर्फ कम हुए बल्कि उनकी दशा और दिशा भी बदलने लगी। राजनैतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं कि चुनाव जब अवध में शुरू होता है और उसके बाद पूर्वांचल तक पहुंचते-पहुंचते राजनीतिक टोन जातीयता के आधार पर ज्यादा परिवर्तित होने लगती है। यही वजह है कि भाजपा ने 2022 के चुनावों से पहले भूमिका बनाने में अपनी पूरी ताकत पश्चिम की तुलना में पूर्वांचल में ज्यादा लगा दी थी।