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उत्तर प्रदेश चुनाव: स्वामी प्रसाद मौर्य सपा में गए तो भाजपा को कितना नुकसान, पुराना है आने-जाने का सिलसिला

Wed, 12 Jan 2022 05:24 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Wed, 12 Jan 2022 05:24 PM IST
सार

अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के संजय निषाद की भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति बहुत कामयाब नहीं रही है। हालांकि यूपी चुनाव देखते हुए दोनों ही दल एक बार फिर जोर-आजमाइश करते हुए देखे जा रहे हैं। एनडीए से नाता तोड़ने के बाद अकाली दल पहली बार अकेले चुनाव में उतर रहा हैं...

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Up election 2022: How much loss to BJP if Swami Prasad Maurya Joined samajwadi party
स्वामी प्रसाद मौर्य अखिलेश यादव से मिले - फोटो : अखिलेश के ट्विटर अकाउंट से

विस्तार

स्वामी प्रसाद मौर्य अभी औपचारिक तौर पर समाजवादी पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन इसके बाद भी उनके सपा में जाने की खबरों ने भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान पहुंचाया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा चुनाव के पहले-दूसरे चरण में ही पचास से ज्यादा विधायकों के टिकट काट सकती है। पूरे चुनाव में यह संख्या सौ के भी पार जा सकती है। इनमें से कई विधायक समाजवादी पार्टी जैसे दूसरे दलों में जाकर अपना भविष्य तलाशेंगे। ऐसे में विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है, तो उसके खिलाफ मजबूती से लड़ाई लड़ रही सपा को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल सकती है।

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लेकिन इससे भाजपा को कितना नुकसान हो सकता है, यह समझने वाली बात है। खासकर यह देखते हुए कि भाजपा पर दबाव बनाते हुए उससे नाता तोड़ने का फैसला उपेंद्र कुशवाहा, चिराग पासवान और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ था। इन नेताओं को भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए से नाता तोड़ना नुकसानदेह साबित हुआ था।
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उपेंद्र कुशवाहा अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए अपनी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का जनता दल (यूनाइटेड) में विलय कर एक बार फिर नीतीश कुमार की शरण में पहुंच गए हैं, तो चिराग पासवान की राजनीतिक हैसियत लोकसभा और बिहार विधानसभा दोनों जगह बहुत घट गई है। किसानों के मुद्दे पर एनडीए से अलग हुए चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की ताकत भी लोकसभा और आंध्रप्रदेश विधानसभा दोनों जगह बहुत कम हो गई है।   

अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के संजय निषाद की भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति बहुत कामयाब नहीं रही है। हालांकि यूपी चुनाव देखते हुए दोनों ही दल एक बार फिर जोर-आजमाइश करते हुए देखे जा रहे हैं। एनडीए से नाता तोड़ने के बाद अकाली दल पहली बार अकेले चुनाव में उतर रहा हैं। उन्हें भाजपा का साथ छोड़ने का क्या नफा-नुकसान झेलना पड़ता है, यह पंजाब विधानसभा चुनाव में पता चल जाएगा। हालांकि, इसी बीच शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस जैसी कुछ पार्टियां ऐसी भी हैं जिन्होंने भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए का साथ छोड़कर अच्छी राजनीतिक सफलता पाई है।

इन नेताओं को हुआ नुकसान

राजनीतिक दलों के अलावा कई नेता भी रहे हैं, जिन्होंने मतभेद के चलते भाजपा का साथ छोड़ा और उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा। इसमें शत्रुघ्न सिन्हा, उदित राज, यशवंत सिन्हा, उमा भारती, कल्याण सिंह, कीर्ति आजाद आदि शामिल हैं। अरुण जेटली से मतभेदों के चलते भाजपा का साथ छोड़ने वाले नवजोत सिंह सिद्धू की राजनीतिक नाव भी पंजाब चुनाव में हिचकोले खा रही है। इनमें से कई नेता वापस भाजपा में आ गए, तो कुछ दूसरी पार्टियों में अपना राजनीतिक करियर संभाल रहे हैं।  

हमारा मतदाता हमारे साथ

उत्तर प्रदेश भाजपा नेता अभिजात मिश्रा ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा एक विचारधारा पर आधारित पार्टी रही है। इसके समर्थक भी किसी नेता की बजाय उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण पार्टी से जुड़ते हैं। यही कारण है कि अनेक नेताओं के दल-बदल करने के बाद भी भाजपा को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ। अनेक राजनीतिक दल भी भाजपा से अलग होकर खासा नुकसान उठा चुके हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा दोबारा सरकार बनाकर एक इतिहास रचेगी और पार्टी का साथ छोड़ने वाले नेताओं को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा।



अभिजात मिश्रा ने दावा किया कि केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की योगी सरकार ने पूरे पांच साल समाज के हर वर्ग के लिए काम किया है। ब्राह्मणों को उचित भागीदारी मिली है तो ओबीसी-एससी-एसटी को सामाजिक भागीदारी तय की गई है। विकास के कार्यों से गरीबों-युवाओं की जिंदगी बेहतर बनाने के काम हुए हैं। यही कारण है कि इन वर्गों का साथ भाजपा के साथ बना हुआ है और अवसरवादी नेताओं के जाने से भाजपा पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

बेरोजगारों की आवाज बनकर उभर रहा असंतोष

वहीं, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अमीक जामई कहते हैं कि भाजपा सरकार से नाराज मंत्रियों-विधायकों का सपा के साथ जुड़ना कोई संयोग नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूरे पांच साल उत्तर प्रदेश में ‘ठाकुरवाद’ को बढ़ावा दिया और ब्राह्मणों, मुसलमानों, बेरोजगार युवाओं और गरीबों की उपेक्षा की। इन लोगों का असंतोष ही विधायकों को भाजपा का साथ छोड़ने और समाजवादी पार्टी का साथ पकड़ने पर मजबूर कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस विधानसभा चुनाव में सपा अकेले दम पर सरकार बनाने में कामयाब रहेगी।

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