फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   UP defamed by death in judicial custody, Complaints raised in NHRC

न्यायिक हिरासत में मौत से यूपी 'बदनाम', राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में बढ़ी शिकायतें

Mon, 30 Jul 2018 03:15 AM IST
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हरेन्द्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 30 Jul 2018 03:15 AM IST
विज्ञापन
UP defamed by death in judicial custody, Complaints raised in NHRC

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पिछले चार माह में 176 मामलों से राज्य सरकारों को 53 करोड़ 22 लाख रुपए मुआवजे के तौर पर देने के आदेश दिए। इनमें से ज्यादातर मामले न्यायिक हिरासत में मौत और पुलिस हिरासत में हुई मौतों से संबंधित थे, जिसमें सबसे ज्यादा मुआवजा उत्तर प्रदेश सरकार को देने का आदेश दिया गया। पिछले साल आयोग को उत्तर प्रदेश से न्यायिक हिरासत में मौत से जुड़ी 365 शिकायतें मिली थीं। वहीं ऐसे मामले सामने आने से दूसरे देशों में भारत की छवि खराब हो रही है।  

विज्ञापन

 
जून में यूपी सरकार को दिया 27 लाख मुआवजे का आदेश 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल अकेले जून माह में उन्होंने 60 मामलों में सुनवाई की। जिनमें आयोग ने 1 करोड़ 53 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश सुनाया। आयोग के मुताबिक इनमें से 26 मामले न्यायिक हिरासत में हुई मौतों से जुड़े हुए थे, जबकि 8 मामले पुलिस हिरासत में हुई मौतों के मामले थे। वहीं मानवाधिकार आयोग ने जून माह में उत्तर प्रदेश सरकार को न्यायिक हिरासत में हुई मौतों के मामले 27 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश सुनाया जबकि पुलिस हिरासत में हुई मौत के दो मामलों में 9 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया। 
विज्ञापन


विदेश में छवि हो रही खराब, माल्या जैसे लोग उठा रहे फायदा 

मानवाधिकार हनन के मामलों से संबंधित कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग हैं, उनमें से कई मामलों की पैरवी कर रही वकील वृंदा ग्रोवर का कहना है कि जिस तरह से न्यायिक हिरासत में मौतों के मामले बढ़ रहे हैं, इनसे विदेश और संयुक्त राष्ट्र में हमारी छवि खराब हो रही है। यहां तक कि 9,000 करोड़ रुपये के बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में मुख्य आरोपी विजय माल्या भी भारत में न्यायिक हिरासत में मौतों का हवाला देकर यहां आने से बच रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


प्रताड़ना पर कोई अलग से कानून नहीं 

वकील वृंदा ग्रोवर के मुताबिक पुलिस या न्यायिक हिरासत में किसी की मौत होती है, यह काफी जघन्य अपराध है और यह हमारी न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार आयोग केवल मुआवजा ही दिला सकता है, लेकिन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि कहने के लिए यह मुआवजा राज्य सरकारें देती हैं, लेकिन यह पैसा तो आम जनता से वसूले टैक्स का ही होता है। उन्होंने कहा कि यह विडंबना है कि हमारे देश में प्रताड़ना पर कोई अलग से कानून ही नहीं है।

चार माह में आयोग को मिलीं 18 हजार 691 शिकायतें 

इस साल मार्च से लेकर जून तक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को 18 हजार 691 शिकायतें मिलीं, जिनमें से 555 शिकायतें न्यायिक हिरासत में मौत और 39 शिकायतें पुलिस हिरासत में हुई मौतों से जुड़ी हुई थीं। मई माह में आयोग ने 37 मामलों की सुनवाई की, इनमें से 12 मामले न्यायिक हिरासत और 5 मामले पुलिस हिरासत में मौत से जुड़े थे। जबकि अप्रैल में 46 मामलों में से 15 ज्यूडिशियल कस्टडी में मौत और 3 मामले पुलिस कस्टडी में हुई मौतों के थे। इससे पहले मार्च में 33 मामलों में से 8 न्यायिक हिरासत और 4 पुलिस हिरासत में हुई मौतों से जुड़े थे। जबकि पिछले साल मानवाधिकार आयोग को उत्तर प्रदेश से 1 अप्रैल 2017 से लेकर 28 फरवरी, 2018 तक न्यायिक हिरासत में मौत से जुड़ी 365 शिकायतें मिली थीं। गौरतलब है कि पिछले साल तक यूपी की 66 जेलों में कैदियों की संख्या एक लाख से ज्यादा थी। 

चार माह में फर्जी एनकाउंटर की 45 शिकायतें

वहीं गौर करने वाली बात यह है कि मार्च से लेकर जून तक आयोग के पास फर्जी एनकाउंटर में हुई मौतों की आयोग के पास 45 शिकायतें आईं। जबकि जून माह में आयोग ने उत्तर प्रदेश में हुए फर्जी एनकाउंटरों से जुड़ी किसी शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं की। वहीं अप्रैल और मई माह में मात्र दो मामलों में 10 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। जबकि सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में पिछले मार्च 2017 से एक साल में 2000 से ज्यादा एनकाउंटर किए गए, जिनमें 58 लोगों की मौत हुई और 600 लोग घायल हुए। 

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) की जनहित याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भी जारी कर चुका है। 

पुलिस सिस्टम में हो सुधार 

सुप्रीम कोर्ट में पीयूसीएल मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील संजय पारिख का कहना है कि हम अभी तक पुलिस सिस्टम को सुधार नहीं पाए हैं। उन्होंने कहा कि हाल में उत्तर प्रदेश में सैकड़ों एनकाउंटर हुए हैं जिनमें कुल 58 लोग मारे गए। इनमें से कई मुठभेड़ों पर सवाल भी उठे हैं। जिन पर मानवाधिकार आयोग ने नोटिस भी भेजा है। मारे गए लोगों के परिजन न्याय की मांग लेकर इधर-उधर भटक रहे हैं, लेकिन इनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। 

चौकियों-थानों में सीसीटीवी, वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग

पीयूसीएल के वकील संजय पारिख ने बताया कि पुलिस हिरासत को लेकर पहले से ही कानून बने हुए हैं, लेकिन कानूनी प्रकियाओं का पालन नहीं किया। थानों में इतनी प्रताड़ना दी जाती है कि उनकी मौत हो जाती है। उन्होंने मांग की है कि हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर परिजनों को सूचना देना अनिवार्य किया जाए, साथ ही राज्य मानवाधिकार आयोग को भी गिरफ्तारी को लेकर सूचित किया जाए। साथ ही उन्होंने मांग की है कि सभी पुलिस चौकियों और थानों में सीसीटीवी को अनिवार्य किए जाने और गिरफ्तारी के दौरान वीडियो रिकॉर्डिंग की जाए। 


गौरतलब है कि अमेरिका के मानवाधिकार विभाग ने 20 अप्रैल को वाशिंगटन में 2017 की मानवधिकार रिपोर्ट में मुकदमों के मामलों में हत्या, लापता होने की घटना, यातना, पुलिस व सुरक्षा बलों के दुराचार, मनमाने ढंग से गिरफ्तार करने और हिरासत में लेने के मामलों में मानवाधिकार हनन का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा इस रिपोर्ट में दुष्कर्म, कारावास में जान को खतरा पैदा करने वाली स्थितियों और मुकदमा चलने से पहले हिरासत की लंबी अवधि के मामलों में भी मानवाधिकार हनन का उल्लेख किया गया है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed